
दिल्ली/भोपाल। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जब सरकारें महिलाओं के सशक्तिकरण, सुरक्षा और समान अधिकारों की बात करती हैं, तब मध्यप्रदेश में एक ऐसा संस्थान है जो स्वयं ही निष्क्रिय पड़ा हुआ है। राज्य महिला आयोग में पिछले चार वर्षों से अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप हजारों महिलाओं की शिकायतें लंबित पड़ी हैं और उन्हें न्याय मिलने की प्रक्रिया ठप सी हो गई है।
महिला अधिकारों और सुरक्षा के लिए गठित यह संवैधानिक संस्था फिलहाल बिना नेतृत्व के चल रही है। आयोग के पद मार्च 2023 से पूरी तरह खाली पड़े हैं। इस दौरान प्रदेश भर से बड़ी संख्या में शिकायतें आयोग तक पहुंची हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो पा रही है।
दरअसल, वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार के अंतिम दौर में राज्य महिला आयोग में नियुक्तियां की गई थीं। उस समय शोभा ओझा को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था और उनके साथ पांच सदस्यों की नियुक्ति हुई थी।
इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। शिवराज सरकार का पूरा कार्यकाल बीत गया और अब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नई सरकार को भी दो वर्ष से अधिक समय हो चुका है, लेकिन महिला आयोग में नई नियुक्तियां अब तक नहीं की गई हैं।
सरकार लगातार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए विभिन्न योजनाओं के संचालन का दावा करती है, लेकिन जिस संस्था का उद्देश्य महिलाओं की शिकायतों की सुनवाई और उन्हें न्याय दिलाना है, वह संस्था ही लंबे समय से निष्क्रिय है।
राज्य महिला आयोग से जुड़े एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि आयोग को हर महीने लगभग 300 शिकायतें प्राप्त होती हैं। इस हिसाब से एक साल में करीब तीन हजार शिकायतें आयोग तक पहुंचती हैं।
इनमें से कुछ शिकायतें आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं होतीं, जिन्हें निरस्त कर दिया जाता है। बाकी शिकायतों के मामलों में संबंधित विभागों से जांच प्रतिवेदन मंगाकर फाइल तैयार कर ली जाती है।
हालांकि, कई मामलों में आगे की कार्रवाई के लिए आयोग की पीठ में सुनवाई आवश्यक होती है, लेकिन अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण इन मामलों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
महिला आयोग की तरह ही राज्य के अन्य आयोगों की स्थिति भी कमोबेश यही है। अनुसूचित जाति आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग में भी बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित बताई जा रही हैं।
अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने के कारण इन आयोगों में केवल शासकीय अधिकारी और कर्मचारी ही कार्य कर रहे हैं, जो शिकायतों को प्राप्त कर संबंधित विभागों को अग्रेषित करने तक सीमित हैं। इस स्थिति में आयोग का मूल उद्देश्य: शिकायतों की सुनवाई और निष्पक्ष न्याय दिलाना लगभग ठप हो गया है।
द मूकनायक से बातचीत में राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य संगीता शर्मा ने बताया कि जब वर्ष 2019 में उनकी आयोग में नियुक्ति हुई थी, उस समय ही करीब 10 हजार शिकायतें पहले से लंबित थीं। उन्होंने कहा कि उस दौरान कमलनाथ सरकार के गिरने और सत्ता परिवर्तन के बाद बनी शिवराज सिंह चौहान सरकार ने आयोग से जुड़ी नियुक्तियों को कैबिनेट में निष्क्रिय कर दिया था। इसके चलते आयोग में नियुक्त सदस्यों की स्थिति को लेकर असमंजस पैदा हो गया और कई नियुक्त सदस्य अपने अधिकारों को लेकर हाईकोर्ट तक पहुंचे। इसी बीच कोरोना महामारी और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाव के कारण आयोग का कार्यकाल भी तीन साल में समाप्त हो गया, जिससे लंबित मामलों के समाधान की प्रक्रिया प्रभावित होती चली गई।
संगीता शर्मा ने आगे कहा कि मार्च 2023 से राज्य महिला आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के सभी पद खाली पड़े हैं, जबकि महिलाओं से जुड़ी शिकायतें लगातार आयोग तक पहुंच रही हैं। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन विभिन्न प्रकार की शिकायतें प्राप्त होती हैं, लेकिन आयोग में नियुक्तियां न होने के कारण उन पर सुनवाई संभव नहीं हो पाती। उनका कहना है कि महिला एवं बाल विकास विभाग भी आयोग की स्थिति को लेकर गंभीरता नहीं दिखा रहा है, जिसके चलते महिलाओं को आयोग के माध्यम से न्याय मिलना मुश्किल हो गया है। ऐसे में आयोगों में जल्द नियुक्तियां होना बेहद जरूरी है, ताकि लंबित मामलों का निराकरण हो सके और पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय मिल सके।
राज्य महिला आयोग को कानून के तहत सिविल न्यायालय के समान शक्तियां प्राप्त हैं। जब किसी महिला को प्रशासन या अन्य एजेंसियों से न्याय नहीं मिलता, तब वह आयोग में शिकायत दर्ज करा सकती है।
आयोग संबंधित विभाग से जांच प्रतिवेदन मंगाता है और यदि शिकायतकर्ता उस जांच से संतुष्ट नहीं होता, तो आयोग की पीठ में मामले की सुनवाई होती है।
सुनवाई के दौरान आयोग संबंधित अधिकारियों को तलब कर सकता है और मामले की जांच कर शासन को अनुशंसा भेज सकता है।
लेकिन वर्तमान में आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण इस प्रकार की सुनवाई और कार्रवाई संभव नहीं हो पा रही है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जहां महिलाओं के अधिकारों और न्याय की बात की जाती है, वहीं मध्यप्रदेश में महिला आयोग का चार साल से निष्क्रिय रहना कई सवाल खड़े करता है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि आयोग में जल्द से जल्द नियुक्तियां होना जरूरी है, ताकि महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई हो सके और उन्हें समय पर न्याय मिल सके।
प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के दावों के बीच यह सवाल भी उठता है कि जब शिकायतों की सुनवाई करने वाली संस्था ही खाली पड़ी हो, तो महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रह पाएगी।
मध्य प्रदेश लंबे समय से महिलाओं के खिलाफ अपराधों, खासकर दुष्कर्म के मामलों में देशभर में चर्चा का विषय बना रहा है। वर्ष 2023 में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं रही। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश दुष्कर्म की घटनाओं में देशभर में तीसरे स्थान पर रहा। यहां एक साल के भीतर 2,979 मामले दर्ज हुए। राजस्थान 5,078 घटनाओं के साथ सबसे ऊपर रहा, जबकि उत्तर प्रदेश में 3,516 मामले सामने आए।
यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालाँकि सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई योजनाएं और हेल्पलाइन नंबर शुरू किए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका असर बहुत कम दिखाई दे रहा है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.