
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में सहायक प्राध्यापक डॉ. रश्मि वर्मा की आत्महत्या के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने गंभीर संज्ञान लिया है। आयोग ने मामले को मानवाधिकार से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा मानते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, एम्स भोपाल प्रशासन और भोपाल पुलिस से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग के सदस्य प्रयंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव, एम्स भोपाल के निदेशक और भोपाल पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने इस मामले में संस्थान के भीतर काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने नोटिस में प्राधिकारियों से संस्थान में गठित पाश (प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हरसमेंट) समिति की पूरी जानकारी, इस मामले में दर्ज एफआईआर की प्रति और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मांगी है। आयोग यह जानना चाहता है कि यदि संस्थान में यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना से जुड़े आरोपों की शिकायत पहले ही की जा चुकी थी, तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की गई। आयोग का मानना है कि यदि समय रहते शिकायतों का उचित संज्ञान लिया जाता, तो शायद इस तरह की दुखद घटना को रोका जा सकता था।
तीन बार शिकायत के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई
आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने अपने इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस मामले को लेकर जानकारी साझा करते हुए बताया कि डॉ. रश्मि वर्मा ने आत्महत्या से पहले अपने विभाग के प्रमुख (एचओडी) डॉ. मोहम्मद यूनुस के खिलाफ तीन बार औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। इन शिकायतों में उन्होंने आरोप लगाया था कि डॉ. यूनुस लगातार उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे, उनके पेशेवर कामकाज में बाधा डाल रहे थे और सार्वजनिक रूप से उनका अपमान कर रहे थे। आरोप यह भी है कि इस प्रताड़ना के कारण उनके कार्यस्थल का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया था।
डॉ. रश्मि वर्मा ने संस्थान के शिकायत निवारण तंत्र और आंतरिक शिकायत समिति से भी मदद मांगी थी। लेकिन आरोप है कि एम्स प्रबंधन ने शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाय मामले को दबाने का प्रयास किया। शिकायतों के बावजूद यदि आरोपित अधिकारी के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह संस्थान की आंतरिक व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रताड़ना से तंग आकर दी जान
बताया जा रहा है कि लगातार मानसिक प्रताड़ना और संस्थागत उदासीनता से परेशान होकर डॉ. रश्मि वर्मा ने बेहोशी की दवाओं की अत्यधिक मात्रा लेकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। उन्होंने 11 दिसंबर को एनस्थीसिया से जुड़ी दवाओं का ओवरडोज ले लिया था। इसके बाद उन्हें बचाने के लिए उनके सहकर्मियों और चिकित्सकों ने लगातार प्रयास किए। लगभग 23 दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने उनकी जान बचाने की कोशिश की, लेकिन अंततः उन्हें नहीं बचाया जा सका।
यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि संस्थागत जवाबदेही और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल बनकर सामने आई है। आयोग ने विशेष रूप से एम्स भोपाल की आंतरिक शिकायत समिति की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। आयोग यह जानना चाहता है कि जब यौन उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतें सामने आई थीं, तब नियमानुसार तत्काल जांच और कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
प्रशासन और पुलिस से मांगा जवाब
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भोपाल पुलिस से भी विस्तृत जवाब मांगा है। आयोग ने यह जानकारी तलब की है कि डॉ. मोहम्मद यूनुस के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और मानसिक प्रताड़ना से जुड़ी धाराओं के तहत अब तक क्या कार्रवाई की गई है। आयोग यह भी जानना चाहता है कि पुलिस जांच किस स्तर पर पहुंची है और मामले में आगे क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर संस्थानों में कार्यस्थल पर उत्पीड़न से जुड़े मामलों के प्रति संवेदनशीलता और पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी द्वारा की गई शिकायतों को समय पर गंभीरता से लिया जाए और निष्पक्ष जांच की जाए, तो इस तरह की दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है।
पहले भी लग चुके हैं ऐसे आरोप
एम्स भोपाल में उत्पीड़न से जुड़ा यह पहला मामला नहीं बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार करीब चार महीने पहले ट्रामा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. श्रुति दुबे ने भी एचओडी डॉ. मोहम्मद यूनुस के खिलाफ इसी तरह के आरोप लगाए थे। उस समय भी कार्यस्थल पर प्रताड़ना और व्यवहार से जुड़ी शिकायतें सामने आई थीं। हालांकि उस मामले में क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं हो पाया था।
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