
नई दिल्ली: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के मामलों में पुलिस के रवैये को लेकर सख्त निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जब भी जेंडर आधारित हिंसा की शिकार महिलाएं थाने पहुंचें, तो पुलिसकर्मी उन्हें शर्मिंदा करने (विक्टिम-शेमिंग) या उन पर कोई नैतिक फैसला सुनाने से बचें। इसके लिए पुलिसकर्मियों को पर्याप्त रूप से संवेदनशील बनाने की सिफारिश की गई है।
कार्यस्थलों और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मंगलवार को यह एडवाइजरी साझा की गई। मूल रूप से 23 अक्टूबर को जारी इस एडवाइजरी में क्राइम हॉटस्पॉट पर नियमित पुलिस गश्त बढ़ाने और यौन उत्पीड़न तथा कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने पर खास जोर दिया गया है।
आयोग ने चिंता जताते हुए कहा कि आज के दौर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा सिर्फ शारीरिक नुकसान तक ही सीमित नहीं रह गई है। हाल के वर्षों में डिजिटल तकनीक और खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल के कारण तकनीक आधारित जेंडर हिंसा के मामलों में तेजी से उछाल देखने को मिला है।
इसके समाधान के रूप में एनएचआरसी ने हर उम्र की महिलाओं को 'रिवेंज पोर्न, डॉक्सिंग, बिना सहमति के आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो साझा करने और डीप फेक' जैसे डिजिटल खतरों के प्रति जागरूक करने की वकालत की है। आयोग का सुझाव है कि स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कार्यस्थलों पर साइबर अपराध व शिकायत तंत्र (जैसे नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल और सहयोग पोर्टल) की जानकारी देने के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
एनएचआरसी ने माना है कि कड़े कानूनों के बावजूद उत्पीड़न आज भी एक गंभीर और व्यापक समस्या बनी हुई है। महिलाओं की अलग-अलग सामाजिक पहचान और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, निवारक और उपचारात्मक उपायों के जरिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
यह महत्वपूर्ण एडवाइजरी महिला एवं बाल विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और गृह मंत्रालय सहित 10 केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों को भेजी गई है। इसके साथ ही रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों को भी इससे अवगत कराया गया है।
आयोग ने इन सभी अधिकारियों को सिफारिशों को लागू करने और इस दिशा में हुई प्रगति की जानकारी देने के लिए दो महीने के भीतर एक विस्तृत 'कार्रवाई रिपोर्ट' (एक्शन टेकन रिपोर्ट) जमा करने का निर्देश दिया है।
पुलिस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए मानवाधिकार पैनल ने कहा कि अक्सर पीड़िताओं को थाने में अपनी शिकायत दर्ज कराते समय पुलिस के विरोध और 'मोरल पुलिसिंग' का सामना करना पड़ता है। इसे रोकने के लिए नोडल मंत्रालय को एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने पर विचार करना चाहिए, जिसमें पीड़िताओं से बात करने के स्पष्ट प्रोटोकॉल हों और इसे सोशल मीडिया सहित हर जगह व्यापक रूप से प्रचारित किया जाए।
सार्वजनिक स्थानों पर हिंसा की स्थिति में, एनएचआरसी ने हेल्पलाइन और पुलिस के पहुंचने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय करने की भी बात कही है। आयोग के अनुसार पुलिस अधिकारियों को नियमित गश्त करनी चाहिए, खासकर उन जगहों पर जो रात में सुनसान रहती हैं या जिन्हें अपराध का हॉटस्पॉट माना जाता है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि दिसंबर 2025 तक देश के कुल 16,109 पुलिस स्टेशनों में से 14,658 (यानी 89 प्रतिशत) में महिला हेल्प डेस्क की सुविधा मौजूद थी। एडवाइजरी में इस बात पर जोर दिया गया है कि संकट में फंसी महिलाओं की तत्काल सहायता के लिए बाकी बचे पुलिस स्टेशनों में भी जल्द से जल्द ये हेल्प डेस्क सुचारू रूप से चालू की जानी चाहिए।
महिलाओं की सुरक्षा के मोर्चे पर आयोग ने समाज की मानसिकता बदलने को भी एक जरूरी कदम बताया है। यह एक बड़ी चिंता का विषय है कि बड़े वर्ग को पता ही नहीं है कि यौन उत्पीड़न के दायरे में क्या-क्या आता है और किसी घटना के बाद क्या कदम उठाने चाहिए।
इस अज्ञानता को दूर करने के लिए सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों पर पोस्टर व पर्चे लगाने की सिफारिश की गई है। इनमें यौन उत्पीड़न की परिभाषा, महिलाओं के कानूनी अधिकार, आपातकालीन नंबर और 'शी-बॉक्स' (SHe-Box) जैसे इलेक्ट्रॉनिक शिकायत पोर्टलों की स्पष्ट जानकारी शामिल होनी चाहिए।
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