
कोच्चि- केरल की सिस्टर लूसी कलापुरा की जिंदगी एक ऐसी कहानी है जो विद्रोह, संघर्ष और नई शुरुआत की मिसाल बन गई है। 60 साल की उम्र में केरल हाई कोर्ट बार काउंसिल में वकील के रूप में नामांकित होकर उन्होंने न केवल चर्च की बेड़ियों को तोड़ा, बल्कि उन महिलाओं के लिए लड़ने का संकल्प लिया जो शक्तिशाली संस्थाओं के आगे चुप रहने को मजबूर हो जाती हैं। शनिवार को हाई कोर्ट कैंपस में काले गाउन में खड़ी सिस्टर लूसी जिन्हें बार काउंसिल ने "लूसी के.एस." कहकर बुलाया, अपना नामांकन प्रमाण-पत्र थामे भावुक नजर आईं। केरल हाई कोर्ट के जज जस्टिस एन. नागारेश ने उन्हें यह सम्मान सौंपा, जिसमें बार काउंसिल ऑफ केरल के चेयरमैन एडवोकेट अजीत टी.एस. और नामांकन समिति चेयरमैन एडवोकेट मोहम्मद शाह पी.ए. मौजूद थे।
सिस्टर लूसी ने एनडीटीवी को दिए एक बयान में कहा, "यह सफर आसान नहीं था। मैं उन महिलाओं को कानूनी ताकत देना चाहती हूं जो न्याय की लड़ाई में अकेली पड़ जाती हैं। 60 की उम्र में जूनियर वकील बनना मुश्किल है, लेकिन मैंने ठान लिया है।" रविवार को साझा किए गए वीडियो में वे प्रमाण-पत्र दिखाते हुए मुस्कुराईं और बोलीं, "यह मेरी जद्दोजहद का फल है।"
सिस्टर लूसी के जीवन में संघर्ष का सिलसिला 2018 में शुरू हुआ, जब उन्होंने जालंधर के तत्कालीन बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। मामला कोट्टायम के कुराविलंगाड़ कॉन्वेंट में 2014-2016 के बीच एक नन (सिस्टर रणीत) के साथ 13 बार हुए बलात्कार से जुड़ा था। सिस्टर लूसी ने सिस्टर रणीत का खुला समर्थन किया, जो भारत में किसी नन द्वारा बिशप पर लगाया गया पहला ऐसा औपचारिक आरोप था। सितंबर 2018 में केरल हाई कोर्ट के बाहर हुए धरनों में सिस्टर लूसी प्रमुख चेहरा बनीं और बिशप की गिरफ्तारी की मांग की।
इसके बदले अगस्त 2019 में फ्रांसिस्कन क्लैरिस्ट कॉन्ग्रेगेशन (एफसीसी) ने उन्हें "कॉन्ग्रेगेशन के नियमों का उल्लंघन" के आरोप में निष्कासित कर दिया। चर्च ने जो कारण बताये उनमे ड्राइविंग सीखना, कार खरीदना, कविताएं प्रकाशित करना और पीड़ित नन का समर्थन करना शामिल था। सिस्टर लूसी को उस समय झटका लगा जब वेटिकन ने उन्हें कॉन्ग्रेगेशन से निष्कासित करने वाले फरमान के खिलाफ उनकी अपील को खारिज कर दिया और इस फैसले को मंजूरी दी। सिस्टर लूसी ने अपनी आत्मकथा "क्राइस्ट के नाम पर" (इन द नेम ऑफ क्राइस्ट) लिखी, जिसमें उन्होंने चर्च की इन नीतियों पर तीखा प्रहार किया। इस किताब से चर्च में हंगामा मच गया।
जनवरी 2022 में पाला पोक्सो कोर्ट ने बिशप फ्रैंको को बरी कर दिया, जिसकी सिस्टर लूसी ने कड़ी निंदा की और इसे "ईसाई मूल्यों के खिलाफ" बताया। जुलाई 2021 में केरल हाई कोर्ट ने उन्हें वायनाड के एफसीसी कॉन्वेंट खाली करने का आदेश दिया, लेकिन स्थगन मिलने के बाद वे कभी-कभी वहां जाती हैं। वर्तमान में कोच्चि में रहते हुए उन्होंने खुद एक केस में कोर्ट में बहस की क्योंकि उनके वकील ने साथ छोड़ दिया।
गणित शिक्षिका के रूप में रिटायर होने के एक साल बाद, जुलाई 2022 में सिस्टर लूसी ने एर्नाकुलम के श्री नारायण लॉ कॉलेज से तीन साल का लॉ कोर्स शुरू किया। हॉस्टल में रहकर उन्होंने पढ़ाई पूरी की, जहां शिक्षकों और सहपाठियों का सहयोग मिला। वे कहती हैं, "मैंने देखा है कि चर्च जैसी संस्थाओं में महिलाओं की आवाज दब जाती है। कानून पढ़कर मैं उन्हें मजबूत बनाऊंगी।" सिस्टर लूसी की यह यात्रा न केवल व्यक्तिगत जीत है, बल्कि उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होने का साहस जुटाती हैं। वे अब जूनियर वकील के रूप में काम शुरू करेंगी, ताकि मजबूत आवाज बन सकें।
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