नई दिल्ली: दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की बसों में सफर करने वाली महिलाओं के लिए एक बेहद अहम खबर है। एक अगस्त 2026 से बिना 'सहेली पिंक नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड' (जिसे पिंक सहेली स्मार्ट कार्ड भी कहा जाता है) के महिलाएं मुफ्त बस यात्रा का लाभ नहीं उठा सकेंगी। परिवहन मंत्री पंकज कुमार सिंह ने शुक्रवार को इस बड़े बदलाव की जानकारी साझा की।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बसों में मिलने वाले पारंपरिक कागजी पिंक टिकट केवल 31 जुलाई तक ही मान्य रहेंगे। इसके बाद मुफ्त सफर के लिए स्मार्ट कार्ड का होना पूरी तरह से अनिवार्य हो जाएगा और यही यात्रा का एकमात्र जरिया बचेगा।
इस नए नियम से उन महिलाओं को परेशानी हो सकती है जो दिल्ली की स्थायी निवासी नहीं हैं। मंत्री ने बताया कि अब तक करीब 15 लाख कार्ड जारी किए जा चुके हैं। यह प्रक्रिया डीटीसी डिपो और शहर भर में बनाए गए 50 अन्य अधिकृत केंद्रों पर आगे भी चलती रहेगी। उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी पात्र लाभार्थी इस सुविधा से वंचित न रहे।
महिलाओं द्वारा कार्ड बनवाने में दिखाई जा रही सुस्ती को देखते हुए डीटीसी ने बसों में एक विशेष जागरूकता अभियान भी शुरू किया है, ताकि यात्रियों को जल्द से जल्द कार्ड बनवाने के लिए प्रेरित किया जा सके।
इस स्मार्ट कार्ड प्रणाली की घोषणा दिल्ली बजट 2025 में की गई थी। इसे पिछली आम आदमी पार्टी (आप) सरकार द्वारा शुरू की गई कागजी टिकट प्रणाली को रिप्लेस करने के लिए इसी साल मार्च में लॉन्च किया गया था। शुरुआत में इसके लिए तीन महीने का ट्रांजिशन समय दिया गया था, जिसे बाद में और बढ़ा दिया गया।
योजना के लागू होने के बाद से ही कार्ड बनवाने के लिए डिपो पर महिलाओं की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। इसे देखते हुए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने महिलाओं से अपील की है कि वे पैनिक न करें। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि कार्ड जारी करने की प्रक्रिया लगातार जारी रहेगी और कागजी टिकटों को अचानक बंद करने की बजाय धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा।
हालांकि इस नई व्यवस्था को लागू करने में कई जमीनी खामियां भी सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या प्रवासी महिलाओं और उन लोगों के सामने है जिनके आधार कार्ड पर दिल्ली का पता नहीं है। पुरानी व्यवस्था के तहत निवास स्थान की परवाह किए बिना सभी महिलाएं डीटीसी बसों में मुफ्त यात्रा कर सकती थीं।
नोएडा से साकेत कोचिंग के लिए आने वाली छात्रा रितिका ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि उनके पास दिल्ली का पता नहीं है। अभी तक वह मुफ्त सफर कर पा रही हैं, लेकिन अगले महीने से उन्हें अपनी यात्रा के लिए किराया देना होगा।
कुछ कार्डधारकों ने तकनीकी समस्याओं की भी शिकायत की है। जखीरा फ्लाईओवर और पहाड़गंज के बीच नियमित रूप से सफर करने वाली लतिका ने बताया कि कार्ड को दो बार टैप करने के बीच केवल 45 से 60 मिनट का ही समय मिलता है। उन्हें एक घंटे के भीतर कई बसें बदलनी पड़ती हैं, जिससे यात्रा के कुछ हिस्से का किराया उन्हें अपनी जेब से देना पड़ जाता है। इसके अलावा बस में लगी मशीनें अक्सर कार्ड रीड करने में भी विफल रहती हैं।
इस योजना में ट्रांसजेंडर समुदाय को भी शामिल करने की घोषणा की गई थी, लेकिन उन्हें कार्ड बनवाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, योजना शुरू होने के बाद से अब तक केवल एक ही ट्रांसजेंडर व्यक्ति को यह कार्ड जारी किया गया है, क्योंकि उनके आधार कार्ड पर लिंग 'महिला' दर्ज था।
एक अन्य ट्रांसजेंडर वैशाली ने बताया कि डिपो पर उन्हें यह कहते हुए कार्ड देने से साफ मना कर दिया गया कि यह सुविधा सिर्फ महिलाओं के लिए है, क्योंकि उनके आधार कार्ड पर 'ट्रांसजेंडर' लिखा हुआ है।
इस पूरे मामले में और लोगों की शिकायतों पर परिवहन विभाग की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है। वहीं, परिवहन मंत्री का दृढ़ता से मानना है कि स्मार्ट कार्ड में इस बदलाव से योजना का कार्यान्वयन बेहतर होगा। उनका दावा है कि इससे लाभार्थियों का प्रबंधन सुधरेगा, सिस्टम में पूरी तरह पारदर्शिता आएगी और सभी को बिना किसी रुकावट के लाभ मिल सकेगा।
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