"मैं साध्वी हूं या किसी सास की बहू? हर बात पर आपत्ति क्यों?" साध्वी हर्षानंद गिरि का संत समाज के एक वर्ग पर तीखा हमला!

पहनावे, मेकअप, परिवार के साथ रहने और गृहस्थ जीवन को लेकर उठ रहे सवालों पर साध्वी हर्षानंद गिरि ने सोशल मीडिया पर दिया जवाब; कहा- "मेरी सुरक्षा की गारंटी लेने वाला कोई आश्रम तैयार हो तो आज ही वहां रहने चली जाऊंगी।"
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भोपाल। मॉडल से साध्वी बनीं हर्षा रिछारिया उर्फ साध्वी हर्षानंद गिरि ने एक बार फिर अपने बयानों से सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार को जारी एक वीडियो में उन्होंने उन संतों पर खुलकर निशाना साधा, जो पिछले कुछ महीनों से उनके पहनावे, मेकअप, परिवार के साथ रहने और संन्यासी जीवनशैली को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि कुछ संत उनकी हर छोटी-बड़ी बात पर आपत्ति क्यों जताते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "ये कौन से संत हैं, जिन्हें मेरी हर बात बुरी लग जाती है? मैं क्या खाऊं, क्या पहनूं, कहां रहूं, किससे मिलूं या कहां घूमूं, हर चीज पर इन्हें परेशानी होती है। ये संत कम और मेरी सास ज्यादा बन गए हैं, जो हर बात पर मुंह फुला लेते हैं।"

साध्वी हर्षानंद गिरि ने अपने वीडियो में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में, जब देशभर में महिलाओं और बच्चियों के साथ अपराध की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, उनसे यह पूछना कि वे अपने माता-पिता के साथ क्यों रहती हैं, पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने कहा, "जिस समाज में दो महीने की बच्ची तक सुरक्षित नहीं है, जहां हर दिन दुष्कर्म और अपराध की खबरें आती हैं, वहां मुझे बताइए कि मैं कहां रहूं? जो संत यह कहते हैं कि मुझे परिवार के साथ नहीं रहना चाहिए, वे पहले मेरी सुरक्षा की सौ फीसदी गारंटी लें। अगर कोई आश्रम मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेता है, तो मैं आज ही वहां रहने चली जाऊंगी।"

उन्होंने संतों के व्यवहार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि संत का स्वभाव त्याग, प्रेम और करुणा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन कुछ लोगों का व्यवहार इसके विपरीत दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि संतों को छोटी-छोटी बातों पर नाराज नहीं होना चाहिए। "संत में राग, द्वेष, ईर्ष्या जैसी भावनाएं नहीं होतीं। उनका गुस्सा पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक होता है। संत तो प्रेम और सहनशीलता का प्रतीक होता है, लेकिन मेरी हर बात पर प्रतिक्रिया देना और आलोचना करना समझ से परे है।"

साध्वी हर्षानंद गिरि ने बताया कि हाल ही में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर जब वे उज्जैन स्थित अपने गुरु के आश्रम पहुंचीं तो मीडिया ने उनसे पहला सवाल यही किया कि कुछ संतों का कहना है कि एक साध्वी को माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहिए। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि जब तक उनका अपना आश्रम नहीं बन जाता, तब तक उनके सामने केवल दो ही विकल्प हैं। पहला, अपने गुरु के आश्रम में रहना, जहां लंबे समय तक रहना उन्हें उचित नहीं लगता क्योंकि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहतीं। दूसरा विकल्प उनके माता-पिता का घर है, जहां वे खुद को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं। उन्होंने सवाल किया कि इन दोनों के अलावा उनके पास रहने का तीसरा विकल्प आखिर क्या है।

दरअसल, यह विवाद गुरु पूर्णिमा के दिन उज्जैन के मौनी तीर्थ आश्रम में दिए गए उनके बयान के बाद और बढ़ गया। उस दौरान उन्होंने कुछ आश्रमों की व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि कई आश्रमों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताजनक स्थिति है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि कुछ संत चोरी-छिपे ब्यूटी पार्लर का उपयोग करते हैं, जबकि सार्वजनिक रूप से सादगी और वैराग्य की बात करते हैं। उनके इन बयानों के बाद संत समाज के एक वर्ग ने कड़ी आपत्ति जताई थी और उनके संन्यास जीवन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

अप्रैल 2026 में लिया था सन्यास

गौरतलब है कि 18 अप्रैल 2026 को हर्षा रिछारिया ने उज्जैन के मौनी तीर्थ आश्रम में महामंडलेश्वर सुमनानंद से दीक्षा लेकर संन्यास ग्रहण किया था। दीक्षा के दौरान उन्होंने वैदिक परंपरा के अनुसार पिंडदान भी किया था और बाद में व्यासपीठ से प्रवचन देते हुए भी नजर आई थीं। हालांकि संन्यास ग्रहण करने के बाद से ही उनके मेकअप, बालों के रंग, आधुनिक जीवनशैली और परिवार के साथ रहने को लेकर लगातार बहस होती रही है।

अब सोशल मीडिया पर जारी अपने ताजा वीडियो के माध्यम से साध्वी हर्षानंद गिरि ने इन सभी आरोपों का एक साथ जवाब दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संन्यास का अर्थ किसी व्यक्ति के बाहरी स्वरूप या रहने की जगह से नहीं, बल्कि उसके विचारों, आचरण और आध्यात्मिक साधना से तय होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी को उनके जीवन को लेकर आपत्ति है, तो पहले उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध कराना चाहिए, केवल आलोचना करना समाधान नहीं है।

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