बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचने वाले आदिवासी शख्स ने दोबारा किया अंतिम संस्कार, सामाजिक बहिष्कार का था डर

बहन का कंकाल लेकर बैंक पहुंचने वाले आदिवासी शख्स की रातों-रात बदली जिंदगी, लाखों रुपये की मिली आर्थिक मदद, लेकिन सामाजिक बहिष्कार के डर से दोबारा करना पड़ा अंतिम संस्कार।
Jitu Munda bank skeleton
बैंक में बहन का कंकाल ले जाने वाले ओडिशा के जीतू मुंडा ने सामाजिक दबाव में दोबारा अंतिम संस्कार किया।
Published on

ओडिशा के क्योंझर जिले में एक आदिवासी शख्स का अपनी बहन के कंकाल को लेकर बैंक पहुंचने का मामला दुनियाभर में सुर्खियों में रहा था। अब इस घटना के कुछ दिनों बाद, सामाजिक बहिष्कार की धमकी के चलते उसे मजबूरन अपनी बहन का दोबारा अंतिम संस्कार करना पड़ा है। इसके साथ ही उसे पूरे समुदाय के लिए एक भोज का भी आयोजन करना पड़ा।

हालांकि, जीतू मुंडा नाम के इस शख्स को अब कोई शिकायत नहीं है। कंकाल के साथ उनकी पैदल यात्रा का विचलित करने वाला वीडियो वायरल होने के बाद से उनके पास आर्थिक मदद की झड़ी लग गई है। अब तक उन्हें 10 लाख रुपये से अधिक की मदद मिल चुकी है या देने का वादा किया गया है। यह एक ऐसी रकम है जिसके बारे में उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।

जीतू मुंडा ने बताया कि बैंक अधिकारियों को सबूत दिखाने के लिए जब उन्होंने अपनी बहन का शव कब्र से निकाला, तो उनके समुदाय के लोगों ने दोबारा अंतिम संस्कार करने का दबाव डाला। उन्होंने कहा कि ऐसा न करने पर उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता। यहां तक कि उन्हें अन्य आदिवासी परिवारों से मिलने-जुलने या पीने के पानी का इस्तेमाल करने की भी इजाजत नहीं होती।

दरअसल, बैंकिंग प्रक्रियाओं से अनजान जीतू से जब मृत बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र मांगा गया, तो उन्होंने कब्र खोदकर कंकाल निकाल लिया। इसके बाद वह 27 अप्रैल 2026 को उसी कंकाल को लेकर सीधे बैंक पहुंच गए थे। उनकी बहन कलारा मुंडा के खाते में कोई बहुत बड़ी रकम नहीं थी, बल्कि सिर्फ 19,300 रुपये जमा थे। इससे पहले जीतू और उनकी बहन ने इस खाते से 100 से 500 रुपये के बीच आठ बार पैसे निकाले थे।

बुधवार 6 मई को क्योंझर जिले के पटना ब्लॉक के तहत आने वाले उनके गांव दिनानाली में सामुदायिक भोज की जोरदार तैयारियां चल रही थीं। 'हो' जनजाति के रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अब उस पुरानी कब्र की जगह ईंट और सीमेंट से एक नया स्मारक बना दिया गया है।

गांव की ही एक महिला ने इसके पीछे की परंपरा को समझाया। उनके मुताबिक, 'हो' जनजाति में दफनाने के बाद शव को बाहर निकालने की सख्त मनाही है। अगर कोई ऐसा करता है, तो अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती है। इस मौके पर होने वाले सामुदायिक भोज के लिए एक बकरे और तीन मुर्गियों की बलि दी जाती है।

सबूत मांगने पर बैंक को दिए गए जीतू के इस असाधारण जवाब ने हर किसी को हैरान कर दिया था। इस घटना के सामने आने के बाद उन्हें देश भर से भारी समर्थन मिला। जीतू के अनुसार, फिजिक्स वाला के संस्थापक अलख पांडे ने उन्हें 10 लाख रुपये दान दिए हैं। वहीं, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने 50,000 रुपये की आर्थिक मदद की घोषणा की है। राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने अपने एक महीने का वेतन 1.45 लाख रुपये देने का वादा किया है, जबकि खिदमत फाउंडेशन ने भी 50,000 रुपये का योगदान दिया है।

इस अजीबोगरीब घटना से पहले तक जीतू और उनका परिवार पूरी तरह से गुमनामी की जिंदगी जी रहा था। लेकिन अब स्थानीय सरपंच ने खुद अपनी देखरेख में सामुदायिक भोज और स्मारक का निर्माण करवाया है। इतना ही नहीं, उनके घर में तुरंत बिजली का कनेक्शन भी दे दिया गया है।

ओडिशा के वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री गणेश राम सिंह खूंटिया भी इस भोज में शामिल हुए। बैंक मार्च के ठीक एक दिन बाद, 28 अप्रैल को क्योंझर जिला प्रशासन ने तत्काल मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र जारी कर दिया था। इसकी बदौलत बैंक ने कुछ ही घंटों के भीतर उनके 19,300 रुपये जारी कर दिए।

Jitu Munda bank skeleton
छत्तीसगढ़: बंधुआ मजदूरी के चंगुल से बैगा जनजाति के 13 बच्चे कराए गए मुक्त, 8 गिरफ्तार
Jitu Munda bank skeleton
The Mooknayak Visual Story: NCRB डेटा ने तमिलनाडु राज्य सरकार के दावों की पोल खोल दी
Jitu Munda bank skeleton
तमिलनाडु: दलितों के खिलाफ हिंसा में 67 फीसदी की भारी बढ़ोतरी, सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा फासला

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com