नई दिल्ली: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक ताजा रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल सरकार की एक बड़ी विफलता सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 से 2021-22 के बीच खनन परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान राज्य सरकार आदिवासियों के हितों की रक्षा करने में पूरी तरह से नाकाम रही है। गौरतलब है कि यह वह समय था जब राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में थी।
The Hindu की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऑडिट में कुल 66 भूमि अधिग्रहण मामलों की गहन जांच की गई। ये मामले ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) के सालानपुर, श्रीपुर, कुनुस्तोरिया और पारबेलिया क्षेत्रों के साथ-साथ भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के बराकर क्षेत्र से जुड़े हैं।
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले वित्तीय आंकड़े पेश किए हैं। जांच में पता चला कि आदिवासियों की अधिग्रहित जमीन का आकलित बाजार मूल्य 17.79 करोड़ रुपये था, लेकिन ईसीएल और बीसीसीएल ने उन्हें समझौते के जरिए केवल 2.55 करोड़ रुपये का ही भुगतान किया। इस तरह जनजातीय परिवारों को सीधे तौर पर 15.25 करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ा, जो कुल बाजार मूल्य का 85.68 प्रतिशत है।
आर्थिक घाटे का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। खनन कंपनियों ने 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के तहत अनिवार्य 100 फीसदी अनुग्रह राशि (सोलेशियम) का भी भुगतान नहीं किया। इससे गरीब आदिवासियों को 17.80 करोड़ रुपये का अतिरिक्त घाटा हुआ।
इसके साथ ही, कानून के तहत बाजार मूल्य पर 12 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से मिलने वाला अतिरिक्त मुआवजा भी किसी भी मामले में नहीं दिया गया। रिपोर्ट में जमीन की कीमतों में भारी भेदभाव का भी सनसनीखेज खुलासा किया गया है।
सीएजी ने पाया कि जहां एक तरफ आदिवासियों को प्रति एकड़ 2.50 लाख से 12.63 लाख रुपये के बीच का मामूली मुआवजा दिया गया, वहीं दूसरी ओर सरकार को उसी जमीन के लिए 19.77 लाख से 125 लाख रुपये तक की भारी-भरकम राशि का भुगतान किया गया।
ऑडिटर के मुताबिक, 'कोल इंडिया पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन नीति, 2012' के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद जिला प्रशासन आदिवासियों को उनका उचित हक दिलाने में विफल रहा। सीएजी ने इसके लिए राजस्व अधिकारियों और जिला कलेक्टरों जैसे जिला स्तरीय पदाधिकारियों की निष्क्रियता और उनकी गैर-भागीदारी को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया है।
भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से जुड़े ईसीएल के अधिकारियों ने इस पूरे मामले पर अपनी सफाई पेश की है। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में कोयला खनन के लिए जमीन का अनिवार्य अधिग्रहण नहीं होता, बल्कि आदिवासियों सहित जमीन मालिकों से पंजीकृत बिक्री विलेखों के जरिए सीधे खरीद की जाती है।
अधिकारियों के अनुसार, 'पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम, 1955' के तहत आदिवासी जमीन खरीदने के लिए राजस्व अधिकारी की अनुमति अनिवार्य होती है। राज्य सरकार के पंजीकरण और स्टाम्प राजस्व निदेशालय द्वारा तय किए गए बाजार मूल्य के आधार पर ही परियोजना अधिकारी-सह-जिला कल्याण अधिकारी जमीन का ट्रांसफर मूल्य निर्धारित करते हैं।
कंपनी का यह भी तर्क है कि ये अनुमतियां समयबद्ध होती हैं और ईसीएल को पंजीकृत लेनदेन का प्रमाण जिला प्रशासन को सौंपना होता है। इसके अलावा, कंपनी आजीविका के नुकसान की भरपाई के लिए हर दो एकड़ जमीन की खरीद पर एक रोजगार भी उपलब्ध कराती है।
इन दलीलों के बावजूद सीएजी ने पुनर्वास उपायों में गंभीर खामियां उजागर की हैं। ईसीएल के कुनुस्तोरिया और पारबेलिया क्षेत्रों में अधिग्रहण से पहले कोई सामाजिक-आर्थिक या सामाजिक प्रभाव आकलन सर्वेक्षण नहीं किया गया था। जबकि परियोजना प्रभावित लोगों की पहचान करने और 'पुनर्वास कार्य योजना' (RAP) तैयार करने के लिए यह सर्वेक्षण बिल्कुल अनिवार्य था।
रिपोर्ट के अनुसार, कई जगह पुनर्वास कार्य योजनाएं या तो बनाई ही नहीं गईं या फिर उनमें जिला प्रशासन को शामिल नहीं किया गया, जो सीधे तौर पर कोल इंडिया की नीति का उल्लंघन है।
जब इस लापरवाही पर जवाब मांगा गया तो ईसीएल-कुनुस्तोरिया ने तर्क दिया कि सीधी खरीद के कारण जिला कलेक्टर की संलिप्तता लागू नहीं होती है। वहीं, बीसीसीएल-बराकर ने कहा कि मुआवजे का फैसला जमीन मालिकों के साथ आपसी बातचीत से हुआ है। सीएजी ने इन दोनों दलीलों को खारिज करते हुए इन्हें 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के असंगत बताया है। वहीं, सालानपुर, श्रीपुर और पारबेलिया क्षेत्रों ने इस मुद्दे पर कोई जवाब ही नहीं दिया।
सीएजी ने राज्य सरकार को सख्त हिदायत दी है। ऑडिट संस्था ने सिफारिश की है कि ईसीएल और बीसीसीएल द्वारा किए जाने वाले भूमि अधिग्रहण में जिला कलेक्टरों की सक्रिय भागीदारी हर हाल में सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके साथ ही, कोल इंडिया को खनन परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासियों के उचित पुनर्वास की निगरानी के लिए विशेष परियोजना समूहों का गठन करना चाहिए।
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