पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में 'अवैध' गैर-आदिवासी वोटर? तेलंगाना हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार से तलब किया जवाब

आदिवासी क्षेत्रों की मतदाता सूची में फर्जीवाड़े का आरोप, तेलंगाना हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार से मांगा विस्तृत जवाब।
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(सांकेतिक तस्वीर)
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हैदराबाद: तेलंगाना उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार को एक बेहद अहम निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन 'आदिवासी सेना' की एक जनहित याचिका पर दोनों से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। इस याचिका में चुनाव अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वर्तमान में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के दौरान एजेंसी क्षेत्रों की मतदाता सूची से अवैध रूप से पंजीकृत गैर-आदिवासी मतदाताओं के नाम तुरंत हटाए जाएं।

गौरतलब है कि ये एजेंसी क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। इन विशेष क्षेत्रों को मुख्य रूप से आदिवासियों के स्थानीय भूमि अधिकारों, उनकी अनूठी संस्कृति और स्वशासन को बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से नामित किया गया है।

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जीएम मोहिउद्दीन की खंडपीठ कर रही है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित पक्षों को निर्देश जारी किए हैं और अगली सुनवाई को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है।

आदिवासी सेना के अध्यक्ष एम. दौलत राव और संगठन के अन्य सदस्यों ने अपनी याचिका में कई गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। उनका आरोप है कि अनुसूचित क्षेत्रों में गैर-आदिवासी प्रवासियों को मतदाता के रूप में शामिल करना उन्हें अवैध रूप से मतदान का अधिकार देता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह पूरी प्रक्रिया अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू होने वाली वैधानिक और संवैधानिक व्यवस्था के बिल्कुल विपरीत है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पेश हुए वकील सीएच. रवि कुमार ने दलील दी कि आदिवासी सेना इस मुद्दे पर लगातार आवाज उठा रही है। उन्होंने बताया कि संगठन ने मुख्य चुनाव आयुक्त और तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को कई ज्ञापन सौंपे हैं। इन ज्ञापनों में उन अवैध मतदाताओं के नाम हटाने का अनुरोध किया गया है, जिन्होंने निवास प्रमाण पत्रों में हेरफेर करके धोखाधड़ी से एजेंसी क्षेत्रों की मतदाता सूची में अपनी जगह बना ली है।

अपनी याचिका में उन्होंने अदालत से वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया को अवैध घोषित करने की अपील भी की है। साथ ही अयोग्य गैर-आदिवासी मतदाताओं की पहचान कर उन्हें हटाने के लिए गणना प्रपत्रों की सख्त और पारदर्शी जांच के निर्देश मांगे हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में मतदाता सूची में किसी भी नए नाम को जोड़ने के लिए ग्राम सभा की मंजूरी और एकीकृत आदिवासी विकास एजेंसी (आईटीडीए) की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

इसके अलावा, चुनाव प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण देने की भी मांग उठाई गई है। याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि संशोधित मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से पहले लंबित ज्ञापनों पर त्वरित कार्रवाई के लिए अंतरिम निर्देश जारी किए जाएं। बता दें कि आईटीडीए राज्य सरकार की विशेष एजेंसियां हैं, जिनका मुख्य कार्य इन एजेंसी क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के समग्र कल्याण और विकास को गति देना है।

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