सरकारी आवासीय स्कूलों की बदहाली पर आदिवासी छात्रों का हल्ला बोल, नासिक से मुंबई तक 180 किलोमीटर का पैदल मार्च

महाराष्ट्र के आश्रम स्कूलों में खराब सुविधाओं, बासी भोजन और मंत्री अशोक उइके के इस्तीफे की मांग को लेकर हजारों आदिवासी छात्रों ने नासिक से मुंबई तक 180 किलोमीटर लंबे पैदल मार्च का शंखनाद कर दिया है।
Tribal students march, Nashik to Mumbai
महाराष्ट्र के आश्रम स्कूलों की बदहाली के खिलाफ नासिक से मुंबई तक 180KM के मोर्चे पर निकले आदिवासी छात्र।
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महाराष्ट्र में सरकारी आवासीय विद्यालयों की बदहाली के खिलाफ आदिवासी छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा है। बेहतर सुविधाओं, सुरक्षा और जवाबदेही की मांग को लेकर सैकड़ों छात्र सोमवार 28 सितंबर को नासिक से मुंबई तक लगभग 180 किलोमीटर का पैदल मार्च निकाल रहे हैं।

इस विशाल मोर्चे का नेतृत्व 'सकल आदिवासी विद्यार्थी आंदोलन कृति समिति' कर रही है। नासिक के ईदगाह मैदान में पिछले 40 दिनों से छात्रों का धरना जारी था, जिसके बाद अब सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस लंबे मार्च का फैसला लिया गया है।

प्रदर्शन स्थल पर एक अस्थायी पंडाल बनाया गया है, जिसकी छत से विरोध की तारीख बताने वाली एक छोटी स्लेट लटकी हुई है। यहां बिरसा मुंडा, भगत सिंह और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पोस्टर लगे हैं, जिनके बीच छात्र बारी-बारी से धरने पर बैठते हैं।

प्रदर्शनकारी छात्रों की मुख्य मांगों में महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके का इस्तीफा और विभाग के सचिव व आयुक्त का तबादला शामिल है। इसके अलावा वे आदिवासी स्कूलों और हॉस्टलों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की मांग कर रहे हैं।

छात्रों ने आवासीय विद्यालयों में बच्चों की मौत की स्वतंत्र जांच और पीड़ित परिवारों को आर्थिक मदद देने की भी जोरदार मांग उठाई है। वे आश्रम स्कूलों के लिए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने पर जोर दे रहे हैं।

अपनी इन सभी मांगों को लेकर छात्रों ने सीधे मुख्यमंत्री से मुलाकात का समय मांगा है। सरकार को पहले ही सौंपे गए एक ज्ञापन में आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को बरकरार रखने के लिए व्यापक नीतिगत बदलावों की वकालत भी की गई है।

ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि छात्रों से डोनेशन या अतिरिक्त फीस वसूलने वाले शिक्षण संस्थानों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

आदिवासी नेता राहुल पावरा ने बताया कि पिछले महीने सरकार ने पुणे और नागपुर के प्रदर्शनकारियों से चर्चा की थी, जिसमें नासिक के लोग शामिल नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने उन्हें केवल झूठे आश्वासन दिए हैं।

पावरा के अनुसार, वे नासिक, खानदेश, उत्तर महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ के छात्रों के संपर्क में हैं। उन्हें उम्मीद है कि मार्च के पहले दिन ही करीब 1,500 छात्र इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बनेंगे।

सुरगाणा के एक निजी अस्पताल में नर्स के तौर पर काम करने वाली 24 वर्षीय ज्योति गावित ने शिक्षा के नाम पर हो रही वसूली पर गंभीर सवाल उठाए। उनके भतीजे ने भी नासिक के इस प्रदर्शन में हिस्सा लिया है।

ज्योति ने बताया कि सरकार भले ही मुफ्त शिक्षा का दावा करती है, लेकिन छात्रों से एडमिशन और डोनेशन के नाम पर एक लाख रुपये तक मांगे जाते हैं। उन्होंने सवाल किया कि गरीब आदिवासी इतना पैसा कहां से लाएंगे और इस व्यवस्था पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।

प्रदर्शनकारियों ने आदिवासी स्कूलों को सेंट्रल किचन से मिलने वाले भोजन पर भी चिंता जताई है। नासिक के एक कॉलेज में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा 25 वर्षीय लक्ष्मी का कहना है कि उन्हें सेंट्रल किचन बिल्कुल नहीं चाहिए क्योंकि वहां से बच्चों को बासी और एक्सपायर हो चुका खाना परोसा जाता है।

लक्ष्मी ने बताया कि रात 12 बजे बना खाना 100 किलोमीटर दूर स्कूलों में सुबह 8 बजे बांटा जाता है। उन्होंने कहा कि सर्दियों को छोड़कर बाकी मौसम में इस तरह से लाया गया खाना खराब हो जाता है।

दूसरी ओर, सरकार का दावा है कि सेंट्रल किचन 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले आवासीय विद्यालयों में ही भोजन पहुंचाते हैं। इस मुद्दे की जांच के लिए सरकार ने एक समिति का गठन किया है, जिसे तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है।

जव्हार के एक आदिवासी स्कूल में वॉर्डन के रूप में कार्यरत विक्रम गव्हाणे ने समिति के गठन को ही गैर-जरूरी बताया है। उनका कहना है कि सेंट्रल किचन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर कोई लेबल या एक्सपायरी डेट नहीं होती, जिससे गुणवत्ता का कोई अता-पता नहीं रहता।

विक्रम ने आरोप लगाया कि कागजों पर तो स्कूलों में बासमती चावल बंटने की बात कही जाती है, लेकिन हकीकत में परोसे जाने वाले चावल की क्वालिटी बेहद खराब होती है। जमीनी स्तर पर कोई भी सुविधा ठीक से काम नहीं कर रही है।

इस बीच, 25 सितंबर को आदिवासी विकास विभाग ने छात्र नेताओं के साथ एक बैठक की थी। इसके बाद विभाग ने एक सात पन्नों का पत्र जारी किया, जिसमें 27 में से मानी गई मांगों और कुछ मांगों को न मानने के कारण विस्तार से बताए गए।

सरकार ने जानकारी दी है कि आवासीय स्कूलों और हॉस्टलों के बाथरूम में गर्म पानी जैसी सुविधाएं देने के लिए टेंडर और वर्क ऑर्डर जारी कर दिए गए हैं।

सरकार अब तक छात्रों के साथ कई दौर की बातचीत कर चुकी है और उन्हें लिखित आश्वासन भी दे चुकी है। प्रशासन का कहना है कि छात्रों की कुछ मांगें सीधे तौर पर नीतिगत फैसलों से जुड़ी हैं, जिन पर अंतिम मुहर उच्च स्तर पर ही लगाई जा सकती है।

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