तमिलनाडु फैक्ट्री गैस लीक: झारखंड के 39 मजदूर 6 दिनों से एक हॉल में ठुंसे, न सोने की जगह, न खाने-पीने की सुध!

घर वापसी के लिए सरकार से गुहार
झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, जो बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है।
झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, जो बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है।
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तिरुवल्लूर- तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में 21 जून को एक सीफूड प्रोसेसिंग फैक्ट्री में हुए अमोनिया गैस लीक हादसे ने न केवल कई मजदूरों की जान ली, बल्कि सैकड़ों प्रवासी श्रमिकों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस दर्दनाक घटना में झारखंड की प्रीति देवी (प्रीति) समेत कुल 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई घायल हैं। विशेष रूप से झारखंड के 39 मजदूर अब एक सप्ताह से ज्यादा समय से तिरुवल्लूर के एक प्राइवेट हॉल में ठुंसे हुए हैं, जहां उन्हें न तो ठीक से सोने की जगह मिल रही है और न ही घर वापसी का कोई ठोस आश्वासन। अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारें वापस ले जा चुकी हैं, लेकिन झारखंड सरकार/ प्रशासन की उदासीनता इन मजदूरों को और परेशान कर रही है।

21 जून को पेरियापालयम के पास कन्निगापैर/मंजंगरनई इलाके में स्थित सेंट पीटर एंड पॉल सीफूड प्रोसेसिंग एंड एक्सपोर्ट कंपनी में अचानक अमोनिया गैस का रिसाव हो गया। यह गैस फैक्ट्री के रेफ्रिजरेशन या प्रोसेसिंग सिस्टम से लीक हुई और तेजी से फैल गई। फैक्ट्री परिसर में करीब 120 प्रवासी मजदूर, ज्यादातर महिलाएं, असम, ओडिशा, झारखंड, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से काम कर रही थीं। गैस के संपर्क में आने से सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, आंखों में जलन और कुछ मामलों में मुंह-नाक से खून बहने जैसी गंभीर समस्याएं शुरू हो गईं।

NDRF, फायर ब्रिगेड, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। 67 से ज्यादा प्रभावित मजदूरों को अस्पताल पहुंचाया गया, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई गई। कुछ को चेन्नई के राजीव गांधी गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल (RGGGH) और अन्य बेहतर सुविधाओं वाले अस्पतालों में शिफ्ट किया गया। शुरुआती दिनों में मौत का आंकड़ा 5-7 था, जो बढ़कर 15 हो गया। इनमें प्रीति देवी (धनबाद, झारखंड) 26 जून को अस्पताल में दम तोड़ गईं। दो अन्य झारखंडी मजदूर अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं।

घटना के बाद फैक्ट्री प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने बचे हुए झारखंडी मजदूरों को एक प्राइवेट मैरिज हॉल में शिफ्ट कर दिया। एक वीडियो में मजदूरों का एक प्रतिनिधि, जोड़कर बैठे सैकड़ों साथियों के बीच खड़े होकर बताता है कि वे एक हॉल में सिमटे हुए हैं। फर्श पर सोना पड़ रहा है, भीड़ ज्यादा है, पंखे हैं लेकिन पर्याप्त आराम की कोई व्यवस्था नहीं। वे लगातार कह रहे हैं- “हम तुरंत घर जाना चाहते हैं, लेकिन झारखंड सरकार से कोई संपर्क नहीं हो रहा है।”

झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, वे बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है। झारखण्ड जनाधिकार महासभा ने X पर पोस्ट कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अन्य नेताओं से अपील की है कि तुरंत इन मजदूरों की वापसी की व्यवस्था की जाए।

वीडियो में मजदूर भावुक होकर कहते हैं कि वे परिवार से दूर, परेशान और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। निराशा और बेबसी का भाव उनके चेहरों पर साफ दिखता है। वे दावा करते हैं कि हॉल में रहने की स्थिति खराब है और उन्हें जल्द घर पहुंचने की जरूरत है ताकि परिवार की देखभाल कर सकें और आगे का काम देख सकें।

तमिलनाडु सरकार ने हादसे की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। कंपनी के मालिकों से पूछताछ हो रही है, FIR दर्ज हुई है। स्वास्थ्य विभाग ने बुलेटिन जारी कर मौतों की पुष्टि की। तिरुवल्लूर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर एस. कविता ने पुष्टि की कि झारखंड लेबर डिपार्टमेंट से समन्वय चल रहा है।

झारखंड सरकार की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान या संपर्क की पुष्टि नहीं हुई है, जो मजदूरों और उनके परिवारों में आक्रोश पैदा कर रही है। यह हादसा प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा, फैक्ट्री में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और आपात स्थिति में राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी को उजागर करता है। अमोनिया जैसी खतरनाक गैस का इस्तेमाल करने वाली इकाइयों में सख्त सेफ्टी प्रोटोकॉल क्यों नहीं लागू? क्या नियमित निरीक्षण होते हैं? प्रवासी मजदूरों के लिए स्पेशल हेल्पलाइन और रिस्पॉन्स सिस्टम क्यों नहीं?

लेबर क़ानूनों के जानकर कहते हैं कि झारखंड जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर मजदूर बाहर जाते हैं। ऐसे में राज्य सरकार को मजदूर कल्याण बोर्ड को सक्रिय रखना चाहिए, ताकि ऐसी आपदाओं में तुरंत मदद पहुंच सके।

झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, जो बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है।
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झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, जो बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है।
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झारखंड के विभिन्न जिलों से आए ये मजदूर ज्यादातर आदिवासी समुदाय से हैं, जो बताते हैं कि अन्य राज्यों के मजदूरों को उनकी सरकारों ने तुरंत संपर्क कर वापस बुला लिया, लेकिन झारखंड की तरफ से चुप्पी है।
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