
— ✍️Vignesh M. & Dhanraj Jat
दिनेश चौहान (बदला हुआ नाम), बिहार के नवादा जिले से आए 34 वर्षीय प्रवासी मज़दूर हैं, जो राजस्थान के बालोतरा की एक टेक्सटाइल फैक्ट्री में ₹34,000 महीना कमाते थे। उन्होंने पिछले बीस सालों में बालोतरा में ही अपना परिवार बसाया और इसी कमाई के सहारे अपना घर बनाने के लिए हर महीने ₹10,000 का ऋण चुका रहे थे। 2 जून को एक फ़ोन ने यह सब खत्म कर दिया — फैक्ट्री मालिक ने अचानक कारखाना बंद कर दिया और दिनेश को वापस गाँव जाने को कहा। बिना किसी बचत, सामाजिक सुरक्षा या बकाया मज़दूरी के, दिनेश को ₹500–600 रोज़ की निर्माण काम की दिहाड़ी पर जाने को मजबूर होना पड़ा। अपने कौशल और औद्योगिक काम की दुनिया से दूर, एक अकुशल मज़दूर की तरह धूप में काम करना उनके लिए मुश्किल रहा और दो दिन बाद ही दिनेश को काम छोड़ना पड़ा।
दिनेश की यह स्थिति एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है: सुप्रीम कोर्ट और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आदेश पर जोधपुर, पाली और बालोतरा के टेक्सटाइल और स्टील उद्योग केंद्रों में 1,400 से अधिक फैक्ट्रियों के अचानक बंद होने से पश्चिमी राजस्थान में एक लाख से अधिक मज़दूर फँस गए हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार से आए इन ज़्यादातर प्रवासी मज़दूरों के लिए इन उद्योगों का बंद होना एक मानवीय और आर्थिक संकट बन गया है। पर्यावरण रेग्युलेशन, सरकारी लापरवाही और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों की उपेक्षा किस तरह आपस में जुड़े हुए हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण जोधपुर, बालोतरा और पाली में मज़दूरों पर बीत रही बेरोज़गारी का संकट है।
बालोतरा में टेक्सटाइल मज़दूर यूनियन का कहना है कि 70% से अधिक प्रवासी मज़दूर पहले ही अपने घर लौट चुके हैं या कहीं और चले गए हैं। जो अभी रुके हैं, वे या तो ऐसी बकाया मज़दूरी का इंतज़ार कर रहे हैं जो शायद उन्हें कभी न मिले, या फिर इस उम्मीद में हैं कि किराए और कर्ज़ का दबाव उन्हें बाहर निकाले, उससे पहले फैक्ट्रियाँ फिर से खुल जाएँगी।
उद्योगों के प्रदूषण के कारण बंद होने की यह स्थिति असल में वर्षों की व्यवस्थागत लापरवाही का नतीजा है। वर्षों तक फैक्ट्री मालिकों और कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) ऑपरेटरों ने ट्रीटमेंट प्लांटों को नज़रअंदाज़ करते हुए जोधपुर की जोजरी, बांडी और लूनी नदियों में बिना साफ़ किया पानी डाला जाता रहा। फैक्ट्रियों और शहर का गंदा पानी इन नदियों में सीधे छोड़ दिया जाता था। निगरानी समितियों ने बाद में मिट्टी के नीचे छिपी अवैध चार किलोमीटर लंबी पाइपलाइनें, टैंकरों के ज़रिए ज़हरीले कचरे का गैरकानूनी निपटान, और CETP परिसरों में जमा खतरनाक कचरे का खुलासा किया। नदियाँ काली हो गईं, ज़मीन के नीचे का पानी ज़हरीला हो गया, और हज़ारों बीघा ज़मीन बंजर हो गई।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने आखिरकार राज्य को कार्रवाई करने पर मजबूर किया। साफ़ नदियों की यह माँग पर्यावरण की नज़र से ज़रूरी है, लेकिन राज्य की बेढंगी कार्यान्वयन योजना ने इसकी कीमत हाशिये पर मौजूद मज़दूरों पर डाल दी है।
जब फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, तो कोई औपचारिक सूचना नहीं दी गई, कोई अग्रिम योजना नहीं बनी और कोई सुरक्षा की तैयारी नहीं थी। जोधपुर और बालोतरा के मज़दूरों का कहना है कि उन्हें न कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) मिला, न भविष्य निधि (PF), क्योंकि उन्हें ज़्यादातर नकद में, बिना किसी रिकॉर्ड के भुगतान किया जाता था।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से आए महेश पांडे, 30, अपनी ज़िम्मेदारियों में जकड़े हुए हैं। वे कहते हैं, "हमारा हाउसिंग लोन ₹12,000 महीना है। मेरे बच्चे यहाँ एक प्राइवेट स्कूल में एलकेजी और पहली कक्षा में पढ़ते हैं। मेरे पास उनकी फीस भरने के लिए पैसे नहीं हैं।" उनके मालिक ने उन्हें उसी फैक्ट्री में सुरक्षा गार्ड की अस्थायी नौकरी दी है, ₹15,000 महीना — जो पहले मिलने वाले ₹30,000 की आधी है। अगर फैक्ट्री आने वाले हफ्तों में नहीं खुली, तो वे भी घर चले जाएँगे।
महेश की यह मजबूरी मज़दूरों की बस्तियों में हर तरफ गूँजती है। वे कहते हैं, "मुझे सबसे ज़्यादा खाने की चिंता नहीं है, चिंता कर्ज़ की है।" जोधपुर में स्टील और टेक्सटाइल उद्योगों में काम करने वाली महिलाएँ शहरी जीवन की मुश्किल आर्थिक परिस्थितियों और अचानक आई बेरोज़गारी का सामना कर रही हैं। 12 घंटे की शिफ्ट के लिए ₹12,000 कमाने वाली इन महिलाओं से मकान मालिक ₹2,000 से ₹5,500 तक किराया माँग रहे हैं, और माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ घर और शादी के लोन की किश्तें वसूलने पर अड़ी हैं, जिन्हें चुकाना अब इन्हें नामुमकिन लगता है।
वैश्विक-राजनीतिक तनावों ने गैस सिलेंडर का भाव लोकल ब्लैक मार्केट में ₹3,000 तक पहुँचा दिया है, जिससे परिवारों के भोजन का बजट और बिगड़ गया है। मज़दूरी रुकने से प्रवासी मज़दूरों का वह सहयोग भी रुक गया है, जो वे बिहार और उत्तर प्रदेश में अपने घरों पर ₹2,000 से ₹5,000 महीने भेजते थे।
जो थोड़े-बहुत क्षेत्र इन मज़दूरों को काम दे सकते थे, जैसे हैंडीक्राफ्ट, वे भी इस स्थिति का फ़ायदा उठा रहे हैं, कम मज़दूरी देते हैं और मज़दूरों को रखने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि स्टील और टेक्सटाइल उद्योग फिर शुरू होने पर मज़दूर वहाँ लौट जाएँगे।
यहाँ मज़दूर पर्यावरण संबंधी कार्रवाई के विरोधी नहीं हैं; उनकी नाराज़गी इस बात पर है कि इसकी कीमत सिर्फ़ उन्हें चुकानी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश के कानपुर से आए विपिन, 22, जो ₹18,000 महीना कमाते थे, कहते हैं, "सरकार ने मज़दूरों के बारे में नहीं सोचा। ग़ैर-ज़िम्मेदार मालिक इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। हम दूसरों की गलतियों की कीमत चुका रहे हैं।"
AITUC और बालोतरा की मेसराइज यूनियन समेत मज़दूर यूनियनों ने ले-ऑफ मुआवज़े और वैकल्पिक रोज़गार की माँग को लेकर ज्ञापन सौंपे हैं। AITUC के बाड़मेर जनरल सेक्रेटरी हनुमान राम कहते हैं, "सरकार असुरक्षित मज़दूरों की रक्षा नहीं कर पाई — उस संकट से, जिसके लिए वे ज़िम्मेदार नहीं थे।"
राजस्थान, भारत के औद्योगिक गलियारों के सामने आने वाली चुनौतियों की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है। पर्यावरण न्याय पर कोई समझौता नहीं हो सकता, लेकिन इसे सिर्फ़ अनुपालन रिपोर्टों और ट्रीटमेंट प्लांटों से नहीं मापा जा सकता। इसमें उन मज़दूरों का भी हिसाब होना चाहिए जिनकी रोज़ी-रोटी तब छिन ली जाती है, जब लंबे समय से टाले गए नियम अचानक से लागू होते हैं। असली सवाल "साफ़ नदियाँ बनाम रोज़गार" का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या ग्रीन इकॉनमी असंगठित मज़दूरों को भूख और विस्थापन में धकेले बिना भी बनाई जा सकती है?
इस बीच, पर्यावरणीय बंदी एक कानूनी वेक्यूम में चल रही है, जिसमें मज़दूरों को महज़ "नुकसान का हिस्सा" मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यह बदलना चाहिए: न्यायिक और सरकारी हस्तक्षेपों को पर्यावरण सुरक्षा के साथ मज़दूर अधिकारों को भी सख्ती और कानूनी रूप से जोड़ना चाहिए। सालों की रेग्युलेटरी विफलता और कॉरपोरेट लालच की सज़ा राज्य और प्रदूषण फैलाने वालों को मिलनी चाहिए, न कि दिनेश जैसे मज़दूरों को, जो चिलचिलाती गर्मी में अपनी कमर तोड़ मेहनत करके एक ऐसी ज़हरीली नदी की कीमत चुका रहे हैं, जिसे उन्होंने कभी गंदा किया ही नहीं।
-विग्नेश एम. और धनराज जाट, आजीविका ब्यूरो से जुड़कर पश्चिमी राजस्थान के औद्योगिक शहरों में प्रवासी श्रमिकों के साथ काम करते हैं।
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