TM Ground Report: पन्ना के सैकड़ों गांवों में गहराया जल संकट, खेती और जिंदगी दोनों पर संकट!

मकड़ी कुठार जैसे गांवों में आदिवासी परिवारों को एक-एक बूंद पानी के लिए रोजाना करना पड़ रहा संघर्ष, फसल उत्पादन में आई भारी गिरावट
पन्ना में जल संकट
पन्ना में जल संकट
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भोपाल/पन्ना। “पानी नहीं है तो खेती कैसे करें…और खेती नहीं होगी तो घर कैसे चलेगा?” पन्ना जिले के मकड़ी कुठार गांव के मंधारी आदिवासी की ये बात पूरे बुंदेलखंड के जल संकट की कहानी बयां कर देती है। मंधारी बताते हैं, कभी खेती उनका सहारा हुआ करती थी, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बारिश पर निर्भर रहना मजबूरी बन गई है। कई बार तो वे खेत बोने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते, क्योंकि अगर पानी नहीं गिरा तो पूरी मेहनत बेकार चली जाएगी।

वे कहते हैं कि इस बार 5 एकड़ में गेहूं बोया, लेकिन सिर्फ 10 क्विंटल ही उत्पादन हुआ- इतना कम कि पूरे परिवार का गुजारा भी मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा, “अब तो फसल चौपट हो जाती है, मेहनत का कोई फायदा नहीं मिलता,”

बुंदेलखंड क्षेत्र में हर साल की तरह इस बार भी गर्मी की शुरुआत के साथ ही जल संकट गहराने लगा है। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हालात बेहद चिंताजनक होते जा रहे हैं। तालाब सूख रहे हैं, कुओं का जलस्तर गिर चुका है और हैंडपंप-ट्यूबवेल जवाब देने लगे हैं। “द मूकनायक” की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि जिले के सैकड़ों गांव इस समय भीषण पेयजल संकट से जूझ रहे हैं, जहां पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि रोज की जंग बन चुका है।

पन्ना जिले के मकड़ी कुठार गांव की तस्वीरें इस संकट की सच्चाई बयां करती हैं। लगभग पंद्रह सौ लोगों के इस गांव में प्रवेश करते ही आदिवासी बस्ती में महिलाएं, बच्चे और पुरुष हाथों में डिब्बे और बर्तन लिए नजर आते हैं। ये सभी लोग बस्ती से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित एकमात्र सक्रिय स्रोत से पानी लाने के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करते हैं। गाँव में आधे से ज्यादा लोग मजदूरी के लिए पलायन कर चुके है।

यहां पानी भरना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि पूरे दिन की मेहनत है। सुबह से ही परिवार का हर सदस्य पानी की व्यवस्था में जुट जाता है। छोटे-छोटे बच्चे भी स्कूल जाने की बजाय पानी ढोने में लगे दिखाई देते हैं।

पानी लेने साइकल से जाते गाँव के बच्चे
पानी लेने साइकल से जाते गाँव के बच्चेफ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

हर दिन संघर्ष, हर बूंद की कीमत

मकड़ी कुठार गांव में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि पानी की कमी ने लोगों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर दिया है। यहां पीने के पानी की व्यवस्था करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। दिन की शुरुआत से लेकर अंत तक परिवार के लोग सिर्फ पानी जुटाने में लगे रहते हैं। ऐसे में न तो समय बचता है और न ही संसाधन, जिसके कारण साफ-सफाई, नहाने-धोने और अन्य जरूरी काम पीछे छूट जाते हैं। कई बार तो लोगों को बेहद सीमित पानी में ही पूरे दिन का गुजारा करना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

हैंड पंप का पानी सूखने की कगार पर
हैंड पंप का पानी सूखने की कगार परफ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

इस गांव में मुख्य रूप से गोंड जनजाति के लोग निवास करते हैं, जिनकी आजीविका पहले पूरी तरह खेती पर निर्भर थी। लेकिन लगातार घटते जलस्तर और अनिश्चित बारिश ने उनकी इस जीवनशैली को गहरे संकट में डाल दिया है। खेतों में पानी की कमी के कारण फसलें सही तरीके से तैयार नहीं हो पा रहीं, जिससे उत्पादन लगातार घट रहा है। इसका सीधा असर उनकी आमदनी पर पड़ रहा है और अब कई परिवारों को मजबूरी में मजदूरी या पलायन का सहारा लेना पड़ रहा है। पानी की यह कमी अब सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और भविष्य पर मंडराता हुआ बड़ा संकट बन चुकी है।

5 एकड़ में सिर्फ 10 क्विंटल गेहूं

गांव के निवासी मंधारी आदिवासी की कहानी इस पूरे संकट की गहराई को बयां करती है। उनके परिवार में पांच सदस्य हैं और बीते कई वर्षों से वे लगातार पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। मांधारी बताते हैं कि पहले खेती उनके जीवन का आधार हुआ करती थी, लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि पानी के बिना खेती करना लगभग असंभव हो गया है। हर साल आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं, लेकिन अनिश्चित बारिश उनकी मेहनत पर पानी फेर देती है।

द मूकनायक को व्यथा सुनते मंदारी आदिवासी
द मूकनायक को व्यथा सुनते मंदारी आदिवासीफ़ोटो- द मूकनायक

वे कहते हैं, “अगर अच्छी बारिश हो जाए तभी खेती कर पाते हैं, वरना मजदूरी ही सहारा है।” इस साल भी उन्होंने उम्मीद के साथ 5 एकड़ में गेहूं की बुवाई की थी, लेकिन जब फसल तैयार हुई तो केवल 10 क्विंटल ही उत्पादन मिला। इतनी बड़ी जमीन के मुकाबले यह उत्पादन बेहद कम है, जिससे पूरे साल परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया है। मांधारी बताते हैं कि खेती में लागत और मेहनत दोनों बढ़ रही हैं, लेकिन उत्पादन घटता जा रहा है। ऐसे में उन्हें और उनके परिवार को अब मजदूरी पर निर्भर होना पड़ रहा है, ताकि किसी तरह रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें।

सूखे ने तोड़ी उम्मीदें

मांधारी बताते हैं कि साल 2024 उनके लिए पूरी तरह नुकसान का साल रहा। उस वर्ष बारिश इतनी कम हुई कि उन्होंने खेती करने का जोखिम ही नहीं उठाया। उनका कहना है कि जब आसमान से पानी ही नहीं गिरता, तो जमीन पर मेहनत करने का कोई मतलब नहीं रह जाता। लगातार घटती बारिश और तेजी से गिरते जलस्तर ने खेती को पूरी तरह अनिश्चित और जोखिम भरा बना दिया है।

वे बताते हैं कि पहले जहां समय पर बारिश होने से फसल अच्छी हो जाती थी, वहीं अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। “अब तो फसल चौपट हो जाती है, मेहनत का कोई फायदा नहीं मिलता,” वे कहते हैं। उनकी आवाज में निराशा साफ झलकती है।

मांधारी के अनुसार, हर साल बढ़ते इस संकट ने खेती से उनका भरोसा लगभग खत्म कर दिया है और अब उन्हें मजबूरी में मजदूरी की ओर रुख करना पड़ रहा है, ताकि किसी तरह परिवार का गुजारा हो सके।

बार-बार लौटता सूखा

पन्ना जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का हिस्सा है, जहां सूखा कोई नई या एक बार की समस्या नहीं, बल्कि एक लगातार दोहराने वाली स्थिति बन चुकी है। पिछले दो दशकों में कई ऐसे वर्ष आए हैं जैसे 2002-03, 2012-13, 2015-16 और हाल के 2023-24 जब बारिश सामान्य से काफी कम हुई और पूरे जिले में जल संकट गहराया। इन वर्षों में तालाब सूख गए, कुओं का जलस्तर नीचे चला गया और खेती बुरी तरह प्रभावित हुई। कई बार तो हालात इतने खराब हुए कि किसानों को खेती छोड़ने तक की नौबत आ गई।

दरअसल, पन्ना में समस्या सिर्फ कम बारिश की नहीं, बल्कि बारिश के असमान वितरण और जल प्रबंधन की कमी की भी है। कभी बहुत कम बारिश होती है, तो कभी एक साथ इतनी ज्यादा कि पानी जमीन में समा नहीं पाता। इसके अलावा भूजल का लगातार दोहन, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का उपेक्षित होना भी संकट को और गहरा करता है। यही कारण है कि यहां हर 2-3 साल में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं और इसका सीधा असर ग्रामीणों, खासकर आदिवासी समुदाय की आजीविका और जीवन पर पड़ता है।

द मूकनायक से बातचीत करते हुए एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि गांव में पानी की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि पूरा दिन सिर्फ पानी की व्यवस्था करने में ही निकल जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार के सभी सदस्य, चाहे महिलाएं हों, पुरुष हों या बच्चे हर कोई सुबह से ही पानी लाने की जद्दोजहद में लग जाता है।

ग्रामीणों का आधा दिन पीने के पानी की व्यवस्था करने में निकल जाता है
ग्रामीणों का आधा दिन पीने के पानी की व्यवस्था करने में निकल जाता हैफोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

उन्होंने बताया कि सुबह और शाम का पूरा समय सिर्फ पीने के पानी के इंतजाम में ही बीत जाता है। घर के दूसरे काम और बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है, क्योंकि प्राथमिकता सिर्फ एक ही है, किसी तरह परिवार के लिए पानी जुटाना।

पलायन की ओर बढ़ते कदम

पानी की कमी और लगातार खराब होती फसल के कारण गांव के कई परिवार अब खेती से पूरी तरह निराश हो चुके हैं और उन्हें मजदूरी पर निर्भर होना पड़ रहा है। मंधारी बताते हैं कि उनका बेटा और परिवार के अन्य सदस्य रोज गांव के आसपास काम की तलाश में भटकते हैं, कभी दिहाड़ी मिल जाती है, तो कभी खाली हाथ लौटना पड़ता है। पहले जहां पूरा परिवार अपने खेतों में मेहनत करता था, अब वही लोग मजदूरी के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। खेती से मिलने वाली अनिश्चित आमदनी ने उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर दिया है।

यह स्थिति केवल मकड़ी कुठार गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र की एक बड़ी हकीकत बनती जा रही है। जल संकट ने न सिर्फ खेती को प्रभावित किया है, बल्कि लोगों को अपनी जमीन और पारंपरिक आजीविका से दूर कर दिया है। मजबूरी में कई परिवार गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं, जबकि जो लोग गांव में हैं, वे दिहाड़ी मजदूरी के सहारे जीवन काट रहे हैं। इस बदलती तस्वीर में साफ दिखता है कि पानी की कमी अब केवल संसाधन का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विस्थापन की बड़ी वजह बन चुकी है।

नल-जल योजना तहत लाइन का काम अधूरा!

गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले नल-जल योजना के तहत बनाई जा रही एक बड़ी पानी की टंकी दिखाई देती है। कागजों पर यह योजना गांव की जल समस्या का स्थायी समाधान मानी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। ग्रामीणों के अनुसार, इस टंकी का निर्माण कार्य पिछले एक साल से अधूरा पड़ा है। टंकी खड़ी है, पाइपलाइन भी गांव में बिछा दी गई है, लेकिन अब तक एक बूंद पानी भी सप्लाई नहीं हो सकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से नल-जल योजना का काम चल रहा है, लेकिन इसकी गति इतनी धीमी है कि लोगों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा। पाइपलाइन बिछने के बावजूद घरों तक पानी पहुंचने की कोई उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आती। ऐसे में गांव के लोग आज भी पुराने स्रोतों पर निर्भर हैं और पानी के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करने को मजबूर हैं।

एक वर्ष से चल रहा पानी की टंकी का काम अधूरा
एक वर्ष से चल रहा पानी की टंकी का काम अधूराफोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

द मूकनायक से बातचीत में गांव के उपसरपंच राजू पटेल ने बताया कि मकड़ी कुठार एक जंगल क्षेत्र में स्थित आदिवासी बहुल गांव है, जहां मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। उन्होंने कहा कि नल-जल योजना के तहत पिछले एक साल से पानी की टंकी का निर्माण कार्य चल रहा है, लेकिन आज तक यह पूरा नहीं हो सका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ग्रामीणों को अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस टंकी में पानी कहां से और कैसे लाया जाएगा, क्योंकि गांव ऊंचाई पर बसा हुआ है, जिससे पानी पहुंचाना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

उप सरपंच राजू पटेल ने कहा- "पता नहीं पानी कैसे और कहां से आएगा"
उप सरपंच राजू पटेल ने कहा- "पता नहीं पानी कैसे और कहां से आएगा"द मूकनायक

राजू पटेल ने बताया कि गांव में करीब 1200 मतदाता हैं और लगभग सभी लोग खेती पर निर्भर हैं। लेकिन पानी की कमी ने उनकी खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसके चलते अब किसान मजदूरी करने को मजबूर हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते जल व्यवस्था को दुरुस्त नहीं किया गया, तो गांव की स्थिति और भी खराब हो सकती है।

द मूकनायक से बातचीत में जय आदिवासी संगठन (जयस) की महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष रामबाई गौंड लक्ष्मी ने बताया कि पन्ना जिले के अधिकांश गांव इस समय भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा, " ऐसी स्थिति में प्रशासन को पानी की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा कोई प्रभावी प्रयास नजर नहीं आ रहा है।"

उन्होंने आरोप लगाया कि कई गांवों में नल-जल योजना के तहत पाइपलाइन बिछ चुकी है और करीब एक साल पहले इसकी टेस्टिंग भी की जा चुकी है, बावजूद इसके आज तक पानी की सप्लाई शुरू नहीं हो पाई है। रामबाई गौंड ने सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि योजनाएं कागजों में पूरी दिखाई जाती हैं, लेकिन उनका लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंच रहा है।

सैकड़ों गांवों में गहराता संकट

“द मूकनायक” की टीम द्वारा किए गए दौरे में सामने आया कि पन्ना जिले के सैकड़ों गांवों में जल संकट की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। मकड़ी कुठार, अहिरगुवां, अमझिरिया और बगोनहा जैसे गांवों में हालात लगभग एक जैसे हैं, जहां गर्मी शुरू होते ही जल स्रोत तेजी से सूखने लगते हैं। ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पीने के पानी की व्यवस्था करना बन गई है।

इन गांवों में हैंडपंप सूखने की कगार पर हैं, ट्यूबवेल काम नहीं कर रहे और पारंपरिक जल स्रोत जैसे तालाब और कुएं लगभग खत्म हो चुके हैं। नतीजतन, लोगों को दूर-दराज के स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे उनका रोजमर्रा का जीवन और भी कठिन हो गया है। यह स्थिति साफ तौर पर बताती है कि पन्ना में जल संकट अब व्यापक और गहराता हुआ संकट बन चुका है।

पानी नहीं तो भविष्य नहीं

बुंदेलखंड के इन गांवों में जल संकट अब सिर्फ मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक स्थायी संकट का रूप ले चुका है। पानी की कमी ने लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य तीनों को गहराई से प्रभावित किया है। जब किसी व्यक्ति को पीने का साफ पानी तक उपलब्ध नहीं होता, तो यह सीधे तौर पर उसके सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार पर चोट करता है।

भारतीय संविधान के तहत अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ किया है कि स्वच्छ पेयजल तक पहुंच भी इसी अधिकार का हिस्सा है। ऐसे में पन्ना जैसे क्षेत्रों में पानी की लगातार कमी न सिर्फ एक विकास का मुद्दा है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों के हनन का भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

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