
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने ग्रेट निकोबार में 81,000 करोड़ रुपये के प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट के लिए वन भूमि के इस्तेमाल को लेकर स्थानीय आदिवासियों की एक याचिका का कड़ा विरोध किया है। इस विशाल परियोजना के तहत गलाथिया बे में एक ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, एकीकृत टाउनशिप, सौर और गैस आधारित बिजली संयंत्र के साथ-साथ नागरिक और सैन्य इस्तेमाल के लिए एक नया हवाई अड्डा बनाया जाना है।
एक हालिया ड्राफ्ट मास्टर प्लान में पर्यटन को इस द्वीप के विकास की रीढ़ बताया गया है, जहां तटीय शहर और पोर्ट से जुड़ा एक फाइनेंस हब विकसित करने की योजना है।
लिटिल और ग्रेट निकोबार ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष और सदस्यों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय की पोर्ट ब्लेयर बेंच का दरवाजा खटखटाया है। वे एक मौजूदा जनहित याचिका (PIL) में पक्षकार बनना चाहते हैं, जो 166 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को प्रोजेक्ट के लिए डायवर्ट करने की वन अधिकार अधिनियम (FRA) की प्रक्रिया को चुनौती देती है।
पर्यावरण मंत्रालय, जनजातीय कार्य मंत्रालय और अंडमान-निकोबार प्रशासन के जरिए केंद्र ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि यह कदम बहुत देरी से उठाया गया है और इससे चल रहे मुकदमे का दायरा बेवजह और बढ़ जाएगा।
ट्राइबल काउंसिल के अध्यक्ष बरनबास मंजू, दो ग्राम कप्तानों और निकोबारी समुदाय के एक सदस्य का स्पष्ट कहना है कि उन्होंने जमीन के डायवर्जन के लिए कभी अपनी सहमति नहीं दी। उनका दावा है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत कोई ग्राम सभा आयोजित ही नहीं की गई थी। यह समुदाय हमेशा से दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी तटों पर स्थित अपनी पैतृक भूमि पर वापस लौटने की मांग करता रहा है। पर्यावरण प्रभाव आकलन की जनसुनवाई सहित कई अन्य मौकों पर भी परिषद ने प्रशासन के सामने मौखिक और लिखित रूप से यही गुहार लगाई है।
फिलहाल हाई कोर्ट की बेंच पूर्व केंद्रीय सचिव मीना गुप्ता द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में एफआरए के तहत हुई कार्यवाही की वैधता, ग्राम सभा बुलाने की प्रक्रिया, ग्राम सभा के प्रस्तावों की जांच करने वाली उप-मंडलीय स्तर समिति (SDLC) के गठन और जमीन डायवर्जन के लिए जारी किए गए वन अधिकार रिकॉर्ड (RoFR) प्रमाण पत्र को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि इस प्रमाण पत्र में ग्राम सभाओं की सहमति की बात पूरी तरह झूठी है, क्योंकि जिन बैठकों का हवाला दिया गया है उनमें कोई भी निकोबारी व्यक्ति मौजूद नहीं था।
यह आरओएफआर 18 अगस्त 2022 को जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि वन भूमि को डायवर्ट करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इस पूरे विवाद में एसडीएलसी की वह मंजूरी भी सवालों के घेरे में है, जिस पर अध्यक्ष बरनबास मंजू के अनापत्ति (NOC) हस्ताक्षर मौजूद हैं। याचिका के अनुसार, अध्यक्ष को यह पता ही नहीं था कि वह एसडीएलसी के सदस्य हैं। 13 अगस्त 2022 को हुई बैठक के असली मकसद से भी उन्हें अनजान रखा गया था।
इसके अलावा पूरे समुदाय की ओर से अकेले फैसला लेने का अधिकार उनके पास नहीं था। सच्चाई पता चलने के बाद 22 नवंबर 2022 को उन्होंने एक विस्तृत पत्र लिखकर वन डायवर्जन के लिए दी गई अपनी एनओसी वापस ले ली थी।
इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने सितंबर के अंत में दायर एक हलफनामे में याचिका खारिज करने की मांग की है। अंडमान और निकोबार प्रशासन के आदिवासी कल्याण निदेशालय ने कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि परिषद के अध्यक्ष अपनी ही दी गई सहमति वापस नहीं ले सकते। निदेशालय ने इस सहमति वापसी को प्रक्रियागत रूप से अमान्य करार दिया है।
केंद्र ने अपने हलफनामे में दलील दी है कि वन अधिकार प्रमाण पत्र लगभग चार साल पुराना है और मौजूदा जनहित याचिका दो साल पुरानी है। ऐसे में इस अंतिम चरण में नए लोगों को पक्षकार बनाने से मुकदमे में देरी होगी। सरकार का कहना है कि अगर अदालत याचिकाकर्ताओं को सुनना भी चाहती है, तो उन्हें केवल पहले से उठाए गए मुद्दों पर अपनी बात रखने की अनुमति मिलनी चाहिए, न कि मामले में सीधा पक्षकार बनाया जाना चाहिए क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया उलझ जाएगी।
इससे पहले सरकार ने मीना गुप्ता की जनहित याचिका का भी यह कहते हुए विरोध किया था कि वह अंडमान-निकोबार की निवासी नहीं हैं, लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट की सर्किट बेंच ने उस आपत्ति को खारिज करते हुए मामले की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया था।
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