मजदूर पिता का संघर्ष लाया रंग: ओडिशा के एक ही आदिवासी परिवार के 5 बच्चे बनेंगे डॉक्टर, पेश की मिसाल

ओडिशा के कंधमाल में एक दिहाड़ी मजदूर के 5 बच्चों ने गरीबी को मात देकर पास की NEET परीक्षा, सरकारी मेडिकल कॉलेज में मिला दाखिला।
मजदूर पिता का संघर्ष लाया रंग: ओडिशा के एक ही आदिवासी परिवार के 5 बच्चे बनेंगे डॉक्टर, पेश की मिसाल
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ओडिशा: कंधमाल जिले से एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। यहां के एक गरीब आदिवासी परिवार के पांच बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर मेडिकल की पढ़ाई का रास्ता साफ कर लिया है। हाल ही में दो बहनों और उनकी चचेरी बहन ने प्रतिष्ठित नीट (NEET) प्रवेश परीक्षा पास की है। अब वे राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला ले चुकी हैं।

इस परिवार के मुख्य कर्ताधर्ता एक प्रवासी मजदूर हैं, जो थोड़ी सी खेती भी करते हैं। भीषण आर्थिक तंगी के बावजूद, इन बच्चों ने बहुत छोटी उम्र में ही यह समझ लिया था कि केवल शिक्षा ही उन्हें इस गरीबी के दलदल से बाहर निकाल सकती है। उन्हें पता था कि इस सफलता के लिए अटूट लगन और निरंतर प्रयास की जरूरत होगी।

दारिंगबाड़ी के पहाड़ी और जंगली इलाके में स्थित सिकबाड़ी गांव के रहने वाले 76 वर्षीय ब्रुशी नाइक और 62 वर्षीय अनुसया के सबसे बड़े बेटे बिभीषन नाइक (25) ने सबसे पहले नीट परीक्षा पास कर यह सिलसिला शुरू किया था।

बिभीषन को कोरापुट के शहीद लक्ष्मण नाइक मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला था और वर्तमान में वे वहीं अपनी इंटर्नशिप पूरी कर रहे हैं। उनकी छोटी बहन मोनालिसा (23) भी इसी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं।

अब इस साल परिवार की तीन और बेटियों ने भी इस कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा को पास कर लिया है। सुनेमी (20), अश्रीया (18) और मीनाक्षी (19) को क्रमशः पुरी, बलांगीर और भवानीपटना के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स में दाखिला मिल गया है।

मीनाक्षी दरअसल ब्रुशी के छोटे भाई जिशिया प्रधान की बेटी हैं। हालांकि, बचपन से ही ब्रुशी और अनुसया ने ही उसका पालन-पोषण किया है और उसे अपने बच्चों की तरह ही बड़ा किया है।

अपनी एस्बेस्टस की छत और मिट्टी की दीवारों वाले कच्चे घर में बैठी अनुसया बताती हैं कि वे सभी उन्हीं के बच्चे हैं। परिवार में कुल नौ सदस्य हैं और उनके दो छोटे बेटे अभी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।

इन सभी बच्चों की शुरुआती पढ़ाई दारिंगबाड़ी के स्कूलों में ही हुई। इसके बाद उन्होंने नयागढ़ से इंटरमीडिएट की शिक्षा हासिल की।

परिवार में पहले डॉक्टर बनने जा रहे बिभीषन का कहना है कि उन्होंने खुद अपनी बहन मोनालिसा का मार्गदर्शन किया, जिससे उसने आसानी से परीक्षा पास कर ली। इस सफलता से उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे बाकी तीनों बहनों को कुछ दिनों की कोचिंग के लिए बरहामपुर शहर ले गए।

पढ़ाई के खर्च के बारे में बात करते हुए बिभीषन ने बताया कि उनके पिता बहुत कम पैसे भेज पाते हैं। इसलिए वे स्थानीय बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं और अब तक अपनी और भाई-बहनों की पढ़ाई के लिए 6 लाख रुपये का कर्ज ले चुके हैं।

बिभीषन के अनुसार उनके सभी भाई-बहनों को यह बात स्पष्ट रूप से पता है कि गरीबी दूर करने के लिए उनके पास पढ़ाई में अव्वल आने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

मीनाक्षी कहती हैं कि माता-पिता का संघर्ष ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है। उन्होंने अपने माता-पिता से सादा जीवन और उच्च विचार का पाठ सीखा है। वे बताती हैं कि कई बार उन्हें भूखे भी सोना पड़ा, लेकिन पढ़ाई में उन्होंने हमेशा उत्कृष्टता हासिल करने का प्रयास किया।

कक्षा दो तक पढ़े ब्रुशी शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। उन्होंने जीवन भर हाड़-तोड़ मेहनत की ताकि बच्चों की पढ़ाई में कोई बाधा न आए। वे अपनी छोटी सी जमीन पर धान, अदरक और हल्दी की खेती करते हैं।

कई बार बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे जुटाने की खातिर वे मजदूर के तौर पर काम करने दूसरे राज्यों में भी जाते हैं। इसके अलावा, यह परिवार गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वालों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभार्थी भी है।

ब्रुशी बताते हैं कि उन्हें नहीं पता कि बच्चों ने जिंदगी में यह मुकाम कैसे हासिल किया। फिलहाल उनकी सबसे बड़ी चिंता पांचों बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने की है, जो अब काफी मुश्किल होता जा रहा है। मेडिकल की पढ़ाई बहुत महंगी है और बच्चों को किताबों व अन्य सामग्रियों के लिए और पैसों की जरूरत है।

भले ही मां अनुसया ने कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ली, लेकिन वे जानती हैं कि बच्चों की यह कामयाबी पीढ़ियों से चली आ रही गरीबी की बेड़ियों को तोड़ देगी। वे मुस्कुराते हुए कहती हैं कि उनका काम परिवार के लिए खाना बनाना और बच्चों को अनुशासन में रखना है।

इस साल एमबीबीएस में दाखिला लेने वाली सुनेमी ने बताया कि उन्होंने बहुत पहले ही गरीबी का असली मतलब समझ लिया था। इसलिए वे अपनी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी जरूरतों को सीमित रखती हैं।

वहीं अश्रीया ने कहा कि उन्होंने अपने पिता को उनके लिए ज्यादा कुछ न कर पाने पर परेशान देखा है, इसलिए वे हालात को सुधारने की पूरी कोशिश कर रही हैं।

ब्रुशी के भाई जिशिया प्रधान ने राज्य सरकार से मदद की गुहार लगाई है ताकि परिवार पर आर्थिक बोझ थोड़ा कम हो सके। उनका कहना है कि उनके बच्चे डॉक्टर बनकर स्थानीय लोगों की सेवा करेंगे और पूरे गांव को उन पर गर्व है।

आज भी यह सभी बच्चे अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। गांव से बाहर ऊंची उड़ान भरने की तैयारी के बीच भी वे खेत के काम और मवेशियों की देखभाल में अपने पिता का हाथ बंटाने से पीछे नहीं हटते।

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