नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 6 नवंबर को स्पष्ट किया है कि OBC नॉन-क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर दिए गए उसके 11 मार्च, 2026 के फैसले का असर पुरानी नियुक्तियों पर नहीं पड़ेगा। अदालत ने साफ किया कि इसके तहत पिछले भर्ती वर्षों के सर्विस एलोकेशन (सेवा आवंटन) या वरिष्ठता में कोई व्यापक बदलाव नहीं किया जाएगा। 11 मार्च के फैसले में कोर्ट ने 1993 के उस कार्यालय ज्ञापन को बरकरार रखा था, जिसमें माता-पिता के वेतन और कृषि आय को क्रीमी लेयर की आय सीमा से बाहर रखा गया था।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र सरकार का यह मानना गलत है कि इस फैसले को पूर्वव्यापी प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू करने पर भारी उथल-पुथल मचेगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आशंका जताई थी कि 11 मार्च के आदेश से भर्ती, सेवा आवंटन, वरिष्ठता और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
सरकार ने कई याचिकाओं के माध्यम से कोर्ट को बताया था कि इस फैसले से पिछले दस वर्षों में भरे गए 6.69 लाख आरक्षित पदों की चयन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिनमें 3.7 लाख OBC पद शामिल हैं। सॉलिसिटर जनरल ने विशेष रूप से सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 का जिक्र किया था, जिसके नतीजे 11 मार्च के फैसले से पांच दिन पहले, यानी 6 मार्च को घोषित हुए थे। सरकार को डर था कि इससे उम्मीदवारों की वरिष्ठता, वेतन, पदोन्नति और फाउंडेशन कोर्स पर विपरीत असर पड़ेगा।
इन चिंताओं का समाधान करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैसले का मतलब किसी भी तरह से पुरानी भर्तियों के सर्विस एलोकेशन या सीनियारिटी को बदलना नहीं है। अदालत ने कहा कि यह आदेश उन लोगों को व्यक्तिगत राहत भी नहीं देता है, जो मूल कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे।
सिविल सेवा परीक्षा 2025 के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि भले ही नतीजे 6 मार्च को घोषित हो चुके थे, लेकिन सफल उम्मीदवारों को अभी तक सेवाएं आवंटित नहीं की गई हैं। आवंटन प्रक्रिया लंबित होने के कारण 11 मार्च के फैसले को लागू करने में देरी का कोई भी उचित कारण नहीं है। इस प्रकार, CSE 2025 के जरिए चुने गए OBC उम्मीदवारों का सेवा आवंटन इसी क्रीमी लेयर सिद्धांत के तहत होगा।
इस आदेश को लिखने वाले जस्टिस महादेवन ने स्पष्ट किया कि 11 मार्च का फैसला केवल उन उम्मीदवारों के अधिकारों को तय करता है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इन उम्मीदवारों का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता शशांक रत्नु ने किया था। कोर्ट ने माना कि ये उम्मीदवार OBC श्रेणी के नॉन-क्रीमी लेयर में आते हैं और आरक्षण के लाभ के साथ-साथ अपनी चयन प्रक्रिया में उचित पदस्थापना के हकदार हैं।
पीठ ने यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ताओं को दिए जाने वाले इस लाभ की वजह से किसी अन्य कर्मचारी की वरिष्ठता को कोई नुकसान नहीं होगा। 11 मार्च, 2026 से पहले पूरी हो चुकी चयन या नियुक्ति प्रक्रिया को इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा और न ही नए सिरे से कोई नियुक्ति अभ्यास किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के उस आश्वासन की भी याद दिलाई, जिसमें कहा गया था कि 11 मार्च के फैसले से लाभान्वित होने वाले उम्मीदवारों के लिए 'सुपरन्यूमरेरी' (अतिरिक्त) पद सृजित किए जाएंगे। ये सभी उम्मीदवार OBC आरक्षण की पात्रता शर्तों को पूरी तरह से पूर्ण करते हैं।
अदालत ने ध्यान दिलाया कि जिन लोगों ने इसी तरह के दावे किए हैं, उनके मामले अन्य अदालतों और न्यायाधिकरणों में लंबित हैं। 11 मार्च के फैसले में की गई कानून की व्याख्या के आधार पर संबंधित अधिकारी उन दावों पर उनके गुण-दोष के आधार पर विचार करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत दावों पर कोई राय व्यक्त किए बिना इन मामलों पर निर्णय लेने की समय सीमा को आठ सप्ताह के लिए बढ़ा दिया है, जो पहले छह महीने तय की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार संविधान के अनुसार आरक्षण और क्रीमी लेयर मानदंड से संबंधित अपनी नीति बनाने के लिए स्वतंत्र है। अदालत ने पदों की समानता स्थापित करने या क्रीमी लेयर नीति बनाने में हितधारकों से परामर्श करने के लिए कोई नई समय सीमा तय करने से इनकार कर दिया, क्योंकि यह पूरी तरह से कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र का मामला है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।
यहां सब्सक्राइब करें