
भोपाल। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मझगांय बांध निर्माण से प्रभावित किसानों और आदिवासियों का आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है। विस्थापन, मुआवजे और सर्वे में कथित गड़बड़ियों के विरोध में चल रहा ‘चिता आंदोलन’ रविवार को नौवें दिन भी जारी रहा। ग्रामीणों ने अब आंदोलन को नया रूप देते हुए ‘मिट्टी सत्याग्रह’ शुरू कर दिया है।
प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि बांध परियोजना के कारण उन्हें अपनी जमीन, घर और पुश्तैनी गांव छोड़ने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इसी के विरोध में ग्रामीण अलग-अलग तरीके से अपना प्रदर्शन कर रहे हैं। पहले सांकेतिक चिता बनाई गई, इसके बाद जल सत्याग्रह और मशाल जुलूस निकाला गया। अब ग्रामीण अपने खेत और गांव की मिट्टी को हाथ में लेकर विस्थापन के खिलाफ सत्याग्रह कर रहे हैं।
आंदोलन स्थल पर बना लिया अस्थायी डेरा
आंदोलन में शामिल ग्रामीणों ने अब आंदोलन स्थल पर ही टपरियां बनाकर पक्का डेरा डाल दिया है। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे आंदोलन स्थल से हटने वाले नहीं हैं।
ग्रामीणों ने लंबे समय तक आंदोलन जारी रखने के लिए राशन, पानी और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं भी जुटा ली हैं। इसके चलते आंदोलन अब केवल दिन के समय होने वाला प्रदर्शन नहीं रह गया है। देर रात तक ग्रामीण आंदोलन स्थल पर मौजूद रहते हैं।
रात के समय जलती मशालों के बीच ग्रामीण अपने विस्थापन का दर्द बयां कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनके लिए यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है, बल्कि उनके घर, खेत, सामाजिक जीवन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है।
प्रशासनिक नोटिस और पुलिस दबाव के आरोप
आंदोलनकारियों ने प्रशासन पर आंदोलन को दबाने के लिए नोटिस और पुलिस के माध्यम से दबाव बनाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वाले ग्रामीणों पर कार्रवाई करने के बजाय प्रशासन को उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस के दम पर आंदोलन को खत्म नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, “अगर मुझे जेल भी भेज दिया जाए, तब भी यह सत्याग्रह रुकने वाला नहीं है। यह लड़ाई किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के अस्तित्व और हक की है।”
सर्वे और मुआवजे में धांधली का आरोप
आंदोलनकारियों ने मझगांय बांध परियोजना के लिए किए गए सर्वे और मुआवजे के वितरण में भी कथित गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं। जय किसान संगठन की ओर से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है।
अमित भटनागर का आरोप है कि प्रभावित परिवारों के अधिकारों का सही तरीके से आकलन नहीं किया गया। उनका कहना है कि प्रशासन को केवल यह बताने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि किस परिवार को कितना मुआवजा दिया गया।
उन्होंने सवाल उठाया कि विस्थापितों का कितना हक अभी बाकी है, इसका पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
आंदोलनकारियों की मांग है कि सर्वे, जमीन के रिकॉर्ड, पात्रता और मुआवजे की प्रक्रिया की स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से जांच की जाए, ताकि प्रभावित परिवारों को उनके अधिकार मिल सकें।
‘अपनी ही जमीन पर बैठे हैं, फिर अनुमति की जरूरत क्यों?’
‘मिट्टी सत्याग्रह’ को लेकर आंदोलनकारियों का कहना है कि वे किसी सरकारी रास्ते को रोककर या हिंसक तरीके से प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे अपनी जमीन और गांव में शांतिपूर्वक बैठकर अपनी बात रख रहे हैं।
अमित भटनागर ने कहा कि जिस जमीन पर ग्रामीणों की कई पीढ़ियां पली-बढ़ी हैं, उसी जमीन से बेदखली के खिलाफ आवाज उठाना उनका अधिकार है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन को आंदोलन के तरीके को लेकर कोई आपत्ति है तो वह कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करे, लेकिन पुलिस या प्रशासनिक दबाव के जरिए ग्रामीणों की आवाज को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
देर रात तक जारी है आंदोलन
मझगांय बांध से प्रभावित ग्रामीणों का आंदोलन अब लगातार नए रूप ले रहा है। चिता आंदोलन के बाद जल सत्याग्रह, मशाल जुलूस और अब मिट्टी सत्याग्रह के जरिए ग्रामीण अपने विरोध को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।
आंदोलन स्थल पर ग्रामीणों का डेरा जमना इस बात का संकेत है कि वे लंबी लड़ाई की तैयारी में हैं। वहीं प्रशासन की ओर से आंदोलन को लेकर आगे क्या कदम उठाया जाता है, इस पर भी ग्रामीणों और प्रभावित परिवारों की नजर बनी हुई है।
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