मणिपुर मतदाता सूची विवाद: 37% वोटर वाले आदिवासी इलाकों से कटे 64% नाम, आंकड़ों ने चौंकाया

चुनाव आयोग के नए डेटा से हुआ बड़ा खुलासा: मणिपुर के 19 एसटी विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम भारी संख्या में काटे गए। जानिए कैसे इस छंटनी ने संघर्ष प्रभावित पहाड़ी इलाकों में मताधिकार छिनने की चिंता बढ़ा दी है।
Manipur ethnic conflict
मणिपुर की नई वोटर लिस्ट में भारी फेरबदल। चुनाव आयोग के ताजा डेटा के अनुसार 19 आदिवासी (ST) सीटों से 64% नाम काटे गए हैं। (फाइल फोटो)Pic- The Mooknayak
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नई दिल्ली: मणिपुर में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आंकड़ों ने एक बेहद चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। रविवार, 5 जुलाई को जारी किए गए ड्राफ्ट रोल के विश्लेषण से पता चलता है कि राज्य के 19 अनुसूचित जनजाति (एसटी) विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम असामान्य रूप से बड़ी संख्या में काटे गए हैं। संघर्ष प्रभावित इन पहाड़ी इलाकों में मुख्य रूप से कुकी-जो और नगा समुदायों की आबादी निवास करती है।

आंकड़े बताते हैं कि एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले राज्य के कुल 20.93 लाख मतदाताओं में से इन 19 एसटी क्षेत्रों की हिस्सेदारी मात्र 37.8 प्रतिशत थी। इसके बावजूद, राज्यभर में कुल 1.59 लाख हटाए गए नामों में से 64.2 प्रतिशत (लगभग 1.02 लाख) नाम अकेले इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों से काटे गए हैं।

इसके ठीक विपरीत, शेष 41 विधानसभा क्षेत्रों की स्थिति बिल्कुल अलग है। मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में स्थित इन क्षेत्रों में राज्य के 62.2 प्रतिशत मतदाता रहते हैं। फिर भी, कुल हटाए गए नामों में इनकी हिस्सेदारी केवल 35.8 प्रतिशत (56,850) ही रही। इन 41 सीटों में सेकमाई भी शामिल है, जो मणिपुर की एकमात्र अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीट है।

इसे सरल शब्दों में समझें तो, इम्फाल घाटी के इन 41 क्षेत्रों में काटे गए हर एक नाम के मुकाबले, 19 एसटी क्षेत्रों में लगभग दो मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। कटौतियों में इस भारी असमानता के कारण मणिपुर के कुल मतदाताओं में एसटी क्षेत्रों की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत तक नीचे गिर गई है।

मई 2023 में मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच भड़की जातीय हिंसा के बाद से ही मणिपुर लगातार उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। इस हिंसक संघर्ष के परिणामस्वरूप लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए हैं और 250 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। हालांकि यह विवाद मैतेई और कुकी-जो के बीच शुरू हुआ था, लेकिन इसके कारण कुकी और नगा समुदायों के बीच भी तनाव बढ़ गया है, जिससे हिंसा की नई घटनाएं सामने आई हैं।

एसटी क्षेत्रों के भीतर भी नाम काटे जाने की दर में भारी भिन्नता देखने को मिली है। यह पूरी प्रक्रिया चुराचांदपुर जिले और उसके आसपास के इलाकों में अधिक केंद्रित रही, जो कुकी-जो समुदाय का प्रमुख क्षेत्र है और हालिया संघर्ष का मुख्य केंद्र भी रहा है। इस क्षेत्र के चार एसटी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम 20 प्रतिशत (यानी हर पांच में से एक) मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं।

इन चार में से तीन क्षेत्र अकेले चुराचांदपुर जिले में आते हैं, जिनमें हेंगलेप (25.9 प्रतिशत की कटौती), सिंघाट (24.8 प्रतिशत) और सैकट (21.2 प्रतिशत) शामिल हैं। वहीं, पड़ोसी फेरजावल जिले के थानलॉन में राज्य की सबसे अधिक 27.2 प्रतिशत की कटौती दर्ज की गई। थानलॉन में एसआईआर से पहले 17,291 मतदाता पंजीकृत थे, जिनमें से 4,696 नाम हटा दिए गए।

अगर कुल संख्याओं की बात करें तो, सैकट विधानसभा क्षेत्र से सबसे ज्यादा 14,152 नाम काटे गए हैं। पहले यहां 66,664 मतदाता पंजीकृत थे। अकेले सैकट से काटे गए नाम पूरे मणिपुर से हटाए गए कुल नामों का 9 प्रतिशत हैं।

राज्य भर से हटाए गए कुल 1,58,677 नामों में से आधे से अधिक (51.7 प्रतिशत या 81,983 नाम) केवल 12 एसटी क्षेत्रों से ही हैं। इनमें ऊपर बताए गए चार क्षेत्रों के अलावा चुराचांदपुर, तामेंगलोंग, चंदेल, उखरुल, तेंगनौपाल, नुंगबा, फुंगयार और सैतू विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं।

मतदाताओं के नाम काटे जाने के कारणों में भी सामान्य और एसटी क्षेत्रों के बीच भारी अंतर और असमानता देखने को मिली है। 19 एसटी क्षेत्रों में 76.1 प्रतिशत नाम 'स्थायी रूप से स्थानांतरित' या 'अनुपस्थित' होने के कारण काटे गए, जबकि 40 सामान्य क्षेत्रों में ऐसा होने का आंकड़ा केवल 53.9 प्रतिशत था। दूसरी ओर, सामान्य क्षेत्रों में 41.9 प्रतिशत कटौतियों का कारण 'मृत्यु' दर्ज किया गया, जबकि एसटी क्षेत्रों में मृत्यु के कारण केवल 18.9 प्रतिशत नाम ही काटे गए।

चुनाव आयोग (ईसीआई) ने आधिकारिक तौर पर 'स्थानांतरित' और 'अनुपस्थित' के बीच अलग-अलग आंकड़े प्रदान नहीं किए हैं और अन्य राज्यों की तरह इन्हें एक ही श्रेणी में रखा है। प्रकाशित बूथ-वार सूचियों के विश्लेषण से ही इस पूरे घटनाक्रम की स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकी है।

कई संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों ने राज्य के कई हिस्सों में मौजूदा अस्थिर स्थिति के बीच इस एसआईआर अभ्यास के तरीके पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया है कि संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में विस्थापित हुए या अपने आवश्यक दस्तावेज खो चुके पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।

मणिपुर के वरिष्ठ शिक्षाविद खाम खान सुआन हाउसिंग का मानना है कि 2005 में हुए पिछले एसआईआर के बाद से तेजी से हुआ शहरीकरण और हालिया संघर्षों के कारण आवश्यक दस्तावेजों की कमी, आदिवासी क्षेत्रों में नामों की इस बड़ी कटौती का मुख्य कारण हो सकती है।

म्यांमार, अफगानिस्तान और सीरिया में भारत के पूर्व राजदूत रहे गौतम मुखोपाध्याय, जो पूर्वोत्तर के मुद्दों के जानकार हैं, ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने राहत शिविरों में रहने वाले विस्थापित व्यक्तियों को तो फॉर्म उपलब्ध कराए, लेकिन जो लोग संघर्ष के कारण विस्थापित होकर राज्य के बाहर रह रहे हैं, उनके लिए नामांकन का कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया।

हालांकि, ड्राफ्ट एसआईआर रोल के प्रकाशन के बाद मणिपुर में मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी कर स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि वास्तविक मतदाता अभी भी चल रहे 'दावे और आपत्तियां' चरण के दौरान मतदाता सूची में अपना नाम वापस जुड़वा सकते हैं। इसके लिए उन्हें 4 अगस्त, 2026 तक चुनाव आयोग द्वारा अनिवार्य घोषणा पत्र के साथ नया नाम जोड़ने वाला 'फॉर्म 6' जमा करना होगा।

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