मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में तीन साल के लंबे इंतजार के बाद बृहस्पतिवार, 28 मई 2026 को पहला कुकी गांव फिर से आबाद हो गया है। हालांकि, राहत शिविरों से अभी केवल पुरुष ही अपने घरों को लौटे हैं। महिलाओं और बच्चों सहित उनके परिवार फिलहाल शिविरों में ही अपना जीवन बिता रहे हैं।
खौडांग नामक यह गांव संवेदनशील 'बफर जोन' के बेहद करीब स्थित है। यह वही जगह है जहां चुराचांदपुर जिले की सीमाएं इंफाल घाटी के बिष्णुपुर और काकचिंग जिलों से मिलती हैं। मैतेई बहुल घाटी को कुकी बहुल पहाड़ी इलाकों से अलग करने वाली अलग-अलग चौड़ाई की भूमि की पट्टी को ही बफर जोन कहा जाता है।
कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच 3 मई 2023 को भड़की भीषण जातीय हिंसा के बाद खौडांग के लगभग 200 लोग अपनी जान बचाकर भागने को मजबूर हो गए थे। दहशत के उस माहौल में इन लोगों ने चुराचांदपुर जिले के सुरक्षित और अंदरूनी इलाकों में जाकर शरण ली थी।
अब जिला प्रशासन की मदद से इस गांव को दोबारा बसाने की प्रक्रिया ने आकार ले लिया है। स्थानीय विधायक पाओलिएनलाल हाओकिप ने फीता काटकर इस गांव का औपचारिक उद्घाटन किया और लोगों के रहने के लिए इसे फिर से खोल दिया।
खौडांग गांव के सचिव एम. सोनसेई हाओकिप ने बताया कि जब एक उग्र भीड़ ने उनके ज्यादातर घरों को आग के हवाले कर दिया था, तब ग्रामीणों को जिला मुख्यालय स्थित राहत शिविर में शरण लेनी पड़ी थी। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में जानकारी दी कि उनके गांव में कुल 45 परिवार हैं।
उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से प्रत्येक परिवार को 1.7 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी गई है। इसी धनराशि की मदद से इन परिवारों ने अपने उजड़े हुए घरों का दोबारा निर्माण किया है।
सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल कुछ ही परिवारों के केवल पुरुष सदस्य अपने नए बने घरों की देखभाल और वहां रहने के लिए लौटे हैं। बाकी लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे मुख्य रूप से शामिल हैं, स्थिति पूरी तरह अनुकूल होने पर धीरे-धीरे अपनी वापसी करेंगे।
इस भीषण जातीय हिंसा ने राज्य में गहरा घाव छोड़ा है, जिसमें 260 से अधिक लोगों की जान चली गई। इसके अलावा लगभग 62,000 लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए थे। बफर जोन के पास स्थित गांवों से विस्थापित हुए अधिकांश लोग आज भी राहत शिविरों में ही अपने घर लौटने की राह देख रहे हैं।
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