मणिपुर में तनाव बरकरार: कुकी-जो गुटों के साथ SoO समझौते की मियाद खत्म, गृह मंत्रालय ने साधी चुप्पी

मणिपुर हिंसा के बीच कुकी-जो गुटों के साथ SoO समझौते का विस्तार अधर में, अमित शाह के दौरे और सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती पर टिकी नजरें।
कुकी संगठनों द्वारा मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर.
कुकी संगठनों द्वारा मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक प्रदर्शन के दौरान की तस्वीर.फोटो- राजन चौधरी, द मूकनायक
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नई दिल्ली: मणिपुर में नागा और कुकी समुदायों के बीच जारी हिंसा के बीच एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। कुकी-जो विद्रोही गुटों के साथ केंद्र सरकार के 'सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस' (SoO) समझौते की मियाद खत्म हुए एक महीना बीत चुका है, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अभी तक इसे विस्तार नहीं दिया है।

इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आगामी 7 अक्टूबर को मणिपुर के नागा बहुल जिले सेनापति का दौरा करने वाले हैं। साल 2023 में भड़की हिंसा के बाद यह उनका राज्य का दूसरा दौरा होगा। इससे पहले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अप्रैल 2024 में उन्होंने इंफाल में एक राजनीतिक रैली को संबोधित किया था।

राज्य में सुरक्षा हालात की गंभीरता को देखते हुए 30 सितंबर को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने एक अहम समीक्षा बैठक की थी। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, इस बैठक में मणिपुर में सीआरपीएफ की 30 अतिरिक्त कंपनियां (लगभग 3,000 जवान) और कोबरा (CoBRA) की दो बटालियन (करीब 2,000 जवान) तैनात करने का फैसला लिया गया है।

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय, मणिपुर सरकार और कुकी-जो गुटों के बीच 4 सितंबर 2025 को बातचीत के बाद तय हुए नए नियमों व शर्तों के साथ SoO समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। दरअसल 3 मई 2023 को मैतेई और कुकी-जो समुदाय के बीच भड़की जातीय हिंसा के बाद, राज्य सरकार ने फरवरी 2024 में इस समझौते को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था, जो मूल रूप से 2008 से लागू था।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि जब तक कुकी-जो गुट अपने सभी हथियार पूरी तरह नहीं सौंप देते, तब तक इस समझौते को ठंडे बस्ते में रखा गया है। अधिकारियों का मानना है कि आम नागरिकों के पास बड़ी संख्या में हथियारों की मौजूदगी इस पूर्वोत्तर राज्य में हिंसा और हत्याओं का एक प्रमुख कारण है। इसी वजह से उप-मुख्यमंत्री लोसी दिखो सहित मैतेई और नागा नागरिक समाज के कई समूह इस समझौते को पूरी तरह रद्द करने की मांग कर रहे हैं।

राज्य में नागा-कुकी जातीय तनाव के कारण हालात लगातार चिंताजनक बने हुए हैं। राज्य से राष्ट्रपति शासन हटने के तीन दिन बाद, यानी 7 फरवरी से अब तक उखरुल, कांगपोकपी और कामजोंग जिलों में 40 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।

कुकी-जो SoO समूह के एक सदस्य ने बताया कि एक साल के समझौते की अवधि 4 सितंबर को ही समाप्त हो गई थी, लेकिन उन्हें गृह मंत्रालय या पूर्वोत्तर मामलों के सलाहकार व शांति वार्ता के वार्ताकार अजित लाल की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।

उन्होंने बताया कि वार्ताकार के साथ उनकी आखिरी बैठक 30 अप्रैल को हुई थी। उस वक्त वार्ताकार ने हर तिमाही मिलने का वादा किया था। सदस्य ने निराशा जताते हुए कहा कि फरवरी से राज्य में भारी हिंसा के बावजूद वार्ताकार ने एक बार भी प्रभावित इलाकों का दौरा नहीं किया है।

सदस्य ने यह भी दावा किया कि सुरक्षा बल नियमित रूप से SoO शिविरों का निरीक्षण करते हैं और सभी हथियारों का पूरा हिसाब-किताब रखा जा रहा है। उनके मुताबिक समझौते का विस्तार न होने का मतलब यह कतई नहीं है कि इसे रद्द कर दिया गया है। हो सकता है कि सरकार औपचारिक घोषणा करने से पहले हालात सामान्य होने और धूल बैठने का इंतजार कर रही हो।

इस त्रिपक्षीय समझौते का इतिहास 1990 के दशक में हुए कुकी-नागा संघर्ष से जुड़ा है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। इसके बाद 2008 में यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट (UPF) और 24 विद्रोही गुटों के गठबंधन कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन (KNO) ने गृह मंत्रालय और राज्य सरकार के साथ इस पर हस्ताक्षर किए थे। इन गुटों की मांग कुकी-जो लोगों के लिए एक स्वतंत्र भूमि की रही है। तब से लेकर अब तक इस समझौते को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है।

मई 2023 में जातीय हिंसा भड़कने के बाद घाटी के इलाकों से SoO समझौते को खत्म करने की जोरदार मांग उठने लगी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने दावा किया था कि SoO गुटों ने जमीनी नियमों का उल्लंघन किया है और हिंसा भड़काई है। इस संघर्ष में 250 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हो गए थे।

संशोधित शर्तों के साथ यह नया समझौता 4 सितंबर 2025 को तब साइन किया गया था, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था। यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 13 सितंबर के उस पहले दौरे से कुछ दिन पहले उठाया गया था, जो मई 2023 की जातीय हिंसा के बाद उनका राज्य का पहला दौरा था।

एक मीडिया साक्षात्कार में यूपीएफ के प्रवक्ता आरोन किपजेन ने 18 सितंबर को बताया था कि वे 3 मई 2023 की हिंसा से ठीक एक दिन पहले गृह मंत्रालय और राज्य सरकार के साथ एक राजनीतिक समझौते को अंतिम रूप देने ही वाले थे। यह प्रक्रिया गृह मंत्री अमित शाह के उस सख्त संदेश के बाद तेज हुई थी, जिसमें उन्होंने राजनीतिक समाधान तय करने या समझौता खत्म करने की बात कही थी।

किपजेन के अनुसार, मई 2023 से पहले की बातचीत मुख्य रूप से कार्यकारी, वित्तीय और न्यायिक शक्तियों के साथ एक स्वायत्त व्यवस्था बनाने पर केंद्रित थी। लेकिन हिंसा और कुकी-जो लोगों के विस्थापन के बाद, इन गुटों ने अपनी मांग बदल दी है। अब वे विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश जैसी एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था या उसके समान किसी बड़े संवैधानिक दर्जे की मांग कर रहे हैं।

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