MP के इंदौर में आदिवासी किसानों की जमीन पर इंडस्ट्रीज का कब्जा! 29 परिवारों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जानिए क्या है मामला?

1976 में शासन से मिली 44 एकड़ जमीन को ‘नजूल’ बताकर AKVN के जरिए उद्योग को सौंपने का आरोप, SC/ST एक्ट और PESA कानूनों के उल्लंघन की बात
MP के इंदौर में आदिवासी किसानों की जमीन पर इंडस्ट्रीज का कब्जा!
MP के इंदौर में आदिवासी किसानों की जमीन पर इंडस्ट्रीज का कब्जा!
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भोपाल। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले से एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां 29 आदिवासी किसानों ने जिला प्रशासन पर उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि को नियमों के विपरीत उद्योग को लीज पर देने का आरोप लगाया है। पीथमपुर के पास काली बिल्लोद क्षेत्र स्थित खसरा नंबर 278 की करीब 44 एकड़ जमीन को लेकर उठे इस विवाद ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और आदिवासी अधिकारों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रभावित किसानों का कहना है कि यह जमीन उन्हें वर्ष 1976 में शासन की योजना के तहत आवंटित की गई थी, लेकिन अब उसे गलत तरीके से नजूल भूमि घोषित कर उद्योग को सौंप दिया गया, जिससे उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।

सरकारी योजना के तहत मिली थी जमीन, अब छिनने का आरोप

किसानों के अनुसार, उन्हें यह जमीन उस समय दी गई थी जब शासन ने उन्हें वन भूमि पर काबिज मानते हुए वैध पट्टे प्रदान किए थे। इसके साथ ही राजस्व विभाग द्वारा भू-अधिकार प्रमाण पत्र भी जारी किए गए थे, जिससे यह भूमि उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी। दशकों तक इन परिवारों ने इसी जमीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। लेकिन हाल के घटनाक्रम में इस भूमि की प्रकृति बदलकर इसे नजूल घोषित कर दिया गया, जो कि किसानों के मुताबिक पूरी तरह अवैध और मनमाना कदम है।

नामांतरण में गड़बड़ी और रिकॉर्ड में कथित हेरफेर

मामले में सबसे गंभीर आरोप नामांतरण प्रक्रिया में अनियमितताओं और दस्तावेजों में कथित हेरफेर का है। किसानों का कहना है कि वारिसों के नाम चढ़ाने में जानबूझकर लापरवाही बरती गई, जिसका फायदा उठाकर भूमि के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए। इसी आधार पर मार्च 2025 में इस जमीन को पहले औद्योगिक केंद्र विकास निगम (AKVN) को हस्तांतरित किया गया और बाद में ‘शक्ति पंप इंडस्ट्रीज’ को लीज पर दे दिया गया। किसानों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना पारदर्शिता और कानूनी प्रावधानों के पालन के की गई।

बिना सूचना बेदखली का प्रयास, मौके पर दबाव के आरोप

प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के की गई। प्रशासनिक अमला, पुलिस और उद्योग से जुड़े लोग मौके पर पहुंचे और किसानों पर जमीन खाली करने का दबाव बनाया गया। इस दौरान गाली-गलौज और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। किसानों के मुताबिक, उन्हें अपनी ही जमीन से जबरन हटाने की कोशिश की गई, जिससे वे मानसिक और आर्थिक रूप से टूट गए हैं।

कोर्ट की शरण में किसान, अधिकारियों को नोटिस जारी

न्याय की आस में 16 किसानों ने विशेष SC/ST कोर्ट में 6 अप्रैल 2026 को शिकायत दर्ज कराई, जिस पर उसी दिन सुनवाई भी हुई। कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए इंदौर संभाग के राजस्व आयुक्त को नोटिस जारी कर 26 जून तक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा 22 अप्रैल को किसानों ने हाई कोर्ट में भी रिट याचिका दायर की है, जिसमें कलेक्टर के आदेश को निरस्त करने की मांग की गई है। किसानों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज सोनी का कहना है कि यह मामला न सिर्फ राजस्व नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आदिवासी अधिकारों के हनन का भी गंभीर उदाहरण है।

SC/ST एक्ट और PESA कानून के उल्लंघन का आरोप

किसानों ने आरोप लगाया है कि भूमि हस्तांतरण में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) और पेसा (PESA) कानून सहित अन्य कानूनी प्रावधानों का खुला उल्लंघन किया गया है। आदिवासी भूमि को सामान्य परिस्थितियों में हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और इसके लिए ग्राम सभा की सहमति तथा वैधानिक प्रक्रिया आवश्यक होती है। लेकिन इस मामले में न तो ग्राम स्तर पर राय ली गई और न ही अधिग्रहण की वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई।

जांच की मांग तेज

एडवोकेट नीरज सोनी के मुताबिक, यदि दस्तावेजों में हेरफेर और धोखाधड़ी के आरोप सिद्ध होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य पक्षों पर जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराएं लग सकती हैं। याचिका में इन सभी बिंदुओं को आधार बनाते हुए आपराधिक मामला दर्ज करने और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

मजदूरी को मजबूर हुए परिवार, आजीविका पर संकट

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर उन 29 आदिवासी परिवारों पर पड़ा है, जो वर्षों से इस जमीन पर निर्भर थे।

जमीन छिनने के बाद कई परिवार अब मजदूरी करने को मजबूर हैं। किसानों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई है। अब सबकी नजर कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि इन परिवारों को न्याय मिलेगा या नहीं।

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