MP के खंडवा में वन भूमि पर कब्जा हटाने गई टीम से टकराव! आदिवासियों का आरोप- चार पीढ़ियों से खेती, 4 घंटे में उजाड़ दी बस्ती

नरलाय गांव में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान तनाव, फॉरेस्ट रेंजर का विवादित बयान सामने आया, आदिवासी बोले- 80 साल से रह रहे, मामला हाईकोर्ट में लंबित
MP के खंडवा में वन भूमि पर कब्जा हटाने गई टीम से टकराव! आदिवासियों का आरोप- चार पीढ़ियों से खेती, 4 घंटे में उजाड़ दी बस्ती
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भोपाल। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के मांधाता विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम नरलाय में वन विभाग की जमीन पर कब्जा हटाने की कार्रवाई के दौरान बड़ा विवाद खड़ा हो गया। प्रशासन की टीम जैसे ही मौके पर पहुंची, वर्षों से यहां रह रहे आदिवासी परिवारों ने विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते स्थिति तनावपूर्ण हो गई और वन विभाग के अधिकारियों तथा ग्रामीणों के बीच तीखी बहस और टकराव की स्थिति बन गई।

बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई उस जमीन को लेकर की जा रही थी, जिसे वर्ष 2022 में ओंकारेश्वर में बन रहे अद्वैत लोक परियोजना के बदले वन विभाग को हस्तांतरित किया गया था। प्रशासन के अनुसार करीब 9.36 हेक्टेयर (लगभग 23 एकड़) राजस्व भूमि वन विभाग को सौंपी गई थी, जिस पर अतिक्रमण पाया गया। इसी अतिक्रमण को हटाने के लिए शनिवार को संयुक्त टीम गांव पहुंची।

चार पीढ़ियों से खेती, अचानक उजड़ गई बस्ती

गांव के आदिवासी भील परिवारों का कहना है कि वे इस जमीन पर पिछले 70-80 वर्षों से रह रहे हैं। भैयालाल, ओमप्रकाश, पंचम, जोगिया, अजय बारे और अरुण जैसे ग्रामीणों ने बताया कि उनके पूर्वजों के समय से ही यह जमीन उनके कब्जे में है और उन्होंने बंजर भूमि को खेती योग्य बनाया।

ग्रामीणों का आरोप है कि बिना पर्याप्त सूचना और वैकल्पिक व्यवस्था के महज कुछ घंटों में उनकी बस्ती उजाड़ दी गई। “हमने इस जमीन को अपने श्रम से उपजाऊ बनाया, सिंचाई की व्यवस्था की, लेकिन अब हमें अतिक्रमणकारी बताकर हटा दिया गया,” ग्रामीणों ने कहा।

उनका यह भी कहना है कि उन्होंने कई बार राजस्व विभाग को जुर्माना भी भरा है और इसकी रसीदें उनके पास मौजूद हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि प्रशासन उनके अधिकारों को मान्यता देगा, लेकिन इसके बजाय कार्रवाई कर दी गई।

वीडियो में सामने आया विवादित बयान

कार्रवाई के दौरान का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वन विभाग के रेंजर शंकर सिंह चौहान ग्रामीणों से तीखे शब्दों में बात करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में कथित तौर पर वे कहते सुनाई दे रहे हैं कि “ज्यादा फालतू बात मत करो… सपोर्ट करो, नहीं तो यहीं तुम्हारी कब्र खोद दूंगा।”

इस बयान के सामने आने के बाद पूरे मामले ने और तूल पकड़ लिया है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन न सिर्फ उनकी जमीन छीन रहा है बल्कि उन्हें धमकाया भी जा रहा है।

आवेश में निकले शब्द!

विवाद बढ़ने के बाद रेंजर शंकर सिंह चौहान ने सफाई देते हुए कहा कि मौके पर कुछ युवक उत्पात मचा रहे थे और स्टाफ के साथ अभद्रता कर रहे थे। उनके अनुसार एक युवक पत्थर उठाकर दौड़ा, जिसके कारण स्थिति तनावपूर्ण हो गई और आवेश में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल हो गया।

उन्होंने कहा कि टीम केवल सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने गई थी और कानून के तहत कार्रवाई की जा रही थी।

कार्रवाई के दौरान प्रशासनिक टीम ने जेसीबी की मदद से करीब 10 झोपड़ियों को तोड़ दिया। साथ ही जमीन पर कंटूर ट्रेंच (खाइयां) खोदी गईं, ताकि आगामी बारिश के बाद यहां पौधारोपण किया जा सके।

मौके पर डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, पटवारी और बड़ी संख्या में वन विभाग के कर्मचारी मौजूद रहे। पुलिस बल की तैनाती भी की गई थी ताकि किसी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

द मूकनायक से बातचीत में आदिवासी कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रामू टेकाम ने कहा, “ग्राम नरलाय में जो कार्रवाई की गई है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और अमानवीय है। जिन आदिवासी परिवारों ने पीढ़ियों से इस जमीन को बसाया और उसे खेती योग्य बनाया, उन्हें अचानक अतिक्रमणकारी बताकर उजाड़ देना न्याय के खिलाफ है। यदि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तो प्रशासन को एकतरफा कार्रवाई से बचना चाहिए था।

सबसे गंभीर बात यह है कि मौके पर मौजूद अधिकारी द्वारा जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह न सिर्फ निंदनीय है बल्कि यह आदिवासी समाज के सम्मान पर सीधा हमला है। सरकार को तुरंत इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करनी चाहिए और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास तथा मुआवजे की ठोस व्यवस्था करनी चाहिए।”

अद्वैत लोक परियोजना से जुड़ा है मामला

यह पूरा विवाद उस जमीन से जुड़ा है, जिसे आदि गुरु शंकराचार्य की स्मृति में अद्वैत लोक परियोजना के लिए वन भूमि के बदले राजस्व भूमि के रूप में वन विभाग को दिया गया था। सरकार का कहना है कि ओंकार पर्वत पर बनने वाली इस परियोजना के लिए संरक्षित वन भूमि का उपयोग किया गया, जिसके एवज में नरलाय गांव की जमीन वन विभाग को आवंटित की गई।

हाईकोर्ट में मामला लंबित, फिर भी कार्रवाई का आरोप

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है और मामला अभी विचाराधीन है। इसके बावजूद प्रशासन ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए उनके घरों को तोड़ दिया।

उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी आरोप लगाए हैं कि उनके प्रस्ताव के आधार पर ही यह जमीन वन विभाग को दी गई, जिससे उनकी आजीविका पर संकट आ गया।

प्रशासन पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में तनाव की स्थिति बनी हुई है। एक ओर प्रशासन इसे सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की वैध कार्रवाई बता रहा है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी परिवार इसे अपने अधिकारों और आजीविका पर सीधा हमला मान रहे हैं।

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