गढ़चिरौली: आदिवासियों के 'द्वार पर न्याय' का सपना कैसे उलझा फाइलों में? सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद जागी व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद 7 दिन में हुई नियुक्ति, महीनों तक जज के बिना सूनी रही अहेरी की अदालत, सैकड़ों कैदी रहे परेशान
Supreme Court
सुप्रीम कोर्टफोटो साभार- IANS
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नई दिल्ली/गढ़चिरौली: माओवाद प्रभावित गढ़चिरौली के सुदूर इलाकों में आदिवासियों तक न्याय पहुँचाने की जिस परिकल्पना के साथ अहेरी में अदालत की शुरुआत की गई थी, वह जजों की नियुक्ति में देरी और प्रशासनिक सुस्ती के चलते किस तरह प्रभावित हो रही है, इसका एक जीता-जागता उदाहरण हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में देखने को मिला।

मामला भीमा-कोरेगांव केस के सह-आरोपी सुरेंद्र गडलिंग से जुड़ा है। 21 जनवरी को जब उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2016 के आगजनी के आरोपों से जुड़े एक मुकदमे की सुनवाई अभी तक शुरू भी नहीं हो पाई है, क्योंकि संबंधित कोर्ट में जज और स्थायी सरकारी वकील की अनियमित उपस्थिति है, तो यह व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर गया।

क्या है पूरा मामला?

सुरेंद्र गडलिंग पर 25 दिसंबर, 2016 को सुरजागढ़ खदानों से लौह अयस्क ले जा रहे 76 वाहनों को जलाने की साजिश रचने का आरोप है। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि अहेरी की एक-न्यायाधीश वाली जिला एवं अतिरिक्त सत्र अदालत में उनकी आरोपमुक्ति (डिस्चार्ज) की अर्जी 2022 से लंबित है। कारण यह था कि उस समय वहां न तो कोई जज थे और न ही कोई स्थायी अभियोजक।

इस जानकारी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि "सात दिनों के भीतर एक सक्षम न्यायाधीश की नियमित पोस्टिंग" सुनिश्चित की जाए। शीर्ष अदालत की इस सख्ती का असर तुरंत दिखा और सुनवाई के बाद खाली पद को भर दिया गया। दो दिन बाद ही वहां एक जज की नियुक्ति कर दी गई।

जनवरी में 22 दिन खाली रही कुर्सी

भले ही अधिकारियों का कहना है कि जज की नियुक्ति की प्रक्रिया पहले से चल रही थी और पद की संवेदनशीलता को देखते हुए इसमें समय लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि जनवरी महीने में 1 तारीख से 22 तारीख तक, यानी पूरे 22 दिन अदालत बिना जज के रही। कोर्ट के रिकॉर्ड बताते हैं कि यह कोई पहली घटना नहीं थी जब अहेरी कोर्ट न्यायाधीश के इंतजार में खाली पड़ी रही हो।

2025 में तीन महीने ठप रहा कामकाज

जिस अहेरी कोर्ट का उद्घाटन जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस भूषण आर गवई ने इस वादे के साथ किया था कि इससे माओवाद प्रभावित और आदिवासी बहुल तालुकों के 725 गांवों को 'घर के नजदीक न्याय' मिलेगा, वहां 2025 में भी स्थिति चिंताजनक थी।

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, 2025 में यह अदालत लगभग तीन महीने तक बिना जज के रही। इस दौरान ट्रायल, जमानत की सुनवाई और नियमित न्यायिक कार्य प्रभावी रूप से ठप पड़ गए। जब 22 जुलाई, 2025 को एक जज ने आखिरकार कार्यभार संभाला, तो उन्होंने पाया कि 200 से अधिक अंडर-ट्रायल मामले लंबित पड़े थे।

6 अक्टूबर, 2025 के एक कोर्ट ऑर्डर में इसका जिक्र है, जिसमें कहा गया कि "22 जुलाई 2025 को कार्यभार संभालने पर पाया गया कि 200 से अधिक मामले और कई जमानत अर्जियां लंबित थीं, जिनका प्राथमिकता के आधार पर निपटारा किया गया।"

वकीलों और कैदियों की बढ़ी मुश्किलें

जब तीन महीने तक पद खाली था, तब मुकदमों की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। आरोपियों को जेल से पेशी के लिए नहीं लाया जाता था। वकीलों को मजबूरन 120 किलोमीटर से अधिक दूर गढ़चिरौली जाना पड़ता था, जहाँ एक जज को अहेरी कोर्ट का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। हालात इतने बदतर हो गए थे कि विचाराधीन कैदियों ने जेल से ही गढ़चिरौली कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट को पत्र लिखकर अपने मामलों को ट्रांसफर करने की गुहार लगाई, क्योंकि कार्यवाही पूरी तरह रुक गई थी।

जमानत के लिए तरसते रहे आरोपी

न्यायाधीश की अनुपस्थिति का सबसे बुरा असर उन लोगों पर पड़ा जो जेल में बंद थे। इस दौरान इंचार्ज कोर्ट द्वारा केवल अत्यंत जरूरी जमानत अर्जियों या चार्जशीट दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने की याचिकाओं पर ही सुनवाई हो सकी।

एक मामले में, 2020 में गिरफ्तार एक आरोपी ने जमानत की मांग करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2023 में आरोप तय होने के बावजूद जुलाई 2025 तक किसी गवाह से पूछताछ नहीं हुई थी। एक अन्य मामले में, एक आरोपी को एक साल से अधिक समय तक सिर्फ इसलिए जेल में रहना पड़ा क्योंकि वह 30,000 रुपये की जमानत राशि (Surety) नहीं दे सका। उसे अगस्त 2025 में जज की नियुक्ति के बाद ही रिहा किया जा सका।

बार एसोसिएशन ने भी उठाई थी आवाज

अहेरी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद मेंगनवार ने इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से बताया कि अहेरी में अदालत स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य ही यह था कि वादियों और वकीलों को सुनवाई के लिए 200 किलोमीटर तक का सफर न करना पड़े। उन्होंने कहा, "2025 में जब तीन महीने तक कोई नियुक्ति नहीं हुई, तो हमें जरूरी सुनवाई के लिए गढ़चिरौली कोर्ट जाना पड़ता था। हमने तब बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर रिक्ति को भरने की मांग की थी, जिसके बाद शुक्र है कि इसे तुरंत किया गया।"

संवेदनशील मामलों के कारण देरी?

अदालत के अधिकारियों ने इस देरी के पीछे तर्क दिया कि इस कोर्ट में यूएपीए (UAPA) और कथित माओवादी गतिविधियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामले हैं। इसलिए, न्यायिक नियुक्तियों के लिए बहुत सावधानीपूर्वक जांच और विचार की आवश्यकता होती है, जो समय लगने का एक बड़ा कारण है।

न्याय के इंतजार का लंबा सफर

अहेरी कोर्ट की स्थापना 2008 से चली आ रही उस मांग का परिणाम थी, जिसका मकसद था कि वादियों, आरोपियों और पीड़ितों को माओवाद प्रभावित वन क्षेत्रों की खराब सड़कों और अनियमित परिवहन के बीच लंबी यात्रा न करनी पड़े। अक्सर सुनवाई के लिए उन्हें रात भर रुकना पड़ता था।

इसी को ध्यान में रखते हुए 2015 में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट और जुलाई 2023 में सत्र न्यायालय का उद्घाटन किया गया। उद्घाटन के समय जस्टिस गवई ने कहा था कि यह अदालत अहेरी, मूलचेरा, सिरोंचा, भामरागढ़ और एटापल्ली तालुकों के 725 गांवों को न्याय दिलाने में मदद करेगी। उन्होंने कहा था, "गढ़चिरौली के आदिवासियों के दरवाजे पर न्याय व्यवस्था आ गई है।"

अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, क्या यह व्यवस्था भविष्य में बिना किसी रुकावट के सुचारू रूप से चल पाएगी?

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