
बागपत- उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में गणतंत्र दिवस के मौके पर बनाया गया संविधान पार्क अब विवादों में घिर गया है। बड़ौत नगर पालिका परिसर में यह पार्क पूरी तरह वेस्ट मटेरियल (कचरे) के रिसाइक्लिंग से तैयार किया गया है। यहां संविधान की प्रस्तावना (Preamble) की एक बड़ी प्रतिकृति, चरखा, न्याय-समता-स्वतंत्रता जैसे मूल्यों को दर्शाने वाले प्रतीक और बोर्ड लगाए गए हैं। यहाँ नागरिकों के फंडामेंटल राइट्स भी प्रदर्शित हैं। इसका लोकार्पण राज्य मंत्री के.पी. मलिक और जिला मजिस्ट्रेट अस्मिता लाल ने किया। प्रशासन का दावा है कि यह पार्क बच्चों को खेल-खेल में संवैधानिक मूल्य सिखाएगा, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देगा और नागरिकों को जिम्मेदार बनाएगा।
लेकिन विवाद की वजह बनी प्रस्तावना का चित्रण। पार्क में लगी प्रस्तावना की प्रतिकृति में 'सोशलिस्ट' और 'सेक्युलर' शब्द नहीं दिख रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने X पर राष्ट्रपति भवन को टैग करते हुए बागपत के DM पर सख्त कार्रवाई की मांग की। उन्होंने इसे संविधान की विकृति बताया और कहा कि संविधान की पवित्रता का अपमान हुआ है। एक अधिकारी जो संविधान की मर्यादा का उल्लंघन करे, उसे पद पर नहीं रहना चाहिए।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना मूल रूप से 26 नवंबर 1949 में अपनाई गई थी, जिसमें भारत को "संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य" कहा गया था। उस समय 'सोशलिस्ट' और 'सेक्युलर' शब्द नहीं थे। डॉ. बी.आर. अंबेडकर और अन्य सदस्यों ने इन्हें स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया, क्योंकि वे संविधान की भावना में पहले से मौजूद माने जाते थे।
फिर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 (आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार द्वारा) में ये शब्द जोड़े गए। प्रस्तावना बदलकर "संप्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य" हो गई। 'राष्ट्र की एकता' को 'राष्ट्र की एकता और अखंडता' किया गया। यह संशोधन 3 जनवरी 1977 से लागू हुआ और आज भी बरकरार है। जुलाई 2020 में, सर्वोच्च न्यायालय के वकील डॉ. बलराम सिंह ने संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्दों को शामिल किए जाने पर सवाल उठाते हुए एक याचिका दायर की। इसके बाद, पूर्व कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने भी इसी तरह की याचिकाएं दायर कीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इन शब्दों को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना है।
विवाद में एक पक्ष कह रहा है कि पार्क में मूल 1949 वाली प्रस्तावना दिखाई गई है, इसलिए कोई विकृति नहीं। दूसरा पक्ष इसे जानबूझकर 'सोशलिस्ट-सेक्युलर' हटाने का प्रयास बता रहा है, खासकर जब हाल के वर्षों में RSS और कुछ नेता इन शब्दों पर बहस छेड़ चुके हैं (हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन्हें हटाने का कोई प्लान नहीं)।
सोशल मीडिया पर बहस गरम है, कुछ लोग पार्क की पर्यावरण-अनुकूल पहल की तारीफ कर रहे हैं, तो कुछ इसे संविधान पर हमला बता रहे हैं। यह मामला सिर्फ एक पार्क का नहीं, बल्कि संविधान की व्याख्या, आपातकाल के संशोधनों और आज की राजनीतिक बहस से जुड़ा बड़ा सवाल उठा रहा है।
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