
नई दिल्ली: केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय के बीच अटके हुए सरकारी प्रोजेक्ट्स को लेकर हाल ही में अहम चर्चा हुई। इन प्रोजेक्ट्स में देरी का मुख्य कारण वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत वन मंजूरी के लिए 'ग्राम सभा की 100 प्रतिशत सहमति' को माना जा रहा था। इस मुद्दे पर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 2006 के इस कानून में वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई प्रावधान मौजूद ही नहीं है। इसके साथ ही मंत्रालय ने यह भी कहा कि ग्राम सभा की सहमति से जुड़े ऐसे मामले उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं।
इस संबंध में 31 अगस्त को ऊर्जा मंत्रालय के नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) डेस्क को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया। इस पत्र में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने साफ तौर पर लिखा है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 और इसके तहत बनाए गए नियमों में स्टेज-II वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति का कोई जिक्र नहीं है। इसी वजह से यह विषय मंत्रालय के दायरे से बाहर है।
भले ही वन अधिकार अधिनियम में गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के उपयोग को लेकर ग्राम सभा की सहमति का सीधा उल्लेख न हो, लेकिन वन डायवर्जन को नियंत्रित करने वाले केंद्र सरकार के नियम कुछ और कहते हैं। इन नियमों के अनुसार, संबंधित सरकारी प्राधिकरण द्वारा वन भूमि के हस्तांतरण का औपचारिक प्रमाण पत्र जारी करने से पहले एफआरए की सभी प्रक्रियाओं का पूरा होना अनिवार्य है।
वन संरक्षण अधिनियम 1980 के दिशा-निर्देशों के तहत कुछ जरूरी कदम उठाने होते हैं। इनमें संभावित एफआरए दावेदारों की पहचान करना, उनके अधिकारों को मान्यता देना और फिर प्रस्तावित वन भूमि के उपयोग को लेकर संबंधित ग्राम सभाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त करना शामिल है। ग्राम सभाओं से एनओसी लेने की इसी प्रक्रिया को आम तौर पर वन मंजूरी के लिए 'ग्राम सभा की सहमति' कहा जाता है। कानून में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जनजातीय कार्य मंत्रालय ही इसके कार्यान्वयन के लिए नोडल मंत्रालय है।
मंत्रालय के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट की वकील शोमोना खन्ना ने हैरानी जताई है। यूपीए और एनडीए, दोनों ही सरकारों में जनजातीय कार्य मंत्रालय की पूर्व कानूनी सलाहकार रह चुकीं खन्ना का कहना है कि यह एक बेहद अजीब स्थिति है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह मुद्दा जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, तो फिर इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
दोनों मंत्रालयों के बीच यह बातचीत 3 अगस्त को सार्वजनिक उपक्रमों पर संसदीय स्थायी समिति द्वारा एनएचपीसी लिमिटेड पर पेश की गई एक रिपोर्ट के बाद शुरू हुई थी। भाजपा सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली इस समिति ने एनएचपीसी अधिकारियों के साथ चर्चा के आधार पर पाया कि निर्माणाधीन परियोजनाओं के लिए वन मंजूरी मिलने में औसतन 106 महीने का समय लगता है।
इसका सबसे बड़ा कारण सभी संबंधित ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य होना है। तीस्ता-IV एचईपी (Teesta-IV HEP) जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं केवल इसलिए अनिश्चित काल के लिए रुकी हुई हैं क्योंकि कुछ अल्पसंख्यक ग्राम पंचायतों की सहमति अभी तक लंबित है।
समिति ने एनएचपीसी के उस सुझाव पर भी गौर किया जिसमें राष्ट्रीय महत्व की बड़ी जलविद्युत बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए 'योग्य सुपर-बहुमत सहमति' की वकालत की गई थी। इसके तहत प्रभावित ग्राम सभाओं की 70 से 75 प्रतिशत सहमति को ही पर्याप्त माना जाना चाहिए। संसदीय पैनल ने ऊर्जा मंत्रालय से सिफारिश की थी कि वह जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ इस प्रस्ताव की व्यावहारिकता पर विचार-विमर्श करे।
समिति का मानना है कि 100% सहमति की अनिवार्यता भले ही सामाजिक रूप से अच्छे इरादे से बनाई गई हो, लेकिन व्यवहार में इसके कारण राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं की समय-सीमा बुरी तरह प्रभावित होती है।
वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति के मामलों से खुद को अलग करने का जनजातीय कार्य मंत्रालय का यह रुख कोई नया नहीं है। इससे पहले निकोबार मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों में वन अधिकार अधिनियम को लागू करने से जुड़े कई प्रमुख मामलों में भी मंत्रालय ने यही स्टैंड लिया था।
इन सभी मामलों में मंत्रालय का यही तर्क रहा है कि उसकी इसमें कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि कानून के तहत इसे लागू करने की जिम्मेदारी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों की होती है।
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