
भोपाल। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा बहुल और आदिवासी इलाकों में जुलाई से सामने आ रहे बुखार, शरीर पर चकत्ते, खसरा-मलेरिया के मामलों और 19 मौतों के बाद शुरू की गई व्यापक स्वास्थ्य जांच ने बच्चों की सेहत की गंभीर स्थिति सामने रखी है। केंद्र सरकार की ओर से शनिवार को जारी जानकारी के मुताबिक, प्रभावित इलाकों में अब तक 32,433 लोगों की मेडिकल स्क्रीनिंग की जा चुकी है। जांच के दौरान बड़ी संख्या में बच्चों में संक्रामक बीमारियों के साथ-साथ गंभीर कुपोषण, डायरिया, निमोनिया और एनीमिया जैसी समस्याएं पाई गई हैं। इससे साफ है कि शुरुआती तौर पर जिस स्वास्थ्य संकट को बुखार और संक्रामक बीमारियों से जोड़कर देखा जा रहा था, उसका दायरा कहीं ज्यादा व्यापक है।
7,711 बच्चे गंभीर कुपोषित मिले, 518 को NRC में भर्ती करना पड़ा
व्यापक स्क्रीनिंग के दौरान 7,711 बच्चे गंभीर कुपोषण की स्थिति में पाए गए। इनमें से 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRC) में भर्ती कराने की जरूरत पड़ी। यह आंकड़ा प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। कुपोषण के कारण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है और संक्रमण की स्थिति में बीमारी अधिक गंभीर रूप ले सकती है। स्वास्थ्य टीमों की जांच में सामने आए अन्य मामलों के साथ इसे जोड़कर देखा जाए तो इलाके में बच्चों को एक साथ कई स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।
जांच में 13,406 बच्चों में डायरिया के मामले मिले, जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया पाया गया। गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण की आशंका वाले बच्चों को भी इलाज उपलब्ध कराया गया। यानी जिन गांवों में शुरुआत में बुखार, शरीर पर चकत्ते और मौतों के मामले सामने आए थे, वहां स्वास्थ्य विभाग की जांच का दायरा बढ़ने के साथ कई दूसरी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आती गईं। इनमें खसरा और मलेरिया के अलावा कुपोषण, डायरिया, निमोनिया और एनीमिया प्रमुख हैं।
431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, 52 अभी भी निगरानी में
प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य टीमों द्वारा की गई स्क्रीनिंग के बाद 431 बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से 379 बच्चे उपचार के बाद डिस्चार्ज हो चुके हैं, जबकि 52 बच्चे अभी अस्पतालों में इलाज और चिकित्सकीय निगरानी में हैं। प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से गंभीर मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने और जरूरत पड़ने पर उन्हें बड़े अस्पतालों में रेफर करने की व्यवस्था बढ़ाई गई है।
स्वास्थ्य संकट को देखते हुए सोंगुड्डा स्वास्थ्य केंद्र में अतिरिक्त बेड, दवाओं, डॉक्टरों और जांच की सुविधाओं को बढ़ाया गया है। वहीं कुंडेकसा में अस्थायी अस्पताल भी शुरू किया गया है, ताकि दूर-दराज के गांवों से आने वाले मरीजों को स्थानीय स्तर पर ही प्राथमिक और आवश्यक उपचार मिल सके। गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए वाहनों और रेफरल व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।
मौतों की वजह एक बीमारी नहीं, अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियां सामने आईं
19 मौतों के बाद सरकार की ओर से मौतों की समीक्षा और उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड की जांच कराई गई। समीक्षा में किसी एक बीमारी को सभी मौतों का कारण नहीं पाया गया। उपलब्ध रिकॉर्ड में खसरा, मलेरिया, खसरा-मलेरिया का संयुक्त संक्रमण, सांस लेने में तकलीफ, डिहाइड्रेशन, कुपोषण, एनीमिया और शॉक जैसी अलग-अलग गंभीर स्वास्थ्य स्थितियां सामने आई हैं।
सरकार के मुताबिक, कई शुरुआती मौतें घर पर या उचित स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने से पहले हुई थीं। ऐसे मामलों में पर्याप्त मेडिकल रिकॉर्ड और सैंपल उपलब्ध नहीं होने के कारण मौत के निश्चित कारण का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण करना मुश्किल है। इसी आधार पर सरकार का कहना है कि फिलहाल सभी मौतों को किसी एक बीमारी, जैसे खसरा या मलेरिया, से जोड़ने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, मौतों के पीछे मौजूद अलग-अलग स्वास्थ्य स्थितियों और इलाज में देरी जैसे पहलुओं की जांच जारी है।
3 गांवों से शुरू हुई निगरानी अब करीब 50 गांवों तक पहुंची
जुलाई में बिरसा क्षेत्र के बैगा बहुल गांवों से बुखार, शरीर पर चकत्ते और मौतों के मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी का दायरा तेजी से बढ़ाया। शुरुआत में 3 गांवों में स्वास्थ्य निगरानी की जा रही थी, जिसे बढ़ाकर अब करीब 50 गांवों तक कर दिया गया है। इन क्षेत्रों में 10 से ज्यादा डॉक्टर और 10 कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर स्क्रीनिंग, इलाज और स्वास्थ्य निगरानी के काम में लगाए गए हैं।
दुर्गम आदिवासी बस्तियों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए बिरसा और बैहर क्षेत्र में 6 मोबाइल मेडिकल यूनिट भी तैनात की गई हैं। ये मोबाइल टीमें केवल बुखार या संक्रमण की जांच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मातृ-शिशु स्वास्थ्य, टीबी और अन्य बीमारियों की भी स्क्रीनिंग कर रही हैं। इस तरह स्वास्थ्य विभाग अब पूरे क्षेत्र में व्यापक स्वास्थ्य निगरानी के जरिए उन बीमारियों की पहचान करने की कोशिश कर रहा है, जिनका समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
केंद्र की विशेषज्ञ टीम भी पहुंची, ICMR और मेडिकल कॉलेज कर रहे जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 12 अगस्त को विशेषज्ञ टीम बालाघाट भेजी थी। इसके अलावा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और मेडिकल कॉलेजों की टीमें भी मामले की जांच में जुटी हैं। स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रभावित इलाकों में लगातार सैंपलिंग, स्क्रीनिंग और मरीजों की निगरानी की जा रही है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों में अब तक 32,433 लोगों की मेडिकल जांच की जा चुकी है। इसके अलावा दस्तक-2026 अभियान के दौरान 1.58 लाख बच्चों की स्क्रीनिंग की गई। बड़े पैमाने पर हो रही यह स्क्रीनिंग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती मामलों के बाद जांच बढ़ने पर संक्रमण के साथ-साथ कुपोषण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का भी बड़ा दायरा सामने आया है।
खसरे के खिलाफ 14,637 बच्चों को अतिरिक्त टीका
खसरे के मामलों को देखते हुए संक्रमण की रोकथाम के लिए 1 से 10 वर्ष की उम्र के 14,637 बच्चों को अतिरिक्त मीजल्स-रूबेला (MR) टीका लगाया गया है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, बीते 7 दिनों में खसरे का कोई नया मामला सामने नहीं आया है, जिसे संक्रमण की स्थिति में सुधार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, प्रभावित इलाकों में निगरानी और स्क्रीनिंग जारी रखी गई है, ताकि किसी नए मामले का जल्द पता लगाकर उसका उपचार किया जा सके।
संक्रमण और दूसरी बीमारियों को रोकने के लिए स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक अमले ने केवल मरीजों के इलाज पर ही ध्यान नहीं दिया है, बल्कि स्वच्छता और संक्रमण नियंत्रण के उपाय भी किए हैं। इसके तहत 600 से अधिक पेयजल स्रोतों का शुद्धिकरण कराया गया है। इसके अलावा 4,338 घरों में कीटनाशक का छिड़काव और प्रभावित इलाकों में फॉगिंग कराई गई है।
बीमारी के साथ कुपोषण और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौती भी सामने
बालाघाट के बैगा बहुल इलाकों में सामने आए आंकड़े यह संकेत देते हैं कि मौजूदा संकट केवल किसी एक संक्रामक बीमारी तक सीमित नहीं है। बुखार, खसरा और मलेरिया के मामलों के साथ बड़ी संख्या में बच्चों का गंभीर कुपोषित मिलना, डायरिया और निमोनिया के मामले सामने आना स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मौजूद व्यापक चुनौती को दिखाता है। खासकर दुर्गम आदिवासी बस्तियों में समय पर स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच, पोषण, सुरक्षित पेयजल और बीमारी की शुरुआती पहचान जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बनकर सामने आए हैं।
सरकार का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में लगातार स्वास्थ्य निगरानी की जा रही है और गंभीर मरीजों को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। वहीं विशेषज्ञ टीमें मौतों और बीमारी के मामलों की जांच कर रही हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में विस्तृत जांच और मेडिकल रिपोर्ट से यह तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है कि इन मौतों और बीमारियों के पीछे संक्रमण, कुपोषण, इलाज में देरी और अन्य स्वास्थ्य परिस्थितियों की कितनी-कितनी भूमिका रही।
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