
कोरापुट- ओडिशा के कोरापुट जिले में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मांस, चिकन, मछली, अंडा सहित सभी नॉन-वेज खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी होने से राजनीतिक और सामाजिक विवाद छिड़ गया है। जिला कलेक्टर एवं जिलाधिकारी ने 23 जनवरी 2026 को पत्र संख्या 93 के माध्यम से सभी तहसीलदारों, ब्लॉक विकास अधिकारियों (बीडीओ) और कार्यपालिक अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी करें। यह आदेश आदिवासी बहुल जिले की सांस्कृतिक विविधता पर सवाल उठा रहा है, जहां नॉन-वेज भोजन आदिवासी समुदायों की दैनिक जीवनशैली और परंपराओं का अभिन्न अंग है।
कलेक्टर मनोज सत्यवान महाजन के पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 26 जनवरी को 77वें गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर मांस, चिकन, मछली, अंडा आदि तथा अन्य नॉन-वेज वस्तुओं की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की आधिकारिक अधिसूचना जारी करें।" जिला प्रशासन का कहना है कि यह प्रतिबंध गणतंत्र दिवस की गरिमा बनाए रखने के लिए है, लेकिन विपक्षी नेताओं ने इसे संविधान विरोधी और सांस्कृतिक हस्तक्षेप करार दिया है।
लोकसभा सांसद सप्तगिरी उलाका ने एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "एक निर्वाचित गणतंत्र संविधान की गरिमा का सम्मान संवैधानिक स्वतंत्रताओं को सीमित करके नहीं कर सकता। #कोरापुट में #गणतंत्रदिवस पर नॉन-वेज भोजन की बिक्री पर प्रतिबंध मनमाना, बहिष्कारपूर्ण और असंवैधानिक है। आवश्यकता क्या थी? आदिवासी बहुल, सांस्कृतिक रूप से विविध जिले को क्यों निशाना बनाया गया?" उलाका ने आदेश का हवाला देते हुए इसकी आलोचना की है।
पत्रकार प्रशांत कनोजिया ने भी एक्स पर तीखा प्रहार किया: "बीजेपी सरकार क्यों आदिवासियों पर ब्राह्मणवादी प्रथाओं को थोपने पर उतारू है? नॉन-वेज आदिवासी संस्कृति और दैनिक जीवन का मूल हिस्सा है, अपराध नहीं। गाय-बेल्ट की राजनीति, भोजन नियंत्रण और सांस्कृतिक वर्चस्व को आदिवासियों पर थोपना बंद करें। आदिवासी आपका हिंदुत्व प्रयोगशाला नहीं हैं। आदिवासी स्वायत्तता का सम्मान करें।"
आपको बता दें, कोरापुट एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है जहाँ अनुसूचित जनजातियों की आबादी आधी से अधिक है। नागरिकों का कहना है कि यह स्थानीय खान-पान की आदतों में अनुचित दखल है और व्यक्तिगत इच्छा को कमजोर करता है। इस आदेश ने राष्ट्रीय उत्सवों के नाम पर आहार प्रतिबंध लगाने की उचितता पर बहस को फिर से भड़का दिया है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ नॉन-वेज भोजन सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
कवि और राजनीतिक विश्लेषक राजू पारुलेकर इस आदेश को 'असंवैधानिक फतवा' करार देते हुए लिखते हैं, "सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता, शांति, सुरक्षा और ऐसे उचित आधारों पर किसी भी चीज़ की बिक्री पर रोक लगाना कलेक्टर, प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन उन्हें "गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर" किसी भी तरह के खाने की बिक्री पर रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं है।" IAS एसोसिएशन को टैग करते हुए उन्होने पूछा, "कृपया हमें यह समझने में मदद करें कि यह आदेश कानूनी कैसे है? सिर्फ इसलिए कि DM साहब ने इस पर साइन किए हैं, सोच-समझकर या बिना सोचे-समझे?"
रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी नागेश्वर राव कहते हैं, " न तो कोरापुट के कलेक्टर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, और न ही उनके अधिकारियों के पास गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर नॉन-वेज खाने पर बैन लगाने का कोई कानूनी अधिकार है। यह अधिकार क्षेत्र का साफ उल्लंघन है।इसके अलावा, गणतंत्र दिवस मनाने और शाकाहार लागू करने के बीच ऐसा क्या संबंध है जो नॉन-वेज खाने पर बैन लगाने को सही ठहरा सके? यह वैधता, अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन और नैतिकता के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करता है।"
आल इण्डिया तृणमूल कांग्रेस ने भी आदेश की आलोचना करते हुए कहा, " रिपब्लिक डे कब से एक धार्मिक अवसर बन गया जिसमें नॉन-वेज खाना छोड़ने की मांग की जा रही है? डॉ. बी.आर. अंबेडकर का संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाता है, जहाँ नागरिकों को यह तय करने की आज़ादी है कि वे क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कौन सी भाषा बोलते हैं, किसकी पूजा करते हैं, और किससे प्यार करते हैं। तो जिस दिन हम अपनी विविधता और संवैधानिक मूल्यों का जश्न मनाते हैं, उसी दिन ऐसे फरमान कैसे थोपे जा सकते हैं? क्या @BJP4India इसी तरह का "परिवर्तन" बंगाल पर थोपना चाहती है? लोगों को सावधान रहना चाहिए!"
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