
भोपाल- जिस व्यंग्यात्मक राजनीतिक प्रयोग के जरिए मई में गठित हुई कॉकरोच जनता पार्टी ने नीट पेपर लीक के विरोध में पूरे देश में एक युवा आंदोलन खड़ा करके माह जुलाई में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा हासिल कर एतिहासिक सफलता हासिल की, अब उस पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके ने फिर व्यंगात्मक शैली से मध्यप्रदेश सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। खुद को बतौर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मानते हुए दिपके ने 13 अगस्त 2026 की तारीख का अपना इस्तीफा सोशल मीडिया पर ड्राप किया है।
पत्र में उन्होंने बालाघाट में 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत को अपने इस्तीफे की मुख्य वजह बताया है। दिपके ने लिखा कि मुख्यमंत्री के तौर पर वह उन बच्चों को समय पर चिकित्सा सुविधा और जरूरी सहायता उपलब्ध कराने में विफल रहे और इस विफलता की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
दिपके के पत्र का सबसे चुभता हुआ सवाल सरकार द्वारा घोषित मुआवजे को लेकर है। उन्होंने लिखा कि बच्चों की मौत के बाद शुरुआत में प्रत्येक बच्चे के लिए 22 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की गई, जिसे आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद बढ़ाकर 24 लाख रुपये किया गया। इसी संदर्भ में उन्होंने सवाल उठाया कि अगर ये बच्चे मंत्रियों या विधायकों के होते तो क्या 24 लाख रुपये का मुआवजा पर्याप्त माना जाता?
दिपके ने लिखा कि बच्चों की मौत जितनी गंभीर थी, उतनी ही शर्मनाक इसके बाद की कथित सरकारी असंवेदनशीलता थी। उन्होंने स्वास्थ्य अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया और कहा कि मासूम बच्चों की मौत के बाद जवाबदेही सरकार के सर्वोच्च स्तर तक तय होनी चाहिए।
पत्र में दिपके ने मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के लिए स्वास्थ्य के साथ-साथ पानी, बिजली और शिक्षा की स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि मध्य प्रदेश में 2003 से लगभग 21 वर्षों से भाजपा की सरकारें रही हैं, लेकिन इसके बावजूद कई आदिवासी परिवारों को सुरक्षित पेयजल, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं।
दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हर घर नल योजना’ का उल्लेख करते हुए दावा किया कि बालाघाट के कुछ हिस्सों में आदिवासी परिवार अभी भी पीने के पानी के लिए नदी पर निर्भर हैं। उनके अनुसार, इससे इन परिवारों के स्वास्थ्य पर खतरा बना हुआ है।
शिक्षा व्यवस्था को लेकर उन्होंने बालाघाट के एक गांव का उदाहरण दिया। उनके पत्र के अनुसार, वहां आंगनवाड़ी से लेकर कक्षा 5 तक करीब 75 बच्चे एक ही कमरे में पढ़ते हैं। दिपके का कहना है कि स्थानीय आदिवासी समुदाय द्वारा बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद बच्चों के लिए उचित स्कूल भवन उपलब्ध नहीं कराया गया।
दिपके ने अपने पत्र में सरकार के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि मध्य प्रदेश में 55,795 आदिवासी परिवार बिजली से वंचित हैं। उन्होंने NCRB के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए यह भी लिखा कि देश में अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ दर्ज अपराधों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत है।
बच्चों के पोषण को लेकर भी उन्होंने कई आंकड़े सामने रखे। पत्र के मुताबिक, राज्य में 5.41 लाख से अधिक बच्चे यानी 8.60 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले हैं। दिपके ने विधानसभा में सरकार द्वारा पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए 1.36 लाख से अधिक बच्चों के कुपोषित के रूप में दर्ज होने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय के बच्चे भी इस समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
दिपके ने अपने इस्तीफे में कहा कि वह केवल बालाघाट के आदिवासियों ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय को विफल करने के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने लिखा कि इतने मासूम बच्चों की मौत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं लगता।
इसी आधार पर उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देने की घोषणा की।अपने पत्र के अंत में दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें मध्य प्रदेश की जनता की सेवा करने का अवसर मिला।
अभिजीत दिपके का यह कदम उसी व्यंग्यात्मक राजनीतिक शैली का हिस्सा है, जिसमें वास्तविक सत्ता-संरचना और उसके फैसलों पर सवाल उठाने के लिए काल्पनिक राजनीतिक पद और पात्रों का इस्तेमाल किया जाता है। इस बार इस्तीफे के जरिए उन्होंने बालाघाट के आदिवासी बच्चों की मौत को केंद्र में रखते हुए स्वास्थ्य, मुआवजा, जवाबदेही, पेयजल, शिक्षा, बिजली और कुपोषण जैसे सवाल एक साथ उठाए हैं।
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले (विशेषकर बैहर और बिरसा तहसील के सुदूर क्षेत्रों) में पिछले कुछ महीनों के दौरान बैगा और गोंड आदिवासी समुदाय के 30 से अधिक बच्चों की मौत का एक गंभीर मामला सामने आया है।
जांच और रिपोर्टों के अनुसार बच्चों की मौत का मुख्य कारण खसरा (Measles), मलेरिया (फालसीपेरम मलेरिया), निमोनिया, तेज बुखार और गंभीर कुपोषण का दोहरा प्रकोप रहा है। प्रभावित आदिवासी इलाकों में साफ पीने के पानी की भारी किल्लत है। ग्रामीण झीरिया और हैंडपंपों का दूषित व पीला पानी पीने को मजबूर हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 15 से 40 किमी दूर होने और गांवों में नियमित टीकाकरण अभियान न पहुंचने की वजह से बीमारियों का समय पर पता नहीं चल सका।
इस मामले में मध्य प्रदेश की जबलपुर हाईकोर्ट बेंच में एक याचिका दायर की गई। कोर्ट के निर्देश पर याचिकाकर्ता ने प्रभावित इलाकों (जैसे बोंदारी, अडोरी, कोरका आदि) का दौरा कर रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और बालाघाट कलेक्टर से जवाब तलब किया है। कोर्ट में यह बात भी सामने आई कि 50 बेड की क्षमता वाले अस्पताल में 400 से अधिक बच्चे भर्ती और इलाज के लिए निर्भर थे। मामला तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित पंचायतों में आपातकालीन मेडिकल कैंप और सर्वे टीमें भेजी हैं। राज्य प्रशासन और मुख्यमंत्री द्वारा प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता राशि देने का आश्वासन दिया गया है।
इधर, अभिजीत दीपके के इस्तीफे को लेकर एक एनजीओं ने विरोध दर्ज करवाया है। एनसीआईबी हेडक्वार्टर (NCIBHQ) नामक x हेंडल से किये पोस्ट में सवाल उठाया गया कि क्या ककरोच जनता पार्टी के संस्थापक को स्वयं को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बताते हुए फर्जी लेटरहेड तैयार करने तथा राज्यपाल महोदय के नाम से पत्र जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार है? यदि ऐसा कोई अधिकार नहीं है, तो प्रथम दृष्टया यह गंभीर आपराधिक कृत्य प्रतीत होता है। यूजर ने लिखा कि," पूरे प्रकरण की तत्काल निष्पक्ष एवं गंभीरता से जांच कराते हुए, संबंधित धाराओं के अंतर्गत मुकदमा पंजीबद्ध कर नियमानुसार कठोर कानूनी कार्रवाई एवं गिरफ्तारी की जाए। और यदि इस प्रकार स्वयं को संवैधानिक पदाधिकारी बताकर फर्जी लेटरहेड पर पत्र जारी करना कानूनन अपराध नहीं है, तो इसी प्रकार के आरोपों में जेल में बंद सभी व्यक्तियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की भी समीक्षा की जानी चाहिए तथा उन्हें निर्दोष मानते हुए जेल से रिहा किया जाना चाहिए। कानून सबके लिए समान होना चाहिए और किसी भी व्यक्ति को उसके पद, प्रभाव या पहचान के आधार पर अलग-अलग मापदंडों का लाभ नहीं मिलना चाहिए।"
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