छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: आदिवासी हिंदू रीति से विवाह करें तो हिंदू मैरिज एक्ट होगा लागू, आपसी सहमति से तलाक का अधिकार

कोर्ट ने कहा, “यदि पक्षकार स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और विवाह सप्तपदी सहित हिंदू संस्कारों के अनुसार संपन्न हुआ है, तो उन्हें रिवाज अदालतों में नहीं भेजा जा सकता।”
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लबिश्वर मांझी मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि जनजातीय सदस्य हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें हिंदू कानून के दायरे में लाया जा सकता है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लबिश्वर मांझी मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि जनजातीय सदस्य हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें हिंदू कानून के दायरे में लाया जा सकता है।एआई निर्मित सांकेतिक चित्र
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बिलासपुर- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि अनुसूचित जनजाति (एसटी) का कोई सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज, परंपराएं और संस्कार अपनाता है तथा विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न होता है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आदिवासी पति और अनुसूचित जाति की पत्नी की आपसी सहमति से तलाक की याचिका को केवल पति के अनुसूचित जनजाति होने के आधार पर खारिज कर दिया गया था।

यह मामला गुड़िया नागेश (अनुसूचित जाति) और मुनीराज मांडवी (अनुसूचित जनजाति) से संबंधित है। दोनों का विवाह 15 अप्रैल 2009 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था, जिसमें सप्तपदी सहित सभी हिंदू संस्कार पूरे किए गए थे। दोनों ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि वे हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों का ही पालन करते हैं। विवाह के बाद उनका एक पुत्र जयनील मांडवी हुआ, जो वर्तमान में पत्नी के साथ रह रहा है। दोनों 6 अप्रैल 2014 से अलग-अलग रह रहे थे।

जगदलपुर स्थित फैमिली कोर्ट ने उनकी धारा 13बी के तहत दायर आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के कारण यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, जब तक केंद्र सरकार अधिसूचना जारी न करे।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा ने इस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लबिश्वर मांझी मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि जनजातीय सदस्य हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें हिंदू कानून के दायरे में लाया जा सकता है।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि:

“धारा 2(2) संरक्षण का प्रावधान है, न कि बहिष्कार का। जब कोई जनजातीय सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाज अपनाता है और अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करता है, तो उसे अधिनियम के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा, “यदि पक्षकार स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और विवाह सप्तपदी सहित हिंदू संस्कारों के अनुसार संपन्न हुआ है, तो उन्हें रिवाज अदालतों में नहीं भेजा जा सकता।” कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के समान फैसलों का भी संदर्भ लिया।

अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 12 अगस्त 2025 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस फैमिली कोर्ट को भेज दिया है, जहां अब याचिका को उसके गुण-दोष के आधार पर जल्द निर्णय लिया जाएगा।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लबिश्वर मांझी मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि जनजातीय सदस्य हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें हिंदू कानून के दायरे में लाया जा सकता है।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लबिश्वर मांझी मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि जनजातीय सदस्य हिंदू परंपराओं को अपनाते हैं, तो उन्हें हिंदू कानून के दायरे में लाया जा सकता है।
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