नई दिल्ली: मणिपुर और मिजोरम के 'बनेई मेनाशे' (B’nei Menashe) यहूदी समुदाय के लगभग 250 सदस्य गुरुवार रात तेल अवीव पहुंचे। यह समूह खुद को इजरायल की उन दस प्राचीन जनजातियों में से एक का वंशज मानता है, जिन्हें इतिहास में 'खोई हुई जनजातियां' कहा जाता है।
इन दोनों पूर्वोत्तर राज्यों में कुकी और मिजो आदिवासी समुदायों से ताल्लुक रखने वाले बनेई मेनाशे लोगों की कुल आबादी लगभग 7,000 है। वैसे तो 1990 के दशक से हजारों की संख्या में इस समुदाय के लोग इजरायल जा चुके हैं, लेकिन गुरुवार को वहां पहुंचा यह जत्था इजरायली सरकार के एक विशेष पुनर्वास कार्यक्रम के तहत स्थानांतरित होने वाला पहला समूह है। भविष्य में इस कार्यक्रम के जरिए ऐसे और भी लोग वहां बसाए जाएंगे।
इजरायल की इन खोई हुई जनजातियों का इतिहास बहुत पुराना है। लगभग 722 ईसा पूर्व (BCE) में असीरियन साम्राज्य ने उत्तरी इजरायल पर कब्जा करके वहां रहने वाले कई लोगों को विस्थापित कर दिया था। यहूदी मान्यताओं के अनुसार, निर्वासित किए गए ये लोग दस अलग-अलग जनजातियों का हिस्सा थे। इनमें रूबेन, शिमोन, दान, नफ्ताली, गाद, आशेर, इस्साकार, ज़ेबुलुन, एप्रैम और मनश्शे शामिल हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सदियों से पश्चिमी यहूदी दुनिया भर में इन खोई हुई जनजातियों के वंशजों की तलाश करते रहे हैं और भारतीय उपमहाद्वीप भी उनकी इस खोज का अहम हिस्सा रहा है। मिजोरम और मणिपुर का यह यहूदी समुदाय खुद को इनमें से सबसे बड़ी जनजाति मनश्शे (Manasseh) का वंशज मानता है। 'बनेई मेनाशे' का शाब्दिक अर्थ ही 'मेनाशे या मनश्शे के बेटे' होता है।
इस समुदाय के लोगों का विश्वास है कि उनकी निर्वासित जनजाति ने पूर्व की ओर पलायन किया था। आज के पूर्वोत्तर भारत में स्थायी रूप से बसने से पहले ये लोग सदियों तक फारस (आधुनिक ईरान) और अफगानिस्तान के इलाकों में भटकते रहे थे।
यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि तिब्बती-बर्मन भाषा परिवार की बोलियां बोलने वाले कुकी और मिजो जनजातियों के सदस्यों ने यह कैसे मानना शुरू कर दिया कि वे दुनिया के दूसरे छोर पर पैदा हुए एक यहूदी समुदाय से जुड़े हैं। यह पूरी कहानी बड़ी दिलचस्प है और इसकी शुरुआत उनके ईसाई धर्म में परिवर्तन के साथ होती है।
साल 2023 में प्रकाशित एक लेख में शैक्षणिक शोधकर्ता गिदोन एलाज़र बताते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इन प्राचीन जनजातियों के अवशेष के रूप में पहचानने की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के मध्य में हुई थी। यह प्रोटेस्टेंट मिशनरियों के व्यापक प्रयासों का ही परिणाम था। माना जाता है कि बैपटिस्ट मिशनरी उन लोगों के बीच बाइबिल लेकर पहुंचे थे जो लंबे समय से मसीहाओं के आने में विश्वास रखते थे।
एलाज़र के अनुसार, 1960 के दशक में इस क्षेत्र पर भारतीय नियंत्रण के खिलाफ हुए हिंसक विरोध के दौरान बनेई मेनाशे के मामले में भी कुछ वैसी ही स्थितियां पैदा हुई थीं। 1930 और 1960 के दशक के बीच मिजोरम में कई ईसाई पुनरुद्धार आंदोलन भी देखने को मिले थे।
भारत में यहूदीकरण आंदोलनों पर शोध करने वाले प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता सायन लोध बताते हैं कि 1951 में चल्लियानथांगा या मेला चाला नामक एक मिजो रहस्यवादी ने एक सपना देखने का दावा किया था। उसने कहा था कि मिजो, कुकी और चिन लोग असल में प्राचीन इजरायली जनजातियों के वंशज हैं। लोध का मानना है कि यह शायद उस समय वहां प्रचलित ईसाई धर्म के प्रति लोगों के असंतोष का ही नतीजा था।
मणिपुर और मिजोरम में चिन-कुकी-मिजो जनजातियों के बीच यहूदी धर्म अपनाने का यह आंदोलन 1970 के दशक के अंत में बहुत तेजी से बढ़ा। इस अभियान को असल गति रब्बी एलियाहू अविचैल के नेतृत्व वाले 'अमीशव' नामक एक इजरायली संगठन से मिली, जिसका मकसद मसीहा के आने की शर्तों को पूरा करने के लिए सभी बिखरी हुई जनजातियों को इजरायल वापस लाना था।
इस समूह ने 1950 के दशक में ही यहूदियों और इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने में अपनी गहरी रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। इसी सिलसिले में साल 1974 में 'मिजो इजरायल जायोनी ऑर्गनाइजेशन' की स्थापना भी की गई। उन्होंने धीरे-धीरे इजरायल पर अपना शोध शुरू किया, बॉम्बे और कलकत्ता के यहूदी समुदायों से संपर्क साधा और यहां तक कि इजरायली संसद (नेसेट) को एक पत्र भी लिख डाला।
अमीशव संगठन की मदद से 1980 के दशक तक उनका यहूदी धर्म में परिवर्तन पूरी तरह से संपन्न हो गया था। हालांकि, यह बात भी सच है कि मिजोरम और मणिपुर की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी ईसाई धर्म को ही मानती है।
रब्बी अविचैल से उनका पहला संपर्क साल 1979 में हुआ था। यह रब्बी अविचैल ही थे जिन्होंने बाइबिल के चरित्र मेनाशे और कुकी (मनमासी) तथा मिजो (मनासिया) समुदायों द्वारा पूजे जाने वाले उनके पूर्वज के बीच एक गहरा ऐतिहासिक संबंध देखा था।
अविचैल और उनके साथियों ने यह साबित करने का भी पुरजोर प्रयास किया कि बनेई मेनाशे ने इजरायल की भूमि से जुड़ी अपनी मौखिक परंपराओं और कुछ खास यहूदी प्रथाओं को आज भी जीवित रखा है। 1980 के दशक के अंत में रब्बी अविचैल और उनका संगठन अमीशव टूरिस्ट वीजा पर बनेई मेनाशे के छोटे-छोटे जत्थों को इजरायल ले जाने लगे। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इजरायल ने तब तक उन्हें 'खोए हुए यहूदी' के रूप में मान्यता नहीं दी थी और 1992 से पहले भारत और इजरायल के बीच कोई पूर्ण राजनयिक संबंध भी नहीं थे।
इजरायल पहुंचने वाले इन लोगों ने वहां रूढ़िवादी यहूदी धर्म को सीखा और उसे पूरी तरह से अपना लिया। सायन लोध बताते हैं कि इनमें से कुछ लोग बाद में भारत लौट आए ताकि वे अपने समुदाय के अन्य लोगों को इस धर्म और इसके रीति-रिवाजों के बारे में विस्तार से सिखा सकें।
साल 2005 में, इजरायल के मुख्य रब्बीनेट ने कोलकाता के वैज्ञानिकों द्वारा पेश किए गए डीएनए सबूतों के आधार पर बनेई मेनाशे को आधिकारिक तौर पर एक खोई हुई जनजाति के रूप में मान्यता दे दी। हालांकि, हाइफा में टेक्नियन-इज़राइल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने इन डीएनए परिणामों को खारिज कर दिया था और अपने स्तर पर नए परीक्षण किए थे, जो पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सके थे।
दोनों ही परीक्षणों में केवल कुछ ही नमूनों में कोहेन मॉडल हैप्लोटाइप (एक आनुवंशिक मार्कर) के निशान पाए गए थे। इसके बावजूद, रब्बीनेट के आधिकारिक फैसले के बाद इजरायल सरकार ने बनेई मेनाशे समुदाय को छोटे-छोटे समूहों में अपने देश में बसने की अनुमति दे दी, हालांकि बीच-बीच में इस प्रक्रिया को कई बार रोका भी गया।
गिदोन एलाज़र का कहना है कि रब्बीनेट के समर्थन और सरकारी अधिकारियों की थोड़ी हिचकिचाहट के बावजूद, हाल के वर्षों में कई हजार बनेई मेनाशे इजरायल पहुंच चुके हैं। लेकिन सायन लोध के शोध से एक कड़वी सच्चाई यह भी सामने आई है कि अपनी अलग शारीरिक बनावट के कारण इस समुदाय को इजरायल में नस्लवाद और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
साल 2000 के दशक से लेकर 2020 तक 'शावेई इज़राइल' नामक एक अन्य यहूदी संगठन ने इस समुदाय के प्रवास और इजरायल में उनके बसने के काम का जिम्मा संभाला। साल 2020 के बाद 'देगेल मेनाशे' नामक एक बिल्कुल नया संगठन सामने आया है। पुराने संगठनों के उलट, इस नए समूह को खुद बनेई मेनाशे समुदाय के सदस्य ही चला रहे हैं।
लंबे इंतजार के बाद आखिरकार पिछले साल नवंबर में, इजरायली सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए लगभग 5,000 बनेई मेनाशे सदस्यों के पुनर्वास और उनके स्थानांतरण के लिए वित्तीय मदद देने का फैसला किया।
भारत में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आंध्र प्रदेश के तेलुगु भाषी 'बनेई एप्रैम' नामक एक अन्य समुदाय ने भी खुद को एक खोई हुई यहूदी जनजाति का वंशज होने का दावा किया था। इस समुदाय का मानना है कि वे एप्रैम जनजाति के वंशज हैं जो लगभग 1,000 साल पहले मध्य एशिया के रास्ते होते हुए भारत पहुंचे थे।
इस समूह का यहूदी धर्म से जुड़ाव 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब उनके नेता शमुएल याकोबी ने यरूशलेम की यात्रा की थी। एलाज़र अपने शोध में लिखते हैं कि यह समूह मुख्य रूप से दलित जाति से ताल्लुक रखता है। उनके यहूदी वंश के इस दावे को अक्सर समाज में मौजूद कठोर जातीय भेदभाव को दूर करने के एक तरीके के रूप में भी देखा जाता है, ताकि वे उच्च जातियों के साथ-साथ अमेरिका और इजरायल के यहूदियों का ध्यान अपनी ओर खींच सकें।
खोई हुई जनजातियों के इतिहास से जुड़ा एक और प्रमुख समूह अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पश्तून हैं। पश्तून समुदाय के कई लोग अपनी इब्रानी (हिब्रू) विरासत और परंपराओं के बारे में जानने के लिए काफी उत्सुक रहते हैं। लेकिन, बनेई मेनाशे समुदाय के विपरीत, पश्तून लोग बहुत ही कट्टर मुस्लिम हैं, इसलिए उनके बीच धर्म परिवर्तन का मुद्दा बेहद संवेदनशील और जटिल माना जाता है।
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