केरल के अट्टापदी में 12 नवजातों की मौत ने खोली व्यवस्था की पोल, स्वास्थ्य से कहीं गहरा है आदिवासियों का यह सामाजिक संकट

केरल के अट्टापदी में 12 नवजातों की मौत ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। आदिवासी संगठनों ने कुपोषण, एनीमिया और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को इस त्रासदी की असली वजह बताया है।
Keralam Attappady infant deaths.
केरल के अट्टापदी में 12 नवजातों की मौत से हड़कंप। कुपोषण, एनीमिया और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था ने खोली सरकारी दावों की पोल।(सांकेतिक तस्वीर)
Published on: 

केरल के अट्टापदी क्षेत्र में हाल के महीनों में 12 नवजात शिशुओं की मौत ने एक बार फिर उस बाल स्वास्थ्य संकट को उजागर कर दिया है, जिसका समाधान एक दशक से अधिक समय से नहीं खोजा जा सका है। जान गंवाने वाले इन मासूमों में 10 आदिवासी समुदायों से थे। इस हृदयविदारक घटनाक्रम के बाद राज्य सरकार ने विशेषज्ञों की एक जांच टीम गठित की है। हालांकि, आदिवासी संगठनों का स्पष्ट मानना है कि इस घटना की जड़ें केवल लचर स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार, कुपोषण, मातृ स्वास्थ्य, भूमिहीनता और समुदाय की व्यापक सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे बुनियादी मुद्दों पर निरंतर सुधार की सख्त जरूरत है।

आदिवासी कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़े स्थिति की गंभीरता को बयां करते हैं। वर्ष 2011 से अब तक इस क्षेत्र में 124 नवजातों की जान जा चुकी है। साल 2012 के बाद से अट्टापदी में लगभग 300 गर्भपात, 90 अंतर्गर्भाशयी (इंट्रायूटरिन) मौतें और दो दर्जन मृत जन्म (स्टिलबर्थ) के मामले दर्ज किए गए हैं। यह इलाका विशेष रूप से वर्ष 2013 में सुर्खियों में आया था, जब 47 आदिवासी शिशुओं की मौत हुई थी। आदिवासी मामलों के जानकारों का अनुमान है कि यहां हर साल औसतन 10 बच्चों की जान चली जाती है।

स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने स्पष्ट किया है कि हालिया मौतें चिकित्सा लापरवाही का परिणाम नहीं थीं, बल्कि जन्म से ही मौजूद गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण हुई हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि स्वास्थ्य विभाग भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए इसे एक चुनौती के रूप में लेगा। इसके तहत स्वास्थ्य सेवा निदेशालय और चिकित्सा शिक्षा विभाग की दो विशेषज्ञ टीमों ने जमीनी आकलन शुरू कर दिया है।

सरकारी मेडिकल कॉलेजों के सात विशेषज्ञों वाली यह टीम गर्भवती महिलाओं और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की जांच करेगी। इसके अलावा आदिवासी बस्तियों, स्वास्थ्य सुविधाओं, मोबाइल मेडिकल यूनिट और पोषण पुनर्वास केंद्र का भी दौरा कर जल्द ही अपनी सिफारिशों सहित एक रिपोर्ट सौंपेगी।

आदिवासी समूह 'थंपू' के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद का मानना है कि केवल चिकित्सीय जांच इन लगातार हो रही मौतों का पूरा सच सामने नहीं ला सकती। उनके मुताबिक, हाल ही में हुई 10 में से लगभग आठ मौतें गंभीर हृदय संबंधी समस्याओं से जुड़ी थीं, जिनमें दोषपूर्ण हार्ट वाल्व शामिल हैं। उन्होंने भारी सरकारी खर्च के बावजूद किसी व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन के अभाव पर भी सवाल उठाया। अट्टापदी में कुपोषण दूर करने के लिए विभिन्न परियोजनाओं के तहत अब तक लगभग 490 करोड़ रुपये आवंटित किए जा चुके हैं। भारतीय पोषण फाउंडेशन के अध्ययन भी इस क्षेत्र की पोषण स्थिति को पहले ही परख चुके हैं।

मातृ स्वास्थ्य यहां एक और बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया (खून की कमी) व्यापक रूप से फैला हुआ है। माताओं का कम वजन और नवजातों का जन्म के समय कम वजन इस जोखिम को और बढ़ा देता है। आदिवासी महिलाओं से जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चों का वजन 2 किलोग्राम से भी कम होता है। स्वास्थ्य विभाग, आईसीडीएस, कुदुम्बश्री और आईटीडीपी जैसी निगरानी पहलों के बावजूद, गर्भावस्था के पंजीकरण में होने वाली देरी के कारण शुरुआती हस्तक्षेप काफी मुश्किल हो जाता है।

सिकल सेल एनीमिया इस क्षेत्र की एक और गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। वर्ष 2013 के एक सर्वेक्षण में अट्टापदी में इस बीमारी के 212 मरीजों की पहचान हुई थी। वहीं, 2024 में एक चिकित्सा शिविर में एकत्र किए गए 80 नमूनों में से 18 की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। स्वास्थ्य पर्यवेक्षकों ने आदिवासी आबादी के एक बड़े हिस्से में इस आनुवंशिक बीमारी के मौजूद होने की आशंका भी जताई है।

राजेंद्र प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया कि भूमिहीनता, गरीबी, बदलते रोजगार और सांस्कृतिक कारकों को भी किसी भी सरकारी योजना का हिस्सा होना चाहिए। 1940 के दशक में अट्टापदी की कुल आबादी में आदिवासी समुदायों की हिस्सेदारी लगभग 95 प्रतिशत थी, जो अब घटकर केवल 44 प्रतिशत रह गई है। आदिवासी समुदायों के लिए जमीन सीधे तौर पर उनकी वंशावली, पहचान और पारंपरिक प्रथाओं से जुड़ी हुई है।

उन्होंने बताया कि कुछ रीति-रिवाजों और मान्यताओं के कारण कभी-कभी बस्तियों के बाहर जाकर इलाज कराना भी मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही, शराब का बढ़ता दुरुपयोग और अवैध शराब की आसान उपलब्धता स्थिति को और बिगाड़ रही है।

इन दुखद मौतों ने राज्य में एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) विपक्ष ने संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार पर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाते हुए शनिवार 31 अक्टूबर को अट्टापदी में 'काला दिवस' मनाया।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग कल्याण के पूर्व मंत्री ए.के. बालन ने मुख्यमंत्री के दौरे की मांग की है। उन्होंने सामुदायिक रसोई, नवजात देखभाल केंद्र, आंगनवाड़ी पोषण में सुधार और मोबाइल मेडिकल यूनिट की आवश्यकता पर जोर दिया। बालन का दावा है कि एलडीएफ के कार्यकाल के दौरान कुपोषण से जुड़ी एक भी शिशु मृत्यु नहीं हुई थी।

दूसरी ओर, पलक्कड़ के सांसद वी.के. श्रीकंदन ने सीपीआई (एम) पर मौतों का राजनीतिकरण करने और अपने स्वयं के रिकॉर्ड से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। एससी-एसटी कल्याण मंत्री के.ए. तुलसी ने बताया कि पिछली एलडीएफ सरकार के तहत बनाई गई समन्वय समिति की 2023 से कोई बैठक ही नहीं हुई है। उन्होंने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि उम्मन चांडी सरकार के दौरान सामुदायिक रसोई की संख्या 174 थी, जो अब घटकर मात्र 28 रह गई है।

थंपू और अन्य आदिवासी पर्यवेक्षकों के लिए वर्तमान में सबसे अहम कार्य इन मौतों को रोकना और इनके पीछे के वास्तविक कारणों की पहचान करना है। उनका तर्क है कि नियमित मातृ देखभाल, बेहतर पोषण, प्रारंभिक निदान और विशेष उपचार तक पहुंच सुनिश्चित करने के साथ-साथ भूमि और सामाजिक असमानताओं को दूर करने के उपाय भी समानांतर रूप से चलने चाहिए।

यह नई जांच इस बात का आत्मनिरीक्षण करने का एक अवसर है कि वर्षों से चलाए जा रहे कार्यक्रमों और करोड़ों के खर्च के बावजूद इन मौतों को रोका क्यों नहीं जा सका है। अब समय आ गया है कि जांच के निष्कर्षों को जमीन पर एक ठोस और निरंतर कार्रवाई में बदला जाए।

Keralam Attappady infant deaths.
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: रिश्ता टूटने पर आपसी सहमति से बने संबंधों को 'रेप' का नाम नहीं दिया जा सकता
Keralam Attappady infant deaths.
घर से निकाली गईं, पर सपने नहीं छोड़े: डॉ. रूथ जॉन पॉल बनीं MD करने वाली भारत की पहली दलित ट्रांसजेंडर महिला
Keralam Attappady infant deaths.
तेलंगाना: इलाज में लापरवाही का वीडियो बनाना पड़ा भारी, प्रताड़ना से तंग आकर दलित युवक ने दी जान, डॉक्टर और पुलिस पर FIR

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक को सब्सक्राइब करें

'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।

यहां सब्सक्राइब करें