
जब डॉ. कोय्याला रूथ जॉन पॉल ने अपने परिवार को अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के बारे में बताया, तो उन्हें बेरहमी से पीटा गया और घर से बाहर निकाल दिया गया। उस समय वह अपने मेडिकल कोर्स के तीसरे वर्ष में थीं। ऐसे मुश्किल हालात में, जब उनकी पढ़ाई हमेशा के लिए छूटने का खतरा था, तब उन्हें ट्रांसजेंडर समुदाय का साथ मिला और उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा।
आज, तेलंगाना के खम्मम जिले की रहने वाली यह होनहार डॉक्टर इमरजेंसी मेडिसिन में अपना एमडी (MD) पूरा कर चुकी हैं। 31 साल की उम्र में यह मुकाम हासिल कर वह भारत की पहली दलित ट्रांसजेंडर महिलाओं में से एक बन गई हैं। हालांकि, यह डिग्री उनके संघर्ष का अंत नहीं है। वह आज भी आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों में अपने जेंडर की सही मान्यता और गरीबों के लिए सरकारी अस्पताल में काम करने का हक मांग रही हैं।
तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी रूथ का बचपन खम्मम में बीता। साल 2006 में कार्डियक अरेस्ट से उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनकी मां ने दिहाड़ी मजदूरी करके तीनों बच्चों को पाला। डॉ. बीआर अंबेडकर के विचारों, विशेषकर आत्मसम्मान, शिक्षा और जातिगत भेदभाव के खिलाफ उनके संघर्ष से रूथ को गहरी प्रेरणा मिली। 10वीं और 12वीं की परीक्षा शानदार अंकों से पास करने के बाद, उन्होंने जन्म के समय मिले जेंडर के आधार पर ही मेडिकल की पढ़ाई शुरू की थी।
मेडिकल की पढ़ाई के तीसरे साल में जब उन्होंने अपने परिवार को अपनी सच्चाई बताई, तो घर वालों ने उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया। रूथ के सामने उस वक्त केवल भीख मांगने या सेक्स वर्क में जाने का ही विकल्प बचा था। लेकिन जल्द ही उनकी मुलाकात हैदराबाद की ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता रचना मुद्रबोयिना और वैजयंती वसंता मोगली से हुई, जिन्होंने उनकी पढ़ाई में मदद की। साल 2019 में हैदराबाद के एक मेडिकल कॉलेज से उन्होंने अपनी एमबीबीएस (MBBS) पूरी की। वक्त के साथ उनके परिवार का नजरिया भी बदला और आज वे रूथ के पूरे समर्थन में हैं।
एमबीबीएस पूरा करने के बाद उन्हें नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ा। साल 2018 में ग्रेजुएशन के बाद हैदराबाद के 15 अस्पतालों ने उन्हें अपनी पहचान के कारण काम देने से मना कर दिया था। आखिरकार, रूथ और एक अन्य ट्रांसजेंडर डॉक्टर प्राची राठौड़ को राज्य द्वारा संचालित उस्मानिया जनरल अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया। वे दोनों तेलंगाना में सरकारी नौकरी पाने वाली पहली ट्रांसजेंडर जोड़ी बनीं।
उनका अगला बड़ा लक्ष्य पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीट हासिल करना था। रूथ ने 2021 से 2023 के बीच तीन बार नीट-पीजी (NEET-PG) परीक्षा पास की। हालांकि आवेदन फॉर्म में उन्होंने खुद को अनुसूचित जाति (SC) ट्रांसजेंडर महिला के रूप में पंजीकृत किया था, लेकिन काउंसलिंग के दौरान उन्हें जानबूझकर महिला श्रेणी में डाल दिया गया। इस सिस्टम के खिलाफ उन्होंने साल 2021 में तेलंगाना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) ने 2022 में उन्हें पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि काउंसलिंग में ट्रांसजेंडर श्रेणी का कोई प्रावधान या मिसाल नहीं है। जून 2023 में यह मामला फिर से तेलंगाना उच्च न्यायालय में उठा, जहां कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पूर्वाग्रह के कारण एक ट्रांसजेंडर उम्मीदवार को पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीट से वंचित किया जा रहा है। कोर्ट में वकीलों ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को एक अलग श्रेणी के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
लंबी कानूनी लड़ाई के बीच अगस्त 2023 में रूथ ने हैदराबाद के ईएसआईसी (ESIC) मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी मेडिसिन के एमडी प्रोग्राम में दाखिला लिया। वह स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecology) बनना चाहती थीं, लेकिन उन्हें इमरजेंसी मेडिसिन आवंटित की गई। साल 2023 में अदालत के एक अंतरिम आदेश के जरिए उन्हें दाखिला तो मिला, लेकिन महिला श्रेणी में। 9 अक्टूबर को जब एमडी परीक्षा के परिणाम घोषित हुए, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था।
रूथ के लिए डॉक्टर बनना सिर्फ एक डिग्री तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपने आस-पास एचआईवी/एड्स से पीड़ित ट्रांसजेंडर महिलाओं को सही इलाज के लिए तड़पते देखा था, जिसने उन्हें चिकित्सा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए बने 'मित्र ट्रांसजेंडर क्लिनिक' में काम किया, जो 2025 में फंड की कमी के कारण बंद हो गया था। बाद में मई 2025 में नारायणगुडा में यह 'सबरंग क्लिनिक' के नाम से दोबारा खुला।
वर्तमान में ईएसआईसी अस्पताल में कार्यरत रूथ ने अपने बड़े भाई का सपना पूरा करने के लिए अपने नाम के साथ 'जॉन पॉल' जोड़ लिया है। उनके भाई भी डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन गरीबी के कारण उनका यह सपना टूट गया था। एमडी पूरा करने के बाद रूथ अब एक ऐसे सरकारी अस्पताल में काम करना चाहती हैं, जहां वह उन मरीजों का इलाज कर सकें जो निजी स्वास्थ्य सेवा का भारी भरकम खर्च नहीं उठा सकते।
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