सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: रिश्ता टूटने पर आपसी सहमति से बने संबंधों को 'रेप' का नाम नहीं दिया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: रिश्ता खत्म होने पर आपसी सहमति से बने यौन संबंधों को नहीं माना जाएगा 'रेप', जानें अदालत की अहम टिप्पणियां और चेतावनी।
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार 30 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि महिलाएं किसी रिश्ते के खराब होने या टूटने के बाद, आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को रेप का अपराध नहीं बता सकती हैं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस मामले में एक बेहद गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में एक चिंताजनक चलन देखने को मिल रहा है जिसमें आपसी सहमति से बने रिश्ते खत्म होने के बाद पुरानी बातों को बारीकी से खंगाला जाता है, ताकि किसी भी तरह से उन्हें यौन उत्पीड़न या हिंसा का रूप दिया जा सके।

यह फैसला केरल से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। इस मामले में एक व्यक्ति पर सात साल तक चले रिश्ते के विफल होने के बाद बार-बार रेप करने का आरोप लगाया गया था। शिकायतकर्ता महिला का कहना था कि उसे धोखे में रखा गया और इस बात की भनक तक नहीं लगने दी गई कि आरोपी पहले से ही शादीशुदा है और पिछली शादी से उसके दो बच्चे भी हैं।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि धोखे से हासिल की गई सहमति और रिश्ता खत्म होने के बाद पुराने शारीरिक संबंधों पर पछतावा होने के बीच एक स्पष्ट लकीर खींची जानी चाहिए। इन दोनों परिस्थितियों को किसी भी हाल में एक समान नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि रिश्ता टूटने के बाद पुराने संबंधों पर पछतावा होना दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर किसी सहमति वाले रिश्ते को अपराध की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। ऐसा नजरिया एक पुरुष की स्वतंत्रता और उसके पक्ष को पूरी तरह से दरकिनार कर देता है। उसे हमेशा इस बात का डर सताता रहेगा कि आपसी सहमति से बने किसी रिश्ते के कारण भविष्य में उस पर रेप का गंभीर आरोप लग सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि किसी रिश्ते के दौरान हुई शारीरिक निकटता को केवल इसलिए रेप का नाम नहीं दिया जा सकता, क्योंकि अब वह रिश्ता खराब हो चुका है और अस्तित्व में नहीं है।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में इस बात पर भी चिंता जताई कि आजकल विफल रिश्तों को आपराधिक मुकदमों में बदलने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। रेप एक बेहद जघन्य अपराध है और इस कानून का इस्तेमाल केवल वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती या सहमति के साथ की गई हेरफेर के मामलों में ही होना चाहिए। हर बिगड़ते रिश्ते को रेप का आरोप बना देने से न केवल इस अपराध की गंभीरता कम होती है, बल्कि आरोपी को भी कभी न खत्म होने वाले सामाजिक कलंक, उत्पीड़न और अन्याय का सामना करना पड़ता है।

हालांकि, अदालत ने इस दौरान एक बेहद जरूरी चेतावनी भी दी। कोर्ट ने माना कि रेप समाज में सबसे कम रिपोर्ट किए जाने वाले अपराधों में से एक है, जो सीधे तौर पर एक महिला की शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा पर हमला करता है।

जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि जहां रेप से जुड़े कानूनों का दुरुपयोग होता है, वहीं कई असली मामले कभी दुनिया के सामने ही नहीं आ पाते। जहां यौन हमले और हिंसा के स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हों, वहां न्याय के लिए पूरी ताकत से पैरवी होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही, जब रिश्ते टूटते हैं तो न्याय प्रणाली को बदले की भावना पूरी करने का हथियार बिल्कुल नहीं बनाया जाना चाहिए।

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