नई दिल्ली: देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के डिजिटल बैंकिंग सिस्टम पर गंभीर सवाल उठे हैं। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) ने आरोप लगाया है कि बैंक का डिजिटल सॉफ्टवेयर अनुसूचित जनजाति (ST) के ईसाई ग्राहकों के साथ कथित तौर पर भेदभाव कर रहा है। फोरम का कहना है कि नया खाता खोलते समय या केवाईसी अपडेट करते वक्त ईसाई ग्राहकों को एसटी श्रेणी चुनने से रोका जा रहा है और सिस्टम उन्हें अपने आप 'जनरल' (सामान्य) श्रेणी में डाल देता है।
फोरम के मुताबिक, एसबीआई के योनो (YONO) सहित अन्य बैंकिंग एप्लिकेशन में यह तकनीकी व्यवहार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जब कोई आवेदक धर्म के विकल्प में 'ईसाई' चुनता है, तो सॉफ्टवेयर तुरंत 'अनुसूचित जनजाति' चुनने वाले विकल्प को निष्क्रिय कर देता है। इसके बाद आवेदक को मजबूरन सामान्य श्रेणी की तरफ धकेल दिया जाता है, जो कि सरासर गलत है।
इस गंभीर मुद्दे को लेकर अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने बीते 5 अक्टूबर को ईटानगर में एसबीआई के क्षेत्रीय प्रबंधक को एक आधिकारिक ज्ञापन सौंपा है। फोरम ने बैंक प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि इस सॉफ्टवेयर संबंधी गड़बड़ी की जांच कर इसे 15 दिनों के भीतर दुरुस्त किया जाए। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि तय समय में समाधान नहीं हुआ, तो अरुणाचल प्रदेश भर में बैंक की शाखाओं के बाहर उग्र प्रदर्शन और घेराव किया जाएगा।
संगठन ने सॉफ्टवेयर के इस बर्ताव को संभावित रूप से भेदभावपूर्ण करार दिया है। उनका तर्क है कि अरुणाचल प्रदेश में आदिवासी या एसटी दर्जा किसी भी तरह से व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं पर निर्भर नहीं करता है। फोरम ने दो टूक कहा है कि एसबीआई कोई ऐसा सक्षम प्राधिकरण नहीं है, जो एक वैध एसटी प्रमाणपत्र धारक आदिवासी ईसाई का दर्जा अपनी मर्जी से रद्द कर दे। बैंक सिर्फ घोषित धर्म के आधार पर किसी भी आदिवासी ईसाई को सीधे जनरल कैटेगरी में वर्गीकृत नहीं कर सकता।
फोरम ने बैंक से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या ग्राहकों को जोड़ने वाली इस प्रणाली में यह सिर्फ एक तकनीकी खामी है या फिर इसके पीछे रिजर्व बैंक (RBI), किसी कानून या विशेष नियम का निर्देश है। उन्होंने एसबीआई से तुरंत अपने सॉफ्टवेयर लॉजिक को सुधारने का आग्रह किया है, ताकि धर्म और आदिवासी पहचान को एक-दूसरे के विपरीत न माना जाए। साथ ही, राज्य भर की सभी शाखाओं को इस संबंध में उचित निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है।
गौरतलब है कि अरुणाचल प्रदेश में धार्मिक पहचान और अनुसूचित जनजाति के दर्जे के संबंध को लेकर लंबे समय से एक व्यापक बहस छिड़ी हुई है। इससे पहले मई महीने में भी फोरम ने धर्म के आधार पर आदिवासी समुदायों से एसटी का दर्जा छीनने की मांग का कड़ा विरोध किया था। उनका स्पष्ट मानना है कि आदिवासी पहचान स्वदेशी जड़ों और संवैधानिक मानदंडों से जुड़ी है, न कि धर्म से।
यह दावा इसलिए भी मजबूत है क्योंकि आधिकारिक सरकारी जनगणना के आंकड़े भी राज्य में ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों को एसटी आबादी के रूप में अलग से दर्ज करते हैं। इससे राज्य की एसटी आबादी में ईसाई समुदाय की वैध उपस्थिति प्रमाणित होती है। फिलहाल, अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम के इन गंभीर आरोपों पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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