
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में देशभर से आए लाखों आदिवासियों का भारी हुजूम देखने को मिला। मौका था 'जनजाति सांस्कृतिक संगम' का, जहां स्वदेशी संस्कृति की अनोखी झलक के साथ-साथ एक बड़ी मांग भी गूंजी। इस दौरान अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी से उन लोगों को बाहर करने की आवाज उठाई गई, जिन्होंने अपनी मूल आस्था को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लिया है।
इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े 'जनजाति सुरक्षा मंच' द्वारा किया गया था। यह ऐतिहासिक आयोजन महान आदिवासी जननायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में रखा गया था।
दिल्ली गेट के पास हुए इस विशाल जमावड़े में विभिन्न राज्यों के 550 से अधिक आदिवासी समूहों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। लोगों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं और अपनी जड़ों से जुड़ाव का संदेश दिया।
इसके साथ ही मार्च और सार्वजनिक प्रदर्शनों के जरिए आदिवासी पहचान, संवैधानिक अधिकारों और स्वदेशी रीति-रिवाजों के संरक्षण से जुड़े अहम मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया।
इस महासम्मेलन के दौरान सबसे बड़ी मांग संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन को लेकर थी। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना था कि जो व्यक्ति पारंपरिक आदिवासी आस्थाओं को छोड़कर दूसरे धर्मों में जा चुके हैं, उनका एसटी दर्जा तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाना चाहिए।
आंदोलनकारियों ने तर्क दिया कि ऐसे धर्मांतरित लोग व्यवस्था का दोहरा लाभ उठा रहे हैं। वे अल्पसंख्यक समुदायों को मिलने वाली सुविधाओं के साथ-साथ अनुसूचित जनजातियों के लिए तय किए गए आरक्षण का भी पूरा फायदा ले रहे हैं।
सभा को संबोधित करते हुए कई वक्ताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि धर्मांतरण के कारण आदिवासी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान का धीरे-धीरे पतन हो रहा है। इसके समाधान के लिए उन्होंने एसटी दर्जे को नियंत्रित करने वाले मौजूदा संवैधानिक ढांचे की तत्काल समीक्षा करने का आह्वान किया।
आयोजकों और कार्यक्रम में आए हजारों प्रतिभागियों ने एक स्वर में यह स्पष्ट किया कि उनकी यह मांग किसी विशेष धर्म को निशाना बनाने के लिए बिल्कुल नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य अपनी मूल आदिवासी विरासत, सामुदायिक अधिकारों और स्वदेशी संस्कृति की रक्षा करना है।
कुल मिलाकर यह आयोजन सांस्कृतिक उत्सव और कड़े राजनीतिक संदेश का एक अनूठा संगम रहा। देशभर से आए आदिवासी समूहों ने एकजुट होकर अपनी पहचान और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़े नीतिगत बदलावों के लिए एक मजबूत और स्पष्ट संदेश दिया है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.
यहां सपोर्ट करें