
नई दिल्ली में वामपंथी विचारधारा से जुड़े आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (AARM) का राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ। रविवार, 6 सितंबर को इस सम्मेलन में एक अहम प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव में अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के संसाधनों, शिक्षा, रोजगार और संस्कृति से जुड़े अधिकारों का एक विस्तृत मांग पत्र पेश किया गया है।
इन मांगों में मुख्य रूप से एसटी समुदायों के लिए आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने और निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने की वकालत की गई है। इसके साथ ही, आदिवासी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठाई गई है। संगठन ने इस बात पर खास जोर दिया है कि एसटी वर्गीकरण के मानदंडों को किसी भी तरह के "राजनीतिक हेरफेर" से पूरी तरह मुक्त रखा जाना चाहिए।
एएआरएम द्वारा एसटी वर्गीकरण के कुछ मानदंडों की समीक्षा की यह मांग ऐसे समय में आई है जब संघ परिवार से जुड़े आदिवासी संगठन भी ऐसी ही समीक्षा चाहते हैं, लेकिन उनके इरादे अलग हैं। जनजाति सुरक्षा मंच और अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों ने एसटी वर्गीकरण में धर्म का मानदंड जोड़ने की मांग की है। उनका मकसद इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले एसटी समुदायों को इस सूची से बाहर करना है।
हालांकि, एएआरएम ने इन दोनों ही दक्षिणपंथी मांगों का कड़ा विरोध किया है। संगठन ने स्पष्ट किया है कि केवल कुछ पुराने और अप्रासंगिक हो चुके मानदंडों की ही समीक्षा होनी चाहिए, ताकि वर्गीकरण की प्रक्रिया को समय के अनुकूल बनाया जा सके।
सीपीआई (एम) नेता और एएआरएम की उपाध्यक्ष वृंदा करात ने इस मुद्दे पर बेबाक राय रखी। उन्होंने बताया कि एसटी समुदायों की पहचान के लिए 1965 में बनी लोकुर समिति के कुछ मानदंड अब पूरी तरह से पुराने हो चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी समुदाय को एसटी मानने के लिए उसका भौगोलिक रूप से अलग-थलग रहना या बाहरी संपर्क से कतराने जैसी शर्तें अब प्रासंगिक नहीं हैं और इनकी फौरन समीक्षा होनी चाहिए।
करात ने बिना किसी समुदाय का नाम लिए कहा कि विभिन्न राज्यों में भाजपा गैर-आदिवासियों की मदद करके आदिवासियों को बांटने की कोशिश कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों को एसटी प्रमाण पत्र मांगने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो एक बेहद खतरनाक खेल है। उन्होंने आगे कहा कि जहां भी भाजपा सत्ता में है और आदिवासी आबादी अधिक है, वहां राज्य सरकारों और आरएसएस का इस्तेमाल आदिवासियों को विभाजित करने के लिए किया जा रहा है, ताकि वे अपने बहुसंख्यक पहचान वाले एजेंडे को थोप सकें।
नई दिल्ली में हुए इस राष्ट्रीय अधिवेशन में देशभर से आए प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इन लोगों ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) को लागू करने में आ रही दिक्कतों और रोजगार व शिक्षा में आदिवासियों की अनदेखी जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की। इसके अलावा, आदिवासी पहचान, संस्कृति, भाषा और मान्यताओं के सामने खड़ी चुनौतियों पर भी विस्तार से बात की गई। इन सभी चिंताओं को सम्मेलन में पारित प्रस्ताव का हिस्सा बनाया गया है।
वन अधिकार अधिनियम (FRA) के संबंध में, एएआरएम ने खारिज किए गए दावों की समयबद्ध समीक्षा करने और ग्राम सभाओं को और अधिक अधिकार देने की मांग की है। उन्होंने अपने वैधानिक दायरे से बाहर काम कर रहे राज्य कार्य बलों को खत्म करने और जंगलों से आदिवासियों की बेदखली पर तुरंत रोक लगाने पर भी जोर दिया। रोजगार के मोर्चे पर, सरकार की सभी भर्तियों में आरक्षण लागू करने, सरकारी संस्थाओं के रोजगार व आरक्षण डेटा सार्वजनिक करने, बैकलॉग के सभी खाली पदों को भरने और निजीकरण की नीतियों को खत्म करने की मांग रखी गई।
आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा के लिए बजट आवंटन बढ़ाने की भी पुरजोर वकालत की गई है। इसके साथ ही स्कूलों में पौष्टिक और गर्म मिड-डे मील देने, मेन्यू में फिर से अंडे शामिल करने, छात्रवृत्ति की राशि बढ़ाने और आदिवासी छात्रों के लिए खेल सुविधाएं मुहैया कराने पर जोर दिया गया है। संगठन चाहता है कि आदिवासी शिक्षण संस्थानों में मातृभाषा में एक "धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक" पाठ्यक्रम लागू किया जाए।
संवैधानिक अधिकारों की बात करते हुए, संगठन ने संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA - पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम) कानून के तहत आने वाले क्षेत्रों का विस्तार करने की मांग की है। साथ ही, आदिवासी प्रथागत कानूनों में सुधार को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया है, विशेष रूप से उन हिस्सों में जो समाज में पितृसत्ता को मजबूत करते हैं।
आरक्षण के मुद्दे पर एएआरएम ने एक अहम आंकड़ा पेश करते हुए मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी में एसटी समुदायों की हिस्सेदारी 8.6% थी, लेकिन उनके लिए उपलब्ध आरक्षण आज भी 7.5% पर ही अटका हुआ है। संगठन ने मांग की है कि आगामी 2027 की जनगणना के अनुसार एसटी आबादी के सटीक अनुपात में ही उनके आरक्षण का प्रतिशत भी बढ़ाया जाना चाहिए।
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