सिजिमाली खनन परियोजना: पूर्व नौकरशाहों ने आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रपति मुर्मू से किया हस्तक्षेप का आग्रह

ओडिशा के रायगड़ा में सिजिमाली खनन परियोजना पर विवाद गहराया। फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों और पुलिस कार्रवाई का आरोप लगाते हुए पूर्व नौकरशाहों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से तत्काल दखल की मांग की है।
Sijimali mining project, Odisha mining dispute
ओडिशा की सिजिमाली खनन परियोजना पर विवाद। पूर्व नौकरशाहों ने फर्जी ग्राम सभा और हिंसा का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति मुर्मू से तुरंत दखल की मांग की।
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नई दिल्ली: ओडिशा के रायगड़ा जिले में विवादित सिजिमाली खनन परियोजना को लेकर पूर्व नौकरशाहों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं के पूर्व अधिकारियों के समूह, कॉन्स्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (CCG) ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में राज्य में आदिवासी जमीनों से कथित अवैध बेदखली के मुद्दे पर उनके तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।

राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में समूह ने रायगड़ा के कांतामाल गांव में पुलिस कार्रवाई की खबरों पर भारी नाराजगी जताई है। आरोप है कि अपने सामुदायिक अधिकारों की रक्षा कर रहे आदिवासी निवासियों को खदेड़ा गया। ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई इस हिंसक झड़प में 70 से अधिक लोगों के घायल होने का दावा किया गया है।

पूर्व अधिकारियों ने याद दिलाया है कि यह प्रभावित क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जो आदिवासी इलाकों को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।

इस पूरे मामले की तुलना ऐतिहासिक नियमगिरि विवाद से की जा रही है। समूह ने बताया कि कैसे साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत ग्राम सभाओं के अधिकार को बरकरार रखा था। उस समय सभी 12 संबंधित ग्राम सभाओं ने नियमगिरि पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था।

अब आरोप लगाया जा रहा है कि नियमगिरि से 50 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित सिजिमाली क्षेत्र में भी ठीक वैसा ही प्रयास किया जा रहा है, जहां खनन के लिए वन भूमि का डायवर्जन प्रस्तावित है।

सीसीजी का दावा है कि दिसंबर 2025 में दी गई स्टेज-I वन मंजूरी पूरी तरह से साल 2023 में पारित कथित फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों पर आधारित है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि ग्राम सभा की बैठकों में गैर-निवासियों ने भाग लिया था।

इतना ही नहीं, उपस्थिति दर्ज करने वाले दस्तावेजों में नाबालिगों और मृत व्यक्तियों के नाम भी शामिल दिखाए गए हैं। ऐसा अंदेशा है कि धोखाधड़ी और हेरफेर के जरिए सहमति प्राप्त की गई और कुछ मामलों में तो बैठकें हकीकत में कभी हुई ही नहीं। इन फर्जी प्रस्तावों को रद्द करने के लिए दो ग्राम पंचायतों ने फरवरी 2025 में उड़ीसा उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था।

मार्च 2025 में अदालत ने केंद्र सरकार को उठाई गई चिंताओं पर विचार करने का निर्देश देते हुए इस मामले का निपटारा कर दिया था। इसके बावजूद, पुलिस सुरक्षा के साये में खनन परियोजना के लिए सड़क निर्माण का काम जारी रहने की खबरें हैं।

सीसीजी ने इन घटनाक्रमों को सुप्रीम कोर्ट के नियमगिरि फैसले और 1997 के समता फैसले की भावना का सीधा उल्लंघन करार दिया है। उनका साफ कहना है कि उचित परामर्श, सहमति और लाभ-बंटवारे के बिना आदिवासी भूमि और सार्वजनिक संसाधनों को निजी संस्थाओं को बिल्कुल हस्तांतरित नहीं किया जाना चाहिए।

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारियों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि दिसंबर 2023 के ग्राम सभा प्रस्तावों की व्यापक रूप से दोबारा जांच सुनिश्चित की जाए। साथ ही, जांच पूरी होने तक स्टेज-I वन डायवर्जन मंजूरी को निलंबित करने की मांग की गई है। इसके अलावा, सिजिमाली खनन क्षेत्र में चल रहे सड़क निर्माण को तत्काल रोकने की अपील भी की गई है।

समूह ने यह भी अनुरोध किया है कि आदिवासी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा समीक्षा की जाए। अंत में, आदिवासी समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम को अधिक सख्ती से लागू करने पर जोर दिया गया है।

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