
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार, को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को लेकर एक अहम मांग की है। सरकार चाहती है कि करीब चार अलग-अलग उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट) में चल रहे इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट अपने पास ट्रांसफर कर ले।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट जून के पहले सप्ताह में अपनी गर्मी की छुट्टियों के बाद काम पर लौट रहे हैं। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट जून के महीने में आंशिक रूप से ही काम कर रहा है।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि ऐसी पूरी संभावना है कि हाई कोर्ट इन याचिकाओं पर सुनवाई करके अपने-अपने आदेश पारित कर सकते हैं। सरकार को डर है कि एक ही कानून पर अलग-अलग अदालतों के 'अलग-अलग विचार' (divergent views) सामने आ सकते हैं, जिससे कानूनी जटिलताएं पैदा होंगी।
इसी स्थिति से बचने के लिए शीर्ष कानून अधिकारी ने मुख्य न्यायाधीश से गुजारिश की है कि इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की केंद्र की याचिका को 29 मई को सूचीबद्ध किया जाए। इस मांग पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संक्षिप्त जवाब देते हुए कहा, "हम देखेंगे।"
सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही 2026 के इस विवादित कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं लंबित हैं। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से कानून द्वारा 'स्वयं की पहचान' (right to self-identity) के अधिकार को खत्म करने की कड़ी आलोचना की गई है। 2026 के नए अधिनियम के तहत, किसी भी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर प्रमाणित करने के लिए जिलाधिकारी को सरकार द्वारा नियुक्त मेडिकल बोर्ड की अनुकूल सिफारिश की आवश्यकता होती है।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और अन्य कार्यकर्ताओं ने इस कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह अधिनियम ट्रांसजेंडर पहचान को एक "स्वतंत्र रूप से चुनी गई प्रामाणिक मानवीय पहचान" के रूप में मानने से इनकार करता है।
उनका कहना है कि लिंग मान्यता के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने इसे राज्य द्वारा की जा रही "मेडिकल गेटकीपिंग" (medical gatekeeping) करार दिया है।
वहीं, इन आरोपों के जवाब में सरकार ने भी अपना रुख स्पष्ट किया है। केंद्र का तर्क है कि इस अधिनियम को लाने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समुदाय के वास्तविक और योग्य लोगों को इसका लाभ मिल सके। सरकार ने यह भी बताया कि इस कानून के जरिए जबरन लिंग परिवर्तन को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं ने एक और गंभीर मुद्दे की ओर अदालत का ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि नए कानून के लागू होने से चल रही सेक्स-चेंज (लिंग परिवर्तन) थेरेपी और इलाज अचानक रुक गए हैं। इस वजह से समुदाय के कई लोग बेहद संकटपूर्ण स्थिति में फंस गए हैं।
इन याचिकाओं में यह दलील भी दी गई है कि 2026 का यह संशोधन 2014 के ऐतिहासिक नाल्सा (NALSA) फैसले की मूल भावना को ही खत्म कर देता है। नाल्सा जजमेंट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि स्वयं की पहचान का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
उस ऐतिहासिक फैसले में यह तय हुआ था कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके खुद के द्वारा निर्धारित होती है, न कि उसके जीव विज्ञान, जन्म के समय तय किए गए लिंग या राज्य के सत्यापन से। लेकिन 2026 के नए अधिनियम की धारा 3 ने स्वयं द्वारा महसूस की गई लिंग पहचान के अधिकार को ही कानून से हटा दिया है।
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