'100 साल से यह हमारा घर है, हम इसे कैसे छोड़ दें?': केरल में बेदखली के खिलाफ 7 दलित परिवारों का जद्दोजहद

केरल के मलयिडमथुरुथ में भूमि विवाद के चलते पीढ़ियों से अपनी ज़मीन पर रह रहे 7 दलित परिवारों पर बेदखली का खतरा, जानें 50 साल पुराने इस विवाद की पूरी कहानी।
CPI(M) protest meeting agsint the eviction on May 23
23 मई को बेदखली के विरोध में CPI(M) की विरोध सभाPic- thenewsminute.com
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केरल: एर्नाकुलम के किज़क्कमबलम के पास मलयिडमथुरुथ में रहने वाले सात दलित परिवारों का कहना है कि उनके लिए उस जगह को छोड़ना अकल्पनीय है, जहाँ उनका जन्म और पालन-पोषण हुआ। इसी ज़मीन पर उनके पूर्वजों को दफनाया गया है और उनका परिवार 100 से अधिक वर्षों से यहीं बसा हुआ है।

हाल ही में बेदखली के एक हिंसक प्रयास के दौरान घायल हुए 74 वर्षीय चंद्रन ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि उन्हें लगा जैसे उनकी सांस रुक गई हो और कुछ पलों के लिए उन्हें अपनी जान जाती हुई महसूस हुई।

बीती 20 मई को इन परिवारों को बेदखल करने के लिए लगभग 200 पुलिसकर्मी मलयिडमथुरुथ पहुंचे थे, जिसमें कई लोग घायल हो गए। यह घटना कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) सरकार के कैबिनेट गठन के मात्र 48 घंटे बाद हुई। इसके बाद विपक्षी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई(एम)] ने नई सरकार पर केरल में 'बुलडोज़र राज' लागू करने का आरोप लगाया है।

इस पूरी घटना ने दशकों पुराने उस भूमि विवाद को फिर से सुर्खियों में ला दिया है, जो एक निजी व्यक्ति और पीढ़ियों से इस ज़मीन पर रह रहे सात दलित परिवारों के बीच चल रहा है।

50 साल पुराना भूमि विवाद

यह पूरा विवाद 2.65 एकड़ ज़मीन को लेकर है, जिस पर अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के तहत आने वाले पुलया जाति के इन सात परिवारों का कब्ज़ा है। यह भूखंड 19 एकड़ सरकारी (पुरंबोक) ज़मीन से सटा हुआ है। इसकी सीमाओं को लेकर भी विवाद है और इसे केवल एक उचित सर्वेक्षण के माध्यम से ही सुलझाया जा सकता है।

मलयिडमथुरुथ के इन दलित परिवारों का इतिहास कलुकुरुंबन नामक एक बंधुआ मज़दूर से जुड़ा है, जो लगभग सौ साल पहले इस ज़मीन पर रहते थे। वर्तमान निवासी उनकी पाँचवीं और छठी पीढ़ी के वंशज हैं। 1970 के दशक में लड़ी गई कानूनी लड़ाइयों में परिवारों के इस ज़मीन पर रहने के अधिकार की पुष्टि हुई थी।

सीपीआई(एम) के एर्नाकुलम ज़िला सचिव एस सतीश के अनुसार, इस ज़मीन को लेकर कानूनी रस्साकशी दो चरणों में हुई। 1975 में शंकरन नायर नामक एक व्यक्ति ने संपत्ति के स्वामित्व का दावा करते हुए मामला दायर किया। उसी समय दलित परिवारों ने भूमि अधिकार (पट्टा) की मांग करते हुए पेरुंबवूर मुंसिफ कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

किज़क्कमबलम पंचायत के पूर्व अध्यक्ष और सीपीआई(एम) स्थानीय समिति के सदस्य एमके अनिलकुमार ने बताया कि शंकरन क्षेत्र के एक ज़मींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे। करीब 20 साल पहले उनका निधन हो गया और वर्तमान में इस मामले को उनकी बेटियां सुभद्रा, अंबिका और उनके परिवार के सदस्य देख रहे हैं।

1975 में अदालत ने दोनों मामलों पर संयुक्त रूप से विचार किया और शंकरन के दावे को खारिज कर दिया। दलित निवासियों की पट्टे की मांग पर अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व भूमि पर पट्टा देना सरकारी नीति का मामला है और इस पर निर्णय लेने का अधिकार केवल सरकार के पास है। इसके बाद मामला परवूर सब-कोर्ट और फिर केरल उच्च न्यायालय में गया, जहाँ दोनों बार निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया।

रिकॉर्ड में हेरफेर और कानूनी लड़ाई

1980 के दशक की शुरुआत में ज़मीन का दोबारा सर्वेक्षण हुआ। सीपीआई(एम) नेताओं और स्थानीय निवासियों का आरोप है कि शंकरन ने अधिकारियों को प्रभावित करके रिकॉर्ड में हेरफेर किया और विवादित ज़मीन को अपने स्वामित्व वाले सर्वे नंबर के तहत दिखा दिया। इन्हीं नए रिकॉर्ड के आधार पर उन्होंने 1984 में दूसरी बार अदालत का रुख किया और अपने पक्ष में फैसला हासिल कर लिया।

यह मामला केरल उच्च न्यायालय से होते हुए अंततः 2022 में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा, जहाँ शंकरन के पक्ष में फैसला सुनाया गया। हालाँकि, दलित निवासियों के भारी विरोध के कारण अदालत के आदेशों को लागू नहीं किया जा सका।

इसके बाद पेरुंबवूर मुंसिफ कोर्ट ने पुलिस-प्रशासन को 23 मई तक बेदखली की प्रक्रिया पूरी करने और 26 मई तक अंतिम निष्पादन रिपोर्ट सौंपने का सख्त अल्टीमेटम दिया। इसी आदेश के तहत 20 मई को पुलिस और एडवोकेट कमीशन की टीम दलितों को बेदखल करने गाँव पहुंची।

परिवारों का कहना है कि पुलिस की यह कार्रवाई अभूतपूर्व रूप से गंभीर थी। घटना के तीन दिन बाद इलाके के निवासियों ने बताया कि पुलिस इससे पहले भी 14 बार उन्हें बेदखल करने आ चुकी है, लेकिन इतने बल का प्रयोग कभी नहीं किया गया।

लाइव लॉ (LiveLaw) की रिपोर्ट के अनुसार, 25 मई को जब यह मामला फिर से केरल उच्च न्यायालय पहुंचा, तो अदालत ने सरकार को बेदखली की कार्रवाई के लिए दो सप्ताह का समय दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि वे लोग उस संपत्ति पर रह रहे हैं, तो उनका पूर्व-मौजूद अधिकार होना चाहिए जिसे कानूनी तरीके से लागू किया गया हो, और जब तक ऐसा नहीं होता, वे बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते।

भूमि मापन और सर्वेक्षण की मांग

सीपीआई(एम) का आरोप है कि पुलिस की कार्रवाई ने दलितों के प्रति यूडीएफ सरकार की क्रूरता को उजागर कर दिया है। उनका तर्क है कि 2022 के फैसले के बाद एलडीएफ सरकार ने यह पता लगाने के लिए सर्वेक्षण शुरू किया था कि ज़मीन सरकारी है या नहीं। उनका मानना है कि बेदखली के बजाय यूडीएफ सरकार को भूमि मापन प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए।

पूर्व विधायक और पट्टिकाजाति क्षेमा समिति (पीकेएस) की राज्य उपाध्यक्ष अधिवक्ता संथाकुमारी ने बताया कि पिछली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार ने 19 एकड़ ज़मीन के सर्वेक्षण के लिए एक संयुक्त सत्यापन टीम नियुक्त की थी। उन्होंने कहा कि यह फैसला तीन-चार साल पहले लिया गया था और संबंधित लोगों को नोटिस भी जारी किए गए थे, लेकिन प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

सामाजिक कार्यकर्ता एनए अशरफ द्वारा 19 एकड़ सरकारी ज़मीन के दस्तावेज़ों में हेरफेर का आरोप लगाने वाली रिट याचिका पर 10 अक्टूबर 2023 के उच्च न्यायालय के आदेश के बाद, एर्नाकुलम कलेक्टर ने 23 मार्च 2024 को 19 एकड़ पुरंबोक ज़मीन के सर्वेक्षण का आदेश भी दिया था।

अनिश्चितता के साये में जिंदगियां

इन सबके बीच सात दलित परिवारों का भविष्य अधर में लटका है। उन्होंने अपने जीवन भर की जमापूंजी से यहाँ घर बनाए हैं। बेदखली के खतरे का सामना कर रहे निवासी एबिन थंकाचन ने सवाल किया कि जो लोग यहाँ पाँच पीढ़ियों से रह रहे हैं, वे इस जगह को कैसे छोड़ सकते हैं।

ये परिवार मुख्य रूप से खेती, पशुपालन और दिहाड़ी मज़दूरी पर निर्भर हैं। एबिन ने बताया कि वे अपने घरों का टैक्स तो भरते आ रहे हैं, लेकिन मालिकाना हक़ न होने के कारण उन्होंने भूमि कर नहीं दिया है। उनके पूर्वजों की कब्रें भी यहीं उनके घरों के ठीक पीछे मौजूद हैं।

यहाँ उनके दो पवित्र उपवन (कावु) और मंदिर से जुड़ी परंपराएं भी हैं जिनका वे पीढ़ियों से पालन कर रहे हैं। 48 वर्षीय सजिता ने बताया कि उन्होंने बचपन से अपने पिता को इस ज़मीन के लिए लड़ते देखा है और अब उनके बच्चे भी इसी तनाव से गुज़र रहे हैं। इन सात परिवारों में स्कूल जाने वाले करीब 10 बच्चे हैं।

शादी के बाद एयरपुरम जा चुकीं मलयिडमथुरुथ की मूल निवासी सनिषा का कहना है कि अगर ज़मीन शंकरन नायर की है तो वे दस्तावेज़ दिखाकर इसे ले सकते हैं। लेकिन अगर यह सरकारी ज़मीन है, तो सरकार को इसे अपने कब्ज़े में लेकर तय करना चाहिए कि यह किसे दी जाए। उन्होंने पुरंबोक ज़मीन को किसी निजी व्यक्ति को सौंपने का कड़ा विरोध किया।

पुलिस कार्रवाई पर बढ़ता आक्रोश

सीपीआई(एम) और उससे जुड़े संगठनों ने इस घटना के बाद मलयिडमथुरुथ में विरोध प्रदर्शन किया। पीकेएस की उपाध्यक्ष संथाकुमारी ने पुलिस हस्तक्षेप को मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय का उल्लंघन बताते हुए इसे सामंती मानसिकता और गहरी जातिगत कार्यप्रणाली का परिणाम बताया।

पुलिस कार्रवाई को लेकर एक 44 वर्षीय महिला ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि पुलिसकर्मियों ने उनके कपड़े फाड़ दिए और उन्हें सड़क पर घसीटा। सजिता ने भी याद करते हुए कहा कि हमला अचानक हुआ था और वहां महिला व पुरुष दोनों पुलिसकर्मी मौजूद थे।

सीपीआई(एम) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पी राजीव ने इसे पुलिस क्रूरता का उदाहरण करार दिया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार का रुख था कि पुलिस बल के ज़रिए बेदखली न हो, इसलिए 2022 के फैसले के बाद भी किसी को मजबूर नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि नई सरकार और खासकर मुख्यमंत्री के अपने ज़िले में ऐसी अचानक कार्रवाई की उम्मीद नहीं थी।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इन परिवारों ने पुलिस कार्रवाई का सामना किया है। निवासियों के अनुसार, जब 2025 में पुलिस और राजस्व अधिकारी सर्वेक्षण करने आए थे, तब भी शारीरिक बल का प्रयोग किया गया था और कुछ लोगों पर मामले भी दर्ज किए गए थे।

सरकार का रुख और पुनर्वास का आश्वासन

इस बढ़ते विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री वीडी सतीसन ने 25 मई, सोमवार को मीडिया से कहा कि पिछली एलडीएफ सरकार ने 14 प्रयासों के बावजूद इन परिवारों के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि अदालत के आदेशानुसार बेदखली की जाती है, तो सरकार उन्हें बेघर नहीं छोड़ेगी। सरकार उन्हें वैकल्पिक आवास और ज़मीन देकर उनका पर्याप्त पुनर्वास सुनिश्चित करेगी।

पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री केए तुलसी ने स्पष्ट किया कि जैसे ही मामला सरकार के संज्ञान में आया, पुलिस की कार्यवाही रोकने के लिए तत्काल कदम उठाए गए।

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता पीजे मैनुअल ने केरल में दलित और भूमिहीन समुदायों के व्यवस्थागत हाशिएकरण पर चिंता ज़ाहिर की। उन्होंने बताया कि कानूनी ढांचे अक्सर ऐतिहासिक निवासियों की तुलना में विशेषाधिकार प्राप्त ज़मींदारों का पक्ष लेते हैं। मैनुअल का दृढ़ मानना है कि इस समस्या का एकमात्र समाधान ज़मीन को इन हाशिए के समुदायों को सौंपना है, न कि उन्हें बार-बार किसी और जगह स्थानांतरित करना।

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