
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान ट्रांसजेंडर अधिकारों और स्व-पहचान से जुड़े मुद्दे पर बड़ी टिप्पणी की। अदालत ने चेतावनी दी कि कुछ लोग कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ उठाने के लिए ट्रांसजेंडर होने का दिखावा कर सकते हैं, जो कि एक गंभीर खतरा है।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की, जिनमें स्व-पहचान के अधिकार को खत्म करने वाले नए कानून को चुनौती दी गई है। पीठ ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस कानून पर रोक लगाने का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इसे अभी तक आधिकारिक तौर पर अधिसूचित नहीं किया गया है।
ट्रांसजेंडर पर्सन (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत अब किसी भी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर के रूप में प्रमाणित करने के लिए नए नियम तय किए गए हैं। इसके लिए सरकारी मेडिकल बोर्ड की अनुकूल सिफारिश के आधार पर जिलाधिकारी (डीएम) द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया जाना अनिवार्य कर दिया गया है।
इस कानून का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जैसे प्रसिद्ध अधिकार कार्यकर्ता शामिल हैं। उनका तर्क है कि यह अधिनियम ट्रांसजेंडर पहचान को एक स्वतंत्र रूप से चुनी गई प्रामाणिक मानवीय पहचान के रूप में खारिज करता है। उन्होंने मेडिकल प्रमाणीकरण की अनिवार्यता को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन और राज्य द्वारा लागू की गई 'मेडिकल गेटकीपिंग' करार दिया है।
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या 140 करोड़ की आबादी वाले देश में इस बात का खतरा नहीं है कि कुछ लोग सिर्फ आरक्षण या विशेषाधिकार हथियाने के लिए इस पहचान का ढोंग रचें। अदालत ने चिंता जताई कि ऐसे फर्जीवाड़े से उन लोगों का हक छिन जाएगा, जो अपनी वास्तविक शारीरिक या जैविक परिस्थितियों के कारण इन सुविधाओं के असली हकदार हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी ने अदालत को बताया कि वर्तमान में ट्रांसजेंडर पर्सन्स के लिए किसी भी तरह का आरक्षण लागू नहीं है। उन्होंने दलील दी कि भविष्य में लाभ पाने के लिए इस पहचान का फर्जीवाड़ा करने वालों की संख्या बमुश्किल .001% ही होगी। सिंघवी ने कहा कि यह नया अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार को पूरी तरह से छीन लेता है।
सिंघवी ने पीठ द्वारा इस्तेमाल किए गए 'असामान्यताएं' शब्द पर भी कड़ी असहमति जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक और मनोदैहिक संरचना जन्म के समय निर्धारित लिंग से अलग होती है। ऐसे में व्यक्ति को उस लिंग में आधिकारिक रूप से स्थानांतरित होने का विकल्प चुनने का पूरा अधिकार है, जिसके साथ वह स्वाभाविक रूप से खुद को जोड़ता है।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि यह अधिकार ही स्व-पहचान या आत्म-मान्यता का मूल आधार है, जिसे यह कानून पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है। उन्होंने चिंता जताई कि यह अधिनियम ट्रांसजेंडर समुदाय को पतन के कगार पर धकेल रहा है। सिंघवी का तर्क था कि माता-पिता, समाज या राज्य किसी भी व्यक्ति पर जबरन कोई पहचान नहीं थोप सकते।
इस दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में सरकार का मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस अधिनियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समुदाय के केवल योग्य और वास्तविक व्यक्तियों को ही योजनाओं का लाभ मिले। मेहता ने इस बात पर जोर दिया कि कानून में केवल जबरन किए जाने वाले लिंग परिवर्तन को अपराध माना गया है।
मेहता ने अदालत को बताया कि यदि किसी को लिंग परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह कानून उस कृत्य को अपराध की श्रेणी में डालता है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि बच्चों को जबरन बधिया किए जाने जैसी गंभीर घटनाएं सामने आ रही हैं, जिन पर रोक लगाना आवश्यक है। अदालत ने इन सभी दलीलों को सुनने के बाद केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर दिए हैं।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के ध्यान में यह बात भी लाई कि इस नए कानून के कारण चल रही लिंग-परिवर्तन थेरेपी और उपचार अचानक रुक गए हैं, जिससे समुदाय के कई लोग भारी संकट में पड़ गए हैं। याचिकाओं में यह भी तर्क दिया गया है कि 2026 के संशोधन ऐतिहासिक 2014 के नालसा (NALSA) फैसले को काफी कमजोर करते हैं, जिसने स्व-पहचान को एक मौलिक अधिकार माना था।
नालसा फैसले में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि पहचान का निर्धारण व्यक्ति स्वयं करता है, न कि उसका जीव विज्ञान, जन्म या राज्य का सत्यापन तंत्र। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि नए कानून की धारा 3 स्व-अनुभूत लिंग पहचान के अधिकार को ही खत्म कर देती है।
याचिका में कहा गया है कि "ट्रांसजेंडर पर्सन्स" की नई परिभाषा में उन लोगों को भी शामिल कर लिया गया है जिन्हें अंग-भंग या सर्जरी के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मजबूर किया गया था। इस तरह तस्करी के शिकार लोगों को प्रामाणिक ट्रांसजेंडर पहचान वाले व्यक्तियों के साथ मिलाना एक मनमाना और कलंकित करने वाला वर्गीकरण पैदा करता है।
अंत में याचिकाओं में इस बात पर जोर दिया गया है कि इन संशोधनों ने ट्रांसजेंडर पहचान की बाहरी प्रस्तुति को ही एक अपराध का विषय बना दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रांसजेंडर पहचान अपनाना, उस रूप में कपड़े पहनना या ट्रांसजेंडर पर्सन की तरह व्यवहार करना भी अब एक आपराधिक कृत्य के रूप में देखा जा सकता है।
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