
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को लेकर एक अहम आदेश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने सोमवार, 15 जून को इस कानून को चुनौती देने वाली चार अलग-अलग उच्च न्यायालयों की कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
केंद्र सरकार ने इस मामले में सभी लंबित याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की गुहार लगाई थी ताकि एक ही कानून पर अलग-अलग अदालतों के विरोधाभासी फैसले न आएं। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की इस ट्रांसफर याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में चल रही सुनवाइयों पर स्टे लगा दिया है।
भारत सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही इस मामले की सुनवाई चल रही है। ऐसे में कई अन्य उच्च न्यायालयों में भी 2026 के इस संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जा रही है।
इस निवेदन को स्वीकार करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि यह बेहतर होगा कि सभी मामलों की सुनवाई या तो कोई एक हाईकोर्ट करे या फिर सुप्रीम कोर्ट खुद इस पर अंतिम फैसला दे। अदालत का मानना है कि इससे बिखरे हुए और अलग-अलग न्यायिक विचार सामने नहीं आएंगे।
अब इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी, जब अदालत अपनी आंशिक कार्य-अवधि के बाद नियमित कामकाज शुरू कर देगी।
इससे पहले 27 मई को भी केंद्र सरकार ने चिंता जताते हुए कहा था कि अलग-अलग अदालतों में सुनवाई होने से कानून की वैधता पर विरोधाभासी फैसले आ सकते हैं। श्री मेहता ने स्पष्ट किया था कि एक ही अधिनियम पर अलग-अलग विचारों से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट को इन मामलों को अपने पास बुला लेना चाहिए।
सोमवार की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के एक याचिकाकर्ता चंद्रेश जैन भी शीर्ष अदालत में पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि उनकी याचिका इस नए कानून को व्यापक तौर पर चुनौती देती है और यह साबित करती है कि ये संशोधन संवैधानिक रूप से क्यों गलत हैं। इस पर पीठ ने कहा कि यदि मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर किया जाता है, तो अदालत को इस मामले में श्री जैन की सहायता लेना अच्छा लगेगा।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि 2026 का यह नया संशोधन 2014 के ऐतिहासिक नाल्सा (NALSA) फैसले को कमजोर करता है। उस फैसले में अपनी पहचान खुद तय करने के अधिकार को एक मौलिक अधिकार माना गया था। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2026 के कानून की धारा 3 स्व-अनुभूत जेंडर पहचान के अधिकार को खत्म कर देती है और जेंडर का निर्धारण जीव विज्ञान या राज्य के सत्यापन पर छोड़ देती है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम है। सरकार का कहना है कि यह संशोधन अपनी मर्जी से कराए जाने वाले जेंडर-अफॉर्मिंग इलाज पर कोई पाबंदी नहीं लगाता है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल जबरन या दबाव में की जाने वाली प्रक्रियाओं को नियंत्रित करना है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने के बाद उन्हें तीन जजों की पीठ के समक्ष भेजा जाना चाहिए। उन्होंने ध्यान दिलाया कि मौजूदा चुनौती मुख्य रूप से 2014 के नाल्सा फैसले पर आधारित है, जिसे दो जजों की पीठ ने सुनाया था। उच्च न्यायालयों के लिए उस फैसले के विपरीत कोई दृष्टिकोण अपनाना मुश्किल हो सकता है।
पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम स्तर पर इस नए कानून के अमल पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत ने तब यह टिप्पणी की थी कि इसमें उठाए गए संवैधानिक सवालों की विस्तृत और गहन जांच की आवश्यकता है।
उस समय चीफ जस्टिस ने एक बड़ी चिंता भी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में ऐसे लोगों से खतरा हो सकता है, जो केवल सरकारी नौकरी में आरक्षण या अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए ट्रांसजेंडर होने का दिखावा कर सकते हैं।
चीफ जस्टिस ने सवाल उठाया था कि क्या ऐसा फर्जीवाड़ा उन लोगों को उनके हक से वंचित नहीं करेगा जो अपनी शारीरिक या जैविक परिस्थितियों के कारण वास्तव में इन सुविधाओं के असली हकदार हैं।
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