
नई दिल्ली: उत्तराखंड की व्यास घाटी में सोमवार को एक बड़ा विवाद तब खड़ा हो गया, जब स्थानीय रं समुदाय ने ओम पर्वत के ठीक सामने एक विशाल शिवलिंग और नंदी की स्थापना का पुरजोर विरोध किया। इस तीन टन वजनी ढांचे को स्थापित करने से साफ इनकार करते हुए ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे 'प्रकृति के उपासक' हैं। उनका मानना है कि उनकी पवित्र भूमि पर किसी भी तरह के कृत्रिम ढांचे के निर्माण या स्थापना की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।
पिथौरागढ़ जिले के धारचूला की सीमांत घाटियों में मुख्य रूप से निवास करने वाला रं एक मूल आदिवासी समुदाय है। यह विशेष जनजाति सदियों से अपनी अनूठी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं, विशेषकर प्रकृति पूजा के लिए जानी जाती है।
इस इलाके में शिवलिंग स्थापित करने का प्रस्ताव सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार का दावा करने वाले 'आदि कैलाश 20-20 ट्रस्ट' द्वारा रखा गया था। जब रं कल्याण संस्था को घाटी में इन धार्मिक मूर्तियों के 'अनधिकृत' प्रवेश की जानकारी मिली, तो उन्होंने तत्काल इस पर कड़ी आपत्ति जताई। हालात को देखते हुए अंततः स्थानीय प्रशासन को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा।
यह पूरा मसला उस वक्त और अधिक गरमा गया, जब ट्रस्ट के लोग बिना किसी पूर्व अनुमति के इस भारी-भरकम ढांचे को लेकर आगे बढ़ गए। स्थानीय आदिवासी समुदाय और पंचायत से बिना कोई विचार-विमर्श किए, वे इस तीन टन के शिवलिंग और नंदी को धारचूला से 27 किलोमीटर दूर गर्बाधार तक लेकर पहुंच गए थे।
व्यास, दारमा और चौदांस—इन तीनों घाटियों के रं लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली धारचूला स्थित रं कल्याण संस्था के अध्यक्ष प्रकाश गुंज्याल ने इस घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके समुदाय में भगवान शिव की पूजा केवल उनके प्राकृतिक स्वरूप में ही की जाती है और यह स्थापना उनकी गहरी मान्यताओं का सीधा उल्लंघन है।
प्रकाश गुंज्याल ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि प्राकृतिक स्वरूप की पूजा के सिद्धांत को तोड़े जाने के अलावा, 15 जून की अमावस्या के दिन किसी भी कृत्रिम ढांचे की स्थापना की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती।
विवाद बढ़ता देख धारचूला के उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) आशीष जोशी ने मामले में प्रशासनिक पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि जैसे ही प्रशासन को यह पता चला कि संबंधित ग्राम सभा और रं समुदाय से कोई अनुमति नहीं ली गई है, तो मूर्तियों को ले जा रहे वाहन को वापस धारचूला बुला लिया गया।
अधिकारी के मुताबिक, यह पूरा मुद्दा सीधे तौर पर स्थानीय समुदाय और ट्रस्ट के बीच का है। प्रशासन तब तक ट्रस्ट को इस तरह के किसी भी कार्य की अनुमति नहीं दे सकता, जब तक कि ग्राम सभा और आदिवासी संघ खुद इसके लिए अपनी लिखित सहमति न दे दें।
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