
नई दिल्ली: केरल हाईकोर्ट ने सोमवार, 22 जून को एक अहम फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की 'प्रियदर्शिनी मुफ्त यात्रा योजना' को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। जून महीने में शुरू की गई इस योजना के तहत केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की साधारण बसों में महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जा रही है।
मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की तरफ से ऐसा कोई भी ठोस आधार या सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि मुफ्त यात्रा योजना से जुड़ा सरकारी आदेश किसी भी तरह से गैर-कानूनी है।
खुद को KSRTC बसों का नियमित यात्री बताने वाले याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में इस योजना को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (1) (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) का सीधा उल्लंघन बताया था। उनका तर्क था कि बिना किसी जमीनी अध्ययन या मंत्री-स्तरीय समिति के गठन के ही इस फैसले को जल्दबाजी में लागू कर दिया गया।
याचिका में इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई थी कि महिलाओं की आय का दायरा तय किए बिना ही सभी को यह सुविधा दी जा रही है। याचिकाकर्ता के दावे के मुताबिक, इस पूरी योजना के कारण सरकारी खजाने पर हर साल लगभग 800 करोड़ रुपये का भारी बोझ पड़ेगा।
वहीं, राज्य सरकार ने अदालत में इन सभी दलीलों का मजबूती से बचाव किया। सरकार ने तर्क दिया कि तमिलनाडु और कर्नाटक समेत देश के आठ अन्य राज्यों में पहले से ही ऐसी योजनाएं सफलतापूर्वक चल रही हैं। इसे एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के स्पष्ट उद्देश्य के साथ लागू किया गया है।
सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि इस ऐतिहासिक पहल से विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की आवाजाही आसान होगी और वे अधिक आत्मनिर्भर बन सकेंगी। अपने पक्ष को मजबूत करते हुए राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि उसे महिलाओं को प्राथमिकता और विशेष लाभ देने वाली योजनाएं लागू करने का पूरा अधिकार प्राप्त है।
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