
नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा था कि देश के गृहमंत्री या राष्ट्रपति के पोस्ट पर खुलेआम गालियां या अपमानजनक बातें लिखी जा सकती हैं, और उसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'सत्य' बताकर प्रमोट करेगा? X (पूर्व में ट्विटर) पर आजकल ठीक ऐसा ही हो रहा है।
जिसे आप 'फैक्ट-चेक' समझ रहे हैं, वह दरअसल एक खतरनाक और संगठित खेल बन चुका है। पिछले कुछ महीनों से, खासकर जब से UGC 2026 का नियम चर्चा में आया है, X पर 'कम्युनिटी नोट्स' (Community Notes) के जरिए एक खास एजेंडा चलाया जा रहा है। हमारी पड़ताल और आपके द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट्स से यह साफ होता है कि यह कोई निष्पक्ष फीचर नहीं, बल्कि एक संगठित समूह द्वारा दलित, पिछड़े और आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ नैरेटिव सेट करने का हथियार बन गया है।
इससे पहले कि हम इस खेल को समझें, कम्युनिटी नोट्स का इतिहास जानना जरूरी है। अगस्त 2020 में, ट्विटर ने पहली बार कम्युनिटी-बेस्ड फैक्ट-चेकिंग प्रणाली पर काम शुरू किया. उसके बाद जनवरी 2021 में इसे "Birdwatch" (बर्डवॉच) के नाम से अमेरिका में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लॉन्च किया गया। फिर, अक्टूबर 2022 में यह फीचर सभी अमेरिकी यूजर्स के लिए खोल दिया गया। फिर कुछ ही महीने बाद, नवंबर 2022 में ट्विटर के नए मालिक एलन मस्क ने इसे रीब्रांड करके "Community Notes" नाम दिया और इसे वैश्विक स्तर पर लागू कर दिया।
प्लेटफॉर्म का मकसद यूजर्स को फेक न्यूज से बचाना था, लेकिन आज यह फीचर खुद फेक और भ्रामक नैरेटिव का शिकार हो गया है।
दुनिया का कोई भी टूल फुलप्रूफ नहीं होता, और X का कम्युनिटी नोट्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कम्युनिटी नोट का मतलब 'परम सत्य' बिल्कुल नहीं है। इसके पीछे का एल्गोरिदम और इसका दुरुपयोग कैसे हो रहा है, आइए इसे समझते हैं.
कम्युनिटी नोट्स सच्चाई नहीं, बस संख्या का खेल है. कोई भी कम्युनिटी नोट तुरंत पब्लिक को नहीं दिखता। इसे दिखने के लिए एल्गोरिदम को अधिक से अधिक रेटिंग्स (लगभग 500 से 600) की जरूरत होती है।
संगठित रूप से इसका दुरुपयोग करने पर एक्स कम्युनिटी नोट्स में लिखी गईं गालियां भी 'फैक्ट' बन जाती हैं. यदि कोई संगठित ग्रुप किसी पोस्ट के नीचे अपमानजनक या झूठी बातें लिखता है और उस ग्रुप के सैकड़ों सदस्य तुरंत उसे 'मददगार' (Helpful) के रूप में रेट कर देते हैं, तो एल्गोरिदम उसे 'सत्य' मानकर पोस्ट के नीचे चिपका देता है।
हाल के मामले में एलिजिबिलिटी का फायदा उठाया गया. कम्युनिटी नोट्स लिखने का अधिकार उन्हें मिलता है जिनके द्वारा रेट किए गए कम से कम 5 नोट्स पब्लिक हो चुके हों। ये संगठित समूह एक-दूसरे की मदद से आसानी से यह अधिकार प्राप्त कर लेते हैं।
एक्स प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कई स्क्रीनशॉट्स इस संगठित हमले की पोल खोलते हैं। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रपति और भाजपा नेताओं (जैसे निशिकांत दुबे) से लेकर सामाजिक न्याय की बात करने वाले डॉ. लक्ष्मण यादव और चंद्रशेखर आजाद तक—सबके पोस्ट्स पर भ्रामक नोट्स लगाए गए हैं।
गृहमंत्री अमित शाह के वीडियो पर उन्हें अपमानित करते हुए उनके पिता का नाम घसीटा गया। डॉ. लक्ष्मण यादव के पोस्ट पर उन्हें 'लठैत' कहा गया, और चंद्रशेखर आजाद के पोस्ट पर 'घड़ियाली आंसू' और 'वेश्याओं के प्रेम पत्र' जैसे शर्मनाक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।
यह सब अचानक नहीं हो रहा है। इन एकाउंट्स पर ये नोट्स इसलिए लगाए जा रहे हैं ताकि केंद्र सरकार UGC के मुद्दे पर अपना स्टैंड बदल ले। जो भी अकाउंट UGC को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट सपोर्ट कर रहा है, वह इस संगठित ट्रेलिंग का शिकार हो रहा है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस पूरी साजिश को सही ठहराने के लिए एक नया नैरेटिव गढ़ा गया है। स्क्रीनशॉट्स में स्पष्ट देखा जा सकता है कि कई वेरिफाइड यूजर्स (जैसे Ankit Kumar Avasthi और Sawarn Voice) कम्युनिटी नोट्स को "लोकतंत्र का पांचवां खंभा" बताकर सेलिब्रेट कर रहे हैं।
यह एक सोची-समझी रणनीति है ताकि आम जनता को लगे कि यह निष्पक्ष फैक्ट-चेकिंग है जो सीधे X प्लेटफॉर्म कर रहा है, जबकि असलियत में इसके पीछे एक विशेष विचारधारा वाला संगठित नेटवर्क काम कर रहा है।
अगर आप सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तो अब तकनीकी समझ भी आपके लिए हथियार है। यदि आपके या किसी सही पोस्ट पर ऐसा भ्रामक या अपमानजनक नोट लगाया जाता है, तो बचाव का सिर्फ एक ही रास्ता है.
अगर आपके एक्स पोस्ट पर कम्युनिटी नोट्स लिखे गए हैं तो उसे तुरंत रिपोर्ट करें. उस कम्युनिटी नोट को 'भ्रामक' (Misleading) या 'अपमानजनक' (Abusive) के रूप में रिपोर्ट करें।
इसके अलावा सामूहिक रेटिंग भी कर सकते हैं. आपको और आपके नेटवर्क को मिलकर उस नोट के खिलाफ (Not Helpful) रेटिंग करनी होगी। ऐसे एल्गोरिदम को हराएं. जब 'खिलाफ' में रेटिंग्स की संख्या बढ़ेगी, तो एल्गोरिदम उस कम्युनिटी नोट को स्वतः ही हटा देगा।
उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ जो लड़ाई कभी सड़कों पर होती थी, वह अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम में लड़ी जा रही है। इसके लिए जागरूक और एकजुट होना ही एकमात्र विकल्प है।
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