नई दिल्ली/पटना: केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने बिहार के गया स्थित ऐतिहासिक महाबोधि महाविहार के प्रबंधन को लेकर एक बड़ा और आक्रामक बयान दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक वीडियो संदेश जारी करते हुए उन्होंने महाबोधि मंदिर के ट्रस्ट में शत-प्रतिशत बौद्ध सदस्यों की मांग उठाई है। उन्होंने साफ लहजे में सवाल किया— "तुम्हारे ट्रस्ट में अगर हम नहीं, तो हमारे ट्रस्ट में तुम क्यों?"
पुरानी सरकारों पर तीखा हमला, वर्तमान सरकार से सीधा सवाल
जागतिक बौद्ध धम्म परिषद में अपनी बात को प्रखरता से रखने वाले रामदास अठावले ने कहा कि 1949 के पुराने और भेदभावपूर्ण कानून को बदलने का समय अब आ गया है। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आज़ादी के बाद दशकों तक देश और बिहार में राज करने वाली कांग्रेस ने इस कानून को बदलने की कभी हिम्मत नहीं दिखाई।
सामाजिक न्याय की पैरोकार मानी जाने वाली आरजेडी पर भी उन्होंने सीधा निशाना साधा। अठावले ने कहा कि बिहार में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सरकारें लंबे समय तक रहीं, लेकिन महाबोधि जैसे पवित्र स्थान के प्रबंधन में बौद्धों को उनका पूर्ण अधिकार देने का साहस किसी ने नहीं दिखाया। उन्होंने वर्तमान नीतीश कुमार और भाजपा नीत एनडीए सरकार से स्पष्ट मांग की है कि वह विधानसभा में नया कानून पारित कर महाबोधि ट्रस्ट बौद्धों के हवाले करे।
'यह संपत्ति की नहीं, स्वाभिमान की लड़ाई है'
अठावले ने स्पष्ट किया कि यह कोई ज़मीन या संपत्ति का विवाद नहीं है, बल्कि दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के धार्मिक सम्मान और स्वाभिमान का मुद्दा है। उन्होंने इस मामले की तुलना अयोध्या विवाद से करते हुए कहा, "जिस तरह माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर विवाद का निपटारा कर हिंदू समाज की भावना के अनुरूप राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त किया, ठीक उसी न्याय की उम्मीद हमें महाबोधि महाविहार के लिए भी है।"
भेदभाव पर उठाए सवाल और आंदोलन की चेतावनी
केंद्रीय मंत्री ने यह तर्क भी रखा कि जब देश में अन्य सभी धर्मों के ट्रस्टों और धार्मिक स्थलों का प्रबंधन उनके अपने समुदाय द्वारा किया जाता है, तो फिर बौद्धों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है? उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जब तक बिहार सरकार और न्यायालय इस मामले में अंतिम फैसला लेकर बौद्ध समुदाय को उनका जायज़ हक नहीं दे देते, तब तक उनका यह आंदोलन और संघर्ष यूं ही जारी रहेगा।
इस बयान के बाद बिहार की राजनीति और धार्मिक गलियारों में महाबोधि मंदिर के प्रबंधन का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। अब देखना यह है कि राज्य सरकार इस तीखे सवाल और मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
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