नई दिल्ली: वर्ष 2026 को भारत के आर्थिक विस्तार और वैश्विक प्रभाव के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष माना जा रहा है। ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता और यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के बीच, भारत की अर्थव्यवस्था नई ऊँचाइयों को छूने का दावा कर रही है। लेकिन, हाल ही में वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 के गहन विश्लेषण से एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि बुनियादी ढांचे (Infrastructure) पर केंद्रित इस बजट में दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई है।
आवंटन में हजारों करोड़ की कमी
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कुल केंद्रीय बजट 58,31,099 करोड़ रुपये का है। बजट विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें दलितों के लिए 1,96,400 करोड़ रुपये और आदिवासियों के लिए 1,41,088.6 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। हालांकि, जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से देखें तो दलितों के लिए आवंटित राशि में 43,207 करोड़ रुपये की भारी कमी रह गई है।
चिंताजनक बात यह है कि अनुसूचित जातियों (SC) के लिए आवंटित राशि में से केवल 75,077 करोड़ रुपये और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए 62,093 करोड़ रुपये ही सीधे लक्षित आबादी तक पहुँचने का अनुमान है।
शिक्षा बजट: उम्मीद और निराशा का मिश्रण
शिक्षा क्षेत्र में सरकार ने मिश्रित संकेत दिए हैं। अनुसूचित जातियों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति का बजट पिछले साल के 5,900 करोड़ रुपये से बढ़कर 6,360 करोड़ रुपये कर दिया गया है। वहीं, आदिवासियों के लिए यह राशि 2,462.68 करोड़ रुपये से बढ़कर 3,176.48 करोड़ रुपये हो गई है।
हालांकि, राष्ट्रीय विदेश छात्रवृत्ति (National Overseas Scholarship) में विरोधाभास देखने को मिला है। एसटी वर्ग के लिए आवंटन 0.01 लाख रुपये से बढ़कर 20 करोड़ रुपये हो गया है, लेकिन एससी वर्ग के लिए यह 130 करोड़ रुपये से घटकर 125 करोड़ रुपये रह गया है। इसके अलावा, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के नए विनियमों और उनके कार्यान्वयन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
मनरेगा की जगह नई योजना, राज्यों के अधिकार सीमित होने का डर
इस बजट में एक बड़ा नीतिगत बदलाव करते हुए मनरेगा (MGNREGA) की जगह 'VB-RAM-G' योजना की शुरुआत की गई है। आलोचकों का मानना है कि इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा और स्थानीय शासन कमजोर होगा। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या नई योजना में उन खामियों को दूर किया जा सकेगा, जिनके तहत गरीबों को मजदूरी भुगतान में देरी और भेदभाव का सामना करना पड़ता था।
मैनुअल स्कैवेंजिंग और स्वच्छता कर्मी
बजट में मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़ी पुरानी योजनाओं को हटाकर केवल 'नमस्ते' (NAMASTE) योजना को रखा गया है। आरोप है कि यह योजना मशीनीकरण पर केंद्रित है, न कि इस कार्य में लगे लोगों के पुनर्वास पर। मांग की गई है कि महिला स्वच्छता कर्मियों के लिए आयुष्मान भारत के अलावा एक समर्पित चिकित्सा बीमा घटक शुरू किया जाए।
बढ़ते अपराध और नाकाफी बजट
नवीनतम एनसीआरबी (NCRB) रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के लगभग 57,000 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बावजूद, नागरिक अधिकार संरक्षण (PCR) और अत्याचार निवारण (PoA) अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए केवल 550 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।
प्रमुख सिफारिशें और मांगें
NCDHR और Dalit Adivasi Budget Analysis 2026-27 द्वारा जारी प्रेस रिलीज के अनुसार, सरकार से कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई हैं, जिनमें शामिल हैं:
केंद्रीय कानून: एससीएसपी (SCP) और टीएसपी (TSP) बजट के लिए एक केंद्रीय कानून बनाया जाए ताकि धन का उपयोग सही जगह हो सके।
मुआवजा राशि में वृद्धि: अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत न्यूनतम मुआवजा राशि को बढ़ाकर 5 लाख रुपये और हत्या/बलात्कार के मामलों में 25 लाख रुपये किया जाए।
भूमि सुधार: दलित और आदिवासी परिवारों को कम से कम 5 एकड़ भूमि देने के लिए विशेष भूमि खरीद योजना शुरू की जाए।
रोजगार सुरक्षा: एससी/एसटी युवाओं के लिए 500 करोड़ रुपये के कोष के साथ 'रोजगार सुरक्षा कोष' की स्थापना हो।
बजट 2026-27 जहां भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है, वहीं देश के सबसे वंचित वर्गों की उपेक्षा के आरोप इस 'विकसित भारत' के दृष्टिकोण पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
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