जाति जनगणना 2027: सिर्फ ‘जुबानी दावे’ पर नहीं बनेगी बात? सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आंकड़ों की जांच के लिए हो ठोस व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने 2027 की जनगणना में जाति सत्यापन की मांग को माना 'प्रासंगिक', केंद्र से कहा- ठोस तंत्र बनाएं ताकि आरक्षण और योजनाओं का सही लाभ मिले
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Census 2027: क्या जाति बताने के लिए देना होगा सबूत? सुप्रीम कोर्ट ने 'स्व-घोषणा' पर जताई चिंता और केंद्र को दिया यह निर्देश।(Ai Image)
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आगामी जनगणना 2027 को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को "प्रासंगिक" माना कि जाति आधारित जनगणना केवल लोगों द्वारा दी गई 'स्व-घोषणा' (Self-declaration) यानी सिर्फ उनके कहने भर पर आधारित नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने अधिकारियों से इस चिंता पर गौर करने को कहा है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमलिया बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वे जनहित याचिका (PIL) दायर करने वाले दिल्ली निवासी आकाश गोयल के तर्क से सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं। याचिका में कहा गया था कि जाति की पुष्टि के लिए केवल खुद का दावा काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए कोई सत्यापित आधार या दस्तावेज होना चाहिए।

सीजेआई (CJI) ने टिप्पणी करते हुए कहा, "सिद्धांत रूप में, हम आपकी बात से सहमत हैं। किसी भी चीज़ को ऐसे प्रमाण पत्र के आधार पर शामिल या बाहर नहीं किया जाना चाहिए जिसकी वास्तविकता या तो संदिग्ध हो या जिसकी पुष्टि न की गई हो।"

'कल्याणकारी योजनाओं का आधार बनेगा यह डेटा'

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता ने अदालत में स्पष्ट किया कि वे जाति जनगणना के विरोध में नहीं हैं। उन्होंने कहा, "हमारा अनुरोध केवल इतना है कि यह प्रक्रिया सत्यापित सामग्री पर आधारित होनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि आने वाले कई वर्षों तक यही डेटा सभी कल्याणकारी नीतियों और आरक्षण का आधार बनेगा। इसलिए, इसे महज स्व-घोषणा तक सीमित नहीं रखा जा सकता।"

गुप्ता ने चिंता जताते हुए कहा कि आज की स्थिति में यह प्रक्रिया पूरी तरह से लोगों के खुद के दावे पर निर्भर है। बिना जांच के स्व-घोषणा बेहद खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि कोई भी कुछ भी दावा कर सकता है, जिससे जनगणना की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।

जनगणना विशेषज्ञों का काम, पर सुझाव अहम

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि प्रक्रिया तय करने का काम जनगणना अधिकारियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, लेकिन याचिकाकर्ता की चिंताओं को एक अभ्यावेदन (Representation) के रूप में उनके सामने रखा जा सकता है।

कोर्ट ने कहा, "यह काम विशेषज्ञ संस्था का है। जनगणना एक बेहद विशिष्ट प्रक्रिया है जिसे विशाल अनुभव वाले प्रशिक्षित लोग अंजाम देते हैं। उन्हें बखूबी पता है कि जनगणना के लिए क्या मानदंड तय करने हैं। गणना कैसे हो, यह फैसला उन्हीं पर छोड़ना चाहिए। हालांकि, आपके मुख्य सुझावों पर विचार किया जा सकता है।"

वकील मुक्ता गुप्ता, जिनके साथ वकील विभोर गर्ग और नित्या गुप्ता भी मौजूद थे, ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता ने पहले ही अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठाया था।

'आपने सराहनीय काम किया है'

याचिकाकर्ता की तारीफ करते हुए सीजेआई ने कहा, "आपने एक सराहनीय काम किया है। आपने इस मुद्दे को अधिकारियों के संज्ञान में लाया और उन्हें संवेदनशील भी बनाया है। इसके बावजूद अगर वे कुछ गलत करते हैं, तो कानून अपना काम करेगा।"

इस पर वरिष्ठ वकील ने आशंका जताई कि अगर गलत डेटा दर्ज हो गया, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह से अपरिवर्तनीय (Irreversible) हो जाएगी। उन्होंने दलील दी, "इस जनगणना में 13,500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत आएगी। इसके अलावा, इसका असर सभी कल्याणकारी नीतियों पर पड़ेगा। हम यह नहीं कह रहे कि हर प्रमाण पत्र की जांच हो, लेकिन कम से कम ऐसा कोई आधार होना चाहिए जिससे यह पुष्टि हो सके कि व्यक्ति अमुक जाति का ही है। बाद के चरण में यह जांचना संभव नहीं होगा कि प्रमाण पत्र असली है या नहीं।"

कोर्ट का निर्देश: सुझावों पर विचार करें अधिकारी

याचिका का निपटारा करते हुए पीठ ने कहा कि जनगणना का कार्य जनगणना अधिनियम, 1948 और उसके तहत बनाए गए 1990 के नियमों द्वारा शासित होता है, जो अधिकारियों को जनगणना के तौर-तरीके तय करने का अधिकार देते हैं।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "हमें इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि प्रतिवादी अधिकारियों ने क्षेत्र के विशेषज्ञों की मदद से गलतियों को रोकने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया होगा। फिर भी, हमें लगता है कि याचिकाकर्ता ने 9 जुलाई, 2025 को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त को भेजे गए कानूनी नोटिस में कुछ प्रासंगिक मुद्दे उठाए हैं।"

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सुझावों और मुद्दों पर विचार करें। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वे इस रिट याचिका की एक प्रति अधिकारियों को पूरक अभ्यावेदन के रूप में भेज सकते हैं, ताकि अधिकारी उसे भी संज्ञान में ले सकें।

क्या थी याचिका में मुख्य शिकायत?

वकील अनुज पी. अग्रवाल और पीबीए लीगल (PBA Legal) के आयुष अग्रवाल के माध्यम से दायर इस याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार ने जनगणना 2027 को दो चरणों में कराने की घोषणा तो कर दी है और तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं, लेकिन अभी तक कोई दिशा-निर्देश या प्रश्नावली सार्वजनिक नहीं की गई है। इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि जाति के डेटा को कैसे रिकॉर्ड, वर्गीकृत या सत्यापित किया जाएगा।

याचिका में तर्क दिया गया कि पहली बार आधिकारिक जनगणना में एससी/एसटी (SC/ST) के अलावा ओबीसी (OBC) को भी शामिल किया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद सरकार ने जाति की पहचान दर्ज करने के लिए कोई मानक तरीका नहीं बताया है। बिना किसी ढांचे या जांच तंत्र के, जाति की गणना केवल 'असत्यापित स्व-घोषणा' बनकर रह जाएगी, जिससे डेटा के गलत होने का जोखिम बना रहेगा।

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