पत्थरों की धूल में घुटती सांसें: AIIMS भोपाल ने जटिल इलाज से सिलिकोसिस पीड़ित मजदूर को दी नई जिंदगी, जानिए क्या है यह बीमारी?

बुंदेलखंड में पत्थर खदानों में काम करने वाले दलित-आदिवासी मजदूरों को मिल सकेगा इलाज।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल.
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल.इंटरनेट
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भोपाल। पत्थर, सीमेंट और ऊंची इमारतों की मजबूत दुनिया के पीछे अनगिनत ऐसी जिंदगियां काम कर रही हैं, जो हर दिन मौत को करीब से छूती हैं। इन्हीं जिंदगियों को चुपचाप निगलने वाली एक खामोश और जानलेवा बीमारी है, सिलिकोसिस। यह बीमारी धीरे-धीरे इंसान की सांस छीन लेती है। फेफड़े पत्थर की तरह सख्त होते जाते हैं और मरीज को सांस लेना भी पहाड़ चढ़ने जैसा लगने लगता है। सबसे भयावह बात यह है कि इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है और जब तक बीमारी सामने आती है, तब तक हालात अक्सर बेकाबू हो चुके होते हैं।

ऐसा ही एक गंभीर मामला हाल ही में एम्स भोपाल में सामने आया, जहां स्टोन क्रशर में काम करने वाला एक मजदूर बेहद नाजुक हालत में भर्ती हुआ। उसकी सांसें उखड़ रही थीं, शरीर में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका था और जांच में सामने आया कि दोनों फेफड़ों में राख जैसी मोटी परत जम चुकी है। डॉक्टरों के अनुसार, समय रहते इलाज न मिलता तो उसकी जान भी जा सकती थी। ऐसे हालात में एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने एक दुर्लभ और जटिल चिकित्सा प्रक्रिया अपनाकर मरीज को नई सांस दी।

मध्य भारत में पहली बार जटिल प्रक्रिया

एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने इस मरीज के इलाज के लिए ‘होल लंग्स लैवेज’ नाम की अत्यंत जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस तकनीक में फेफड़ों के भीतर जमा प्रोटीन और धूल को सलाइन वाटर के जरिए धोकर बाहर निकाला जाता है। एम्स प्रबंधन के अनुसार, मध्य भारत में यह पहला अवसर है जब सिलिकोसिस से प्रभावित फेफड़ों में जमे प्रोटीन को इस तकनीक से सफलतापूर्वक साफ किया गया।

डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल एक मरीज का इलाज नहीं है, बल्कि उन हजारों मजदूरों के लिए उम्मीद की किरण है, जो रोजाना खदानों, स्टोन क्रशर और फैक्ट्रियों में धूल के बीच काम करते हुए अपनी सांसें दांव पर लगा देते हैं।

स्टोन क्रशर की धूल ने बिगाड़ दी मजदूर की हालत

एम्स के पल्मोनोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, मरीज लंबे समय से स्टोन क्रशर में काम कर रहा था। वहां उड़ने वाली बेहद बारीक सिलिका धूल सांस के साथ उसके फेफड़ों में पहुंचती रही और सालों तक वहां जमती चली गई। इसी धूल ने धीरे-धीरे उसके फेफड़ों को अंदर से खोखला कर दिया।

इस स्थिति को मेडिकल भाषा में डिफ्यूज एल्वियोलर प्रोटीनोसिस कहा जाता है। इसमें फेफड़ों की हवा से भरी थैलियों में प्रोटीन भर जाता है, जिससे ऑक्सीजन का आदान-प्रदान रुकने लगता है। यही वजह थी कि मरीज को सांस लेने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी और उसका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिरता जा रहा था।

6 घंटे चला मौत से जंग का इलाज

डॉक्टरों के अनुसार, होल लंग्स लैवेज एक बेहद जोखिमभरी प्रक्रिया है। इसमें फेफड़ों के भीतर 6 से 8 लीटर तक सलाइन वाटर डाला जाता है और फिर उसे धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है, ताकि जमा प्रोटीन और धूल साफ हो सके। यह प्रक्रिया इसलिए भी खतरनाक होती है क्योंकि इतनी अधिक मात्रा में पानी फेफड़ों में जाने से मरीज की जान को सीधा खतरा हो सकता है।

इसी कारण पूरी प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी के साथ लगभग 6 घंटे में पूरा किया गया। इस दौरान डॉक्टरों और एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की एक पूरी टीम लगातार मरीज के ऑक्सीजन स्तर, हृदय गति और ब्लड प्रेशर पर नजर बनाए हुए थी। जरा-सी चूक मरीज के लिए घातक साबित हो सकती थी।

कार्डियक ओटी में किया गया ऑपरेशन

इस जटिल प्रक्रिया को कार्डियक ऑपरेशन थिएटर में किया गया। डॉक्टरों के अनुसार, इस इलाज की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि जब एक फेफड़े को धोकर साफ किया जा रहा होता है, तब मरीज को दूसरे फेफड़े के सहारे ही सांस लेनी पड़ती है।

इस मरीज के मामले में स्थिति और भी गंभीर थी, क्योंकि दूसरा फेफड़ा भी पहले से कमजोर हो चुका था। ऐसे हालात में कई बार मरीज को हार्ट-लंग मशीन यानी आर्टिफिशियल लंग्स पर रखना पड़ता है। हालांकि, डॉक्टरों की सटीक योजना और सतर्क निगरानी के चलते इस मरीज को मशीन पर डालने की जरूरत नहीं पड़ी और प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी कर ली गई।

क्या है सिलिकोसिस और क्यों बन जाती है जानलेवा

सिलिकोसिस सिलिका नामक बेहद बारीक धूल के कणों से होने वाली बीमारी है। ये कण सांस के साथ फेफड़ों में पहुंचकर वहां जमा हो जाते हैं और फेफड़ों की कोमल झिल्लियों को लगातार नुकसान पहुंचाते रहते हैं। धीरे-धीरे फेफड़े स्पंज जैसे नरम रहने के बजाय पत्थर की तरह सख्त हो जाते हैं।

जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज को सांस फूलना, लगातार खांसी, सीने में जकड़न, थकान और ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। अंतिम चरण में शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और मरीज की मौत तक हो सकती है।

सबसे ज्यादा मजदूर चपेट में, बचाव ही असली इलाज

सिलिकोसिस का सबसे बड़ा शिकार वे मजदूर होते हैं, जो खदानों, स्टोन क्रशर, पत्थर की पाउडर मिलों, सीमेंट फैक्ट्रियों और कांच-सिरेमिक उद्योगों में काम करते हैं। इनमें से अधिकतर मजदूर गरीब तबके से आते हैं और सुरक्षा उपकरणों की कमी या जानकारी के अभाव में इस जानलेवा धूल के सीधे संपर्क में रहते हैं।

डॉक्टरों का साफ कहना है कि सिलिकोसिस से बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है। कार्यस्थलों पर धूल नियंत्रण की व्यवस्था, मास्क और सुरक्षात्मक उपकरणों का अनिवार्य उपयोग और मजदूरों की नियमित स्वास्थ्य जांच ही इस बीमारी से जान बचा सकती है। एम्स भोपाल में हुआ यह सफल इलाज जहां चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि है, वहीं यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर कब तक मजदूर अपनी सांसें दांव पर लगाकर विकास की इमारतें खड़ी करते

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