
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद के सरदार पटेल संस्थान में यूजीसी एक्ट 2026 के समर्थन में एक विशाल समता सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस आयोजन में देश भर से आए दलित, बहुजन, आदिवासी और ओबीसी समाज के विचारकों ने शैक्षणिक संस्थानों और न्यायपालिका में हो रहे जातिवादी शोषण के खिलाफ एकजुटता दिखाई। वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि उच्च शिक्षा और व्यवस्था में बहुजनों की हिस्सेदारी को रोकने के लिए साजिशन नीतियां बनाई जा रही हैं।
सम्मेलन के सबसे प्रखर स्वरों में से एक इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विक्रम हरिजन रहे। उन्होंने मंच से बेबाकी से कहा कि बहुजन समाज को ब्राह्मणवाद से ज्यादा ब्राह्मणों से खतरा है। प्रोफेसर हरिजन ने वामपंथी दलों से लेकर कांग्रेस और आर्य समाज के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन सभी जगहों पर सवर्णों का ही वर्चस्व रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रोग्रेसिव सवर्ण अक्सर बहुजन हित के खिलाफ खड़े नजर आते हैं, इसलिए अब बहुजनों को सीधे तौर पर एक वैचारिक आंदोलन खड़ा करना होगा।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रों के हक की लड़ाई में प्रोफेसर हरिजन अकेले दीवार बनकर खड़े रहे हैं। सम्मेलन में इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया कि जब सब खामोश थे, तब केवल विक्रम हरिजन ने निडर होकर छात्रों का पक्ष लिया। अपने संबोधन में उन्होंने दो टूक कहा कि उन्होंने नौकरी किसी विश्वविद्यालय की खैरात में नहीं, बल्कि अपने महापुरुषों के संघर्षों की बदौलत पाई है। उन्होंने गरजते हुए ऐलान किया कि वे तानाशाही के आगे झुकेंगे नहीं और अगर उन्हें निलंबित किया गया तो वे न्यायालय में आखिरी सांस तक यह लड़ाई लड़ेंगे।
सम्मेलन की शुरुआत करते हुए दशरथ मांझी शिक्षण संस्थान के सचिव पिंटू मांझी ने शैक्षणिक संस्थानों में दलित-बहुजनों को 'नॉट फाउंड सूटेबल' (NFS) घोषित किए जाने को एक गहरी साजिश करार दिया। वहीं, पूर्व न्यायाधीश संजीव कुमार ने न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व का पर्दाफाश किया। उन्होंने कहा कि जब तक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक वंचितों को सच्चा न्याय मिलना असंभव है।
जेएनयू के प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी 2026 एक्ट पर लगाए गए स्टे को पूरी सामाजिक व्यवस्था की विफलता बताया। उन्होंने मीडिया और न्यायपालिका के गठजोड़ पर निशाना साधते हुए कहा कि मुट्ठी भर सवर्णों के दबाव में अदालतें बहुजनों के खिलाफ फैसले दे रही हैं। प्रो. मीणा ने दलित और आदिवासी समाज के बीच वैचारिक और जमीनी एकता की तत्काल आवश्यकता पर भी जोर दिया ताकि अस्तित्व की इस लड़ाई को जीता जा सके।
वरिष्ठ पत्रकार शम्भू कुमार सिंह ने सोशल मीडिया को बहुजनों का सबसे बड़ा हथियार बताया। उन्होंने कहा कि आज का जातिवाद बदल चुका है और यह सबसे ज्यादा व्हाइट कॉलर जॉब जैसे डॉक्टर, इंजीनियर और पत्रकारिता के पेशे में हावी है। उन्होंने बहुजन समाज से आह्वान किया कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मोबाइल और इंटरनेट के जरिए अपनी आवाज को जन-जन तक पहुंचाएं।
सम्मेलन में वैचारिक बहस भी देखने को मिली। वामपंथी कार्यकर्ता मोहम्मद सलीम ने प्रोफेसर हरिजन की कुछ बातों से असहमति जताते हुए देश में बढ़ रहे सांप्रदायिक फासीवाद और कॉर्पोरेट गठजोड़ को असल दुश्मन बताया। इसके बाद राजद प्रवक्ता कंचना यादव ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की हो रही चोरी का मुद्दा उठाया। उन्होंने साफ किया कि जब तक जातीय जनगणना नहीं होगी, तब तक संस्थानों में जारी यह भेदभाव खत्म नहीं होगा।
राजद प्रवक्ता प्रियंका भारती ने शैक्षणिक संस्थानों में हो रही छात्रों की आत्महत्याओं को 'संस्थानिक हत्या' करार देते हुए देश में 'रोहित एक्ट' लागू करने की जोरदार मांग रखी। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई समानता बनाम असमानता और मुक्ति बनाम शोषण की है। सम्मेलन के अध्यक्षीय संबोधन में के.सी. सरोज ने जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक झूठ को बेनकाब किया। इस पूरे आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बहुजन समाज अब अपने संवैधानिक अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है।
नोट: उक्त कार्यक्रम का आयोजन 14 मार्च 2026 को हुआ था.
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