
नई दिल्ली/रांची: भारतीय राजनीति में एक बार फिर स्वास्थ्य कारणों और निजी फैसलों को राजनीतिक हथियार बनाने का एक विवादित मामला सामने आया है। गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के इलाज को लेकर एक सोशल मीडिया पोस्ट किया। इस पोस्ट ने एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दे दिया है। आलोचकों और विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा सांसद ने गांधी परिवार पर निशाना साधने की आड़ में दरअसल संविधान द्वारा प्रदत्त 'आरक्षण' व्यवस्था और हाशिए के समुदायों का भद्दा मजाक उड़ाया है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने दुबे के इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे सामाजिक न्याय की अवधारणा का अपमान बताया है।
26 मार्च की सुबह 11:03 बजे, गोड्डा से भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर सोनिया गांधी के सर गंगाराम अस्पताल (एक निजी अस्पताल) में चल रहे इलाज पर सवाल उठाए।
भाजपा सांसद, डॉ. निशिकांत दुबे ने लिखा-
"राहुल गांधी जी सोनिया गांधी जी का ईलाज जिस अस्पताल गंगाराम में हो रहा है वह प्राइवेट अस्पताल है,वहाँ आरक्षण लागू नहीं है । यदि एम्स में इलाज कराते तो वहाँ आपको 60 प्रतिशत आरक्षण के डॉक्टर मिलते,क्या आपका भरोसा सरकारी अस्पताल में नहीं है?उनका इलाज भी डॉक्टर अरुप बासु कर रहे हैं जो आरक्षित वर्ग के डॉक्टर नहीं हैं । सोनिया जी के स्वस्थ होने की कामना हम सभी करते हैं,लेकिन आपने कॉग्रेस की क्या हालत बनाई है । जार्ज सोरोस के कहने पर आप समाज को बाँटकर देश क्यों तोड़ना चाहते हैं?"
भाजपा सांसद के इस बयान के कुछ ही घंटों बाद, दोपहर 3:39 बजे, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने इस पोस्ट को कोट करते हुए एक कड़ा बयान जारी किया। JMM ने दुबे की मानसिकता पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि इलाज का फैसला विशुद्ध रूप से एक व्यक्तिगत और चिकित्सीय निर्णय होता है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने अपने ऑफिसियल एक्स हैंडल पर लिखा कि,
"निजी स्वास्थ्य निर्णयों को राजनीतिक हथियार बनाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। दुबे जी का यह कहना कि किसी व्यक्ति का प्राइवेट या सरकारी अस्पताल चुनना “आरक्षण पर भरोसे” का संकेत है पूरी तरह अपमानजनक और गैर-जिम्मेदाराना है। इलाज का फैसला परिस्थिति, विशेषज्ञता और चिकित्सकीय जरूरतों के आधार पर होता है, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा से। किसी के निजी चिकित्सा निर्णय को आरक्षण जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दे से जोड़ना, न केवल अनुचित है बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा का भी अपमान है। आरक्षण संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, यह समान अवसर और ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का माध्यम है, न कि राजनीतिक कटाक्ष का विषय।"
इस पूरे घटनाक्रम को अगर गहराई से देखा जाए, तो यह केवल दो राजनीतिक दलों के बीच की जुबानी जंग नहीं है। डॉ. निशिकांत दुबे का यह पोस्ट कई गंभीर सामाजिक और संवैधानिक सवाल खड़े करता है।
भाजपा सांसद का यह पूछना कि "क्या आपका भरोसा सरकारी अस्पताल में नहीं है जहां 60% डॉक्टर आरक्षण वाले हैं?" सीधे तौर पर एक खतरनाक पूर्वाग्रह को बढ़ावा देता है। यह इस सवर्णवादी मानसिकता को पुष्ट करने का प्रयास है कि आरक्षण के माध्यम से आने वाले पेशेवर (डॉक्टर) कम योग्य या कम भरोसेमंद होते हैं।
आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि सदियों से हाशिए पर धकेले गए दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदायों (SC/ST/OBC) के लिए संविधान निर्माताओं द्वारा दिया गया एक अधिकार है। एक सांसद द्वारा इसका इस तरह राजनीतिक कटाक्ष के लिए इस्तेमाल करना, संवैधानिक मूल्यों को नीचा दिखाने जैसा है।
किसी भी मरीज (चाहे वह सोनिया गांधी हों या कोई आम नागरिक) के लिए डॉक्टर का चुनाव उसकी बीमारी की प्रकृति और डॉक्टर की विशेषज्ञता पर निर्भर करता है। डॉक्टर की जाति या वर्ग देखकर इलाज नहीं करवाया जाता।
एक तरफ सांसद सोनिया गांधी के जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं, और उसी सांस में उनके इलाज करने वाले डॉक्टर की जाति/वर्ग का विश्लेषण कर रहे हैं। यह दर्शाता है कि मूल उद्देश्य स्वास्थ्य की चिंता नहीं, बल्कि आरक्षण को लेकर एक खास नैरेटिव गढ़ना है।
यह विवाद इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक लाभ के लिए सामाजिक न्याय के स्थापित पैमानों को निशाना बनाया जा रहा है। JMM का जवाब इस बात को मजबूती से रेखांकित करता है कि ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करने के लिए बनाए गए आरक्षण जैसे गंभीर प्रावधानों को क्षुद्र राजनीति की भेंट नहीं चढ़ने दिया जाना चाहिए।
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